geeta adhyay saar-11 in hindi

geeta adhyay saar-11 in hindi
geeta adhyay saar-11 in hindi-ग्यारहवाँ अध्याय
ग्यारहवाँ अध्याय इस अध्याय में कुल ५५ श्लोक है
इस अध्याय को विराट रूप -दर्शन कहा गया है
नवे अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने विभूति और योग का विस्तार से वर्णन किया था
इस दसवें अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को अपने अकल्पनीय ,अलौकिक ,अविश्वसनीय दिव्य विराट रूप के दर्शन कराये है
इस ग्यारहवे अध्याय में अर्जुन भगवान् से ईश्वरीय रूप को अपनी आँखों से देखने की इच्छा व्यक्त करते है ,इस पर भगवान् ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपना दिव्य रूप विराट रूप दिखलाया। अर्जुन के लिए यह रूप अकल्पनीय अविश्वनीय और अद्भुत था। अर्जुन भगवान् के अनेक मुख और नेत्र ,दिव्य आभूषण ,दिव्य शस्त्र ,दिव्य आभूषण युक्त वस्त्र दिव्य गंध लेपन किये हुए रूप का दर्शन करते है। भगवान् श्री कृष्ण का रूप का तेज़ ऐसा था ,जैसे हज़ारों-हज़ार सूर्य एक साथ प्रकाशित होगये हो। अर्जुन ने भगवान् के दिव्य शरीर में अनेक प्रकार के विभागों में विभक्त ,परन्तु एक ही जगह एकत्र समस्त जगत को देखा। भगवान् का यह दिव्य रूप देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं आपकी देह में समस्त देव गणों को ,प्राणियों के समुदाय को कमल आसीन ब्रह्माजी को ,महादेवजी को ,समस्त ऋषियों ,एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ। आपको अनेक हाथों ,अनेक पेटों मूखों और नेत्रों से युक्त और अनन्त रूप वाले अत्यन्त दुर्लभ और अपरिमित रूप को देख रहा हूँ। इस दिव्य एवं विराट रूप को देखकर अर्जुन ने कहा कि आप ही जानने योग्य अक्षरातीत परब्रह्म परमात्मा है। इस विश्व के आश्रय है ,सनातन धर्म रक्षक है ,अविनाशी सनातन पुरूष है।
अर्जुन विस्मित भाव से कहते कि मैं आपको आदि ,मध्य ,और अंत से रहित तथा अनन्त भुजा वाले ,सूर्य और चन्द्र के सदृश नेत्र वाले प्रज्वलित अग्नि रुपी मुखों वाले तथा अपने तेज़ से विश्व को तपाते हुए देख रहा हूँ। स्वर्ग और भू -लोक के मध्य यह सम्पूर्ण आकाश तथा समस्त दिशाएं केवल आपसे ही व्याप्त है।वे आपके इस अलौकिक रूप से भयभीत हो रहे है। देवताओ के समूह आपमें प्रवेश कर रहे है ,कई भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का कीर्तन कर रहे है ,महर्षियों और सिद्धों के समुदाय आपकी स्तुति कर रहे है। आपके इस रूप के दर्शन करके मैं व्याकुल हो रहा हूँ। न दिशाओं का ज्ञान हो रहा है ,न शांति मिल रही है। आप प्रसन्न होकर मुझे तत्व बोध कराये क्योकि मैं आपका प्रयोजन नहीं समझ पा रहा हूँ ,
तब भगवान् ने अर्जुन से कहा कि मैं ही विनाश करनेवाला महाकाल हूँ और इस समय तुम्हारे सामने जो सेना खड़ी है और उस सेना में जो धर्म विमुख है मैं उन सबका नाश करने आया हूँ। वे सब योद्धा पूर्व में मेरे द्वारा मारे जा चुके है। तुम तो निमित्त मात्र हो।
भगवान् के विश्व रूप का दर्शन कर अर्जुन ने कहा कि हे ,कृष्ण ,आप ही आदिकर्ता ,पालन कर्ता परब्रह्म ,आदिदेव ,सनातन पुरूष ,परम धाम है। समस्त जगत आप में ही व्याप्त है। आप ही वायु ,यमराज ,अग्नि ,वरुण ,चन्द्रमा प्रजापति ,ब्रह्मा और ब्रह्म -पिता है,आप सर्व-व्यापी है। आप मेरे द्वारा जाने -अनजाने में हुई भूल को क्षमा करते हुए फिर से अपना चतुर्भुज देव रूप दिखाए।
भगवान् ने कहा -हे ,अर्जुन मेरे इस रूप को आज से पूर्व तक तुम्हारे अतिरिक्त किसी और ने नहीं देखा। ऐसा कहकर भगवान् श्री कृष्ण ने पुनः अपना मनुष्य रूप धारण कर लिया और अर्जुन से कहा कि जिस रूप के तुमने दर्शन किये है वैसा रूप वेदों के अध्ययन ,तप दान और यज्ञ से भी नहीं देखा जा सकता। मैं अनन्य भक्ति द्वारा चतुर्भुज रूप में देखा जा सकता हूँ और तत्व से जाना और प्राप्त किया जा सकता हूँ। भगवान् कहते है कि मेरा भक्त वह है जो केवल मेरे निमित्त ही समस्त कर्तव्य -कर्म करता है ,विश्वास करता है। मैं उसी को प्राप्त होता हूँ जो आसक्ति रहित है और निर्वैर है।
ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त
बारहवाँ अध्याय अगले अंक में प्रकाश्य
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