geeta adhyay saar-14 in hindi

geeta adhyay saar-14 in hindi
geeta adhyay saar-चौहदवां अध्याय
श्री हरि
तेरहवें अध्याय में भगवान् ने क्षेत्र -क्षेत्रज्ञ ,ज्ञान और ज्ञेय ,प्रकृति पुरूष का विवेचन ,देहाभिमान बाधा को दूर करने के उपाय का वर्णन किया था
चौहदवां अध्याय
इस अध्याय में कुल २७ श्लोक है
इस अध्याय को गुण त्रय विभाग योग कहा गया है
इस चौहदवें अध्याय में –
ज्ञान की महिमा और प्रकृति -पुरूष से जगत की उत्पत्ति
सत् ,रज ,तम इन तीन गुणों का विवेचन
भगवद प्राप्ति के उपाय और गुणातीत पुरूष के लक्षण का वर्णन हुआ है

इस अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने उस परम ज्ञान की पुनरुक्ति की है जिसे जान लेने के बाद साधक को परम सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है,जिसे न सृष्टि के आदि में जन्म लेना पड़ता है और न प्रलय काल में उसे व्यथित होना पड़ता है।
भगवान् बतलाते है कि पुरूष -प्रकृति संयोग से सब उत्पत्ति हुई है। मेरी ब्रह्मरूप प्रकृति सभी प्राणियों की योनि है ,जिसमे मैं चेतना रूप बीज डालकर जड़ और चेतन के संयोग से समस्त उत्पत्ति करता हूँ।जितनी भी योनियों में जितने देहधारी है ,प्रकृति उनकी माता है तो मैं चेतना देनेवाला पिता हूँ।
प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुण अर्थार्त अर्थात सत्व ,रजस और तमस गुण जीवधारियों को आसक्ति में बांध देते है
सत्व गुण जीव को सुख और ज्ञान की आसक्ति में बांधता है और
राजस गुण कर्मफल की आसक्ति में बांधता है तो
तामस गुण ज्ञान को आवृत कर आलस्य और निद्रा में बांध देता है।
किसी भी एक गुण के बढने पर वह दूसरे गुण को दबा देता है।
जब जीवात्मा के अंतः करण में ज्ञान के प्रकाश का उदय होता है ,तो सतो गुण का लक्षण है।
लोभ ,सकाम कर्म ,लालसा आदि का उत्पन्न होना रजो-गुण बढने का लक्षण है।
अज्ञानता ,निष्क्रियता ,भ्रम का उत्पन्न होना तमो-गुण का लक्षण है।
भगवान् कहते है कि जीवन के अंतिम समय में सतो-गुण के बढ़े होने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
रजो-गुण के बढ़े होने पर साधक कर्मों में आसक्ति वाले मनुष्यों में जन्म पाता है।
तमो-गुण के बढ़े होने पर पशु आदि मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
भगवान् कहते है कि सात्विक कर्म का फल शुभ ,राजसिक कर्म का फल दुःख ,और तामसिक कर्म का फल अज्ञान होता है।
सतो-गुण से ज्ञान,रजो-गुण से लोभ ,और तमो-गुण से भ्रम तथा अज्ञान उत्पन्न होता है।
सत्व गुण वाला उत्तम लोक में राजस गुण वाला मनुष्य योनि में तथा तमो गुण वाला नीच योनियों में जन्म लेता है। यह तीनों गुण ही आत्मा के पुनर्जन्म के वाहक है।
भगवान् कहते है कि जब मनुष्य देह की उत्पत्ति और देह से उत्पन्न तीनों गुणों से परे हो जाता है मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
अर्जुन द्वारा यह प्रश्न पूछने पर कि मनुष्य इन तीनों गुणों से परे कैसे हो सकता है ,इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् कहते है कि जो मनुष्य तीनों गुणों के कार्य ,ज्ञान ,सक्रियता और भ्रम में बांध जाने पर भी बुरा नहीं मानता और उससे मुक्त होने पर उनकी आकांक्षा भी नहीं करता ,गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता तथा परमात्मा में स्थिर भाव से स्तिथ रहता है ,सुख -दुःख में सम रहता है जिसके लिए मिटटी ,पत्थर ,सोना सब बराबर है जो प्रिय-अप्रिय ,निंदा -स्तुति ,मान-सम्मान ,शत्रु-मित्र में समभाव रखता है,जो सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन के भाव से मुक्त है ,वह गुणातीत हो जाता है और परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
चौहदवां अध्याय पूर्ण हुआ
पन्द्रहवाँ अध्याय अगले अंक में प्रकाश्य
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जय श्री कृष्णा …… राधे-राधे






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