geeta adhyay saar-12 in hindi

geeta adhyay saar-12 in hindi
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अध्याय 12.
बारहवें अध्याय को भक्ति योग कहा गया है
इस अध्याय में कुल २० श्लोक है
पिछले अध्याय में भगवान् द्वारा अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अत्युग्र विराट दर्शन ,विराट का परिचय ,विराट रूप की दुर्लभता ,चतुर्भुज रूप महत्ता और इस रूपके दर्शन करने के उपाय तथा अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति का वर्णन हुआ था
बारहवें अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने सगुण -निर्गुण उपासना ,भगवद प्राप्ति के चार उपायों सिद्ध भक्तों के उन्तालीस लक्षणों एवं प्रिय भक्तों के लक्षणों का वर्णन किया है।
अर्जुन द्वारा यह प्रश्न करने पर कि उत्तम योगी कौन है- साकार अथवा निराकार ?इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् कहते है कि जो भक्त जन मुझ में एकाग्र कर नित्य युक्त होकर परम श्रद्धा और भक्ति से युक्त युक्त होकर परब्रह्म परमेश्वर के सगुन रूप की उपासना करते है किन्तु वे मनुष्य भी मुझे ही प्राप्त होते है जो अक्षर ,अनिवर्चनीय ,अव्यक्त, सर्वगत ,अचिन्त्य ,अपरि पर्वतन ,अचल ,और सनातन ब्रह्म की उपासना इन्द्रियों को नियन्त्रित कर समभाव से भूत मात्र के हित में रत रहते है। भगवान् ने साकार की उपासना को प्रधानता इसलिए दी क्योकि देह-धारियों द्वारा अव्यक्त की प्राप्ति कठिनाई पूर्वक होती है। जो भक्त मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानते हुए सभी कर्मों को मुझे अर्पित कर देते है और अनन्य भक्ति भाव से मेरे साकार रूप का ध्यान करते है ,मैं ऐसे मनुष्यों को मृत्यु समान संसार सागर से पार लगा देता हूँ।
भगवान् ने ईश्वर प्राप्ति के चार मार्ग बतलाये है। मन को परब्रह्म मे स्थिर करना ,बुद्धि से चिंतन करना ,इन दोनों में असमर्थ रहने पर पूजा-पाठ का अभ्यास , पूजा -पाठ भी ना हो तो कर्तव्य कर्म का करना।भगवान् कहते है कि यदि वह सब भी ना हो तो परब्रह्म पर आश्रित होकर मन को नियंत्रित कर ,समस्त कर्म फल की आसक्ति का त्याग कर दो।
भगवान् कहते है कि मर्म जाने बिना अभ्यास करने से शास्त्रों का ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से अधिक परमात्मा के स्वरुप का ध्यान श्रेष्ठ है। सब कर्मों के फल से आसक्ति का त्याग ध्यान से श्रेष्ठ है क्योंकि त्याग से परम शांति मिलती है।
प्रिय भक्त के लक्षण बतलाते हुए भगवान् कहते है कि जो मनुष्य द्वेष रहित है ,सबका प्रेमी है ,ममता और अहंकार से रहित है ,सुख और दुःख में सम रहता है। क्षमाशील और संतुष्ट है ,मन व इंद्रियों को काबू में कर दृढ़ता पूर्वक मन और बुद्धि को मुझे अर्पित कर मेरा ही ध्यान करता है,वह मुझे प्रिय है।
भगवान् कहते है कि वह भक्त भी मुझे प्रिय है जो शत्रु और मित्र ,मान-अपमान ,सर्दी-गर्मी ,सुख -दुःख में समान रहता है ,जिसके लिए निंदा -स्तुति समान है ,मितभाषी है ,जो कुछ है उसी में संतुष्ट है ,जिसकी किसी में आसक्ति नहीं ,जिसकी बुद्धि स्थिर है ,ऐसे श्रद्धावान भक्त मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानकर दैवी गुण पाने का प्रयत्न करते हुए धर्ममय अमृत का जीवन यापन करते है ,ऐसे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है।
बारहवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ
तेरहवां अध्याय अगले अंक में
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जय श्री कृष्णा …… राधे-राधे





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