गुरु पूर्णिमा

ॐ सह नाववतु
सह नौ भुनक्तु
सह वीर्यं करवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु
मा विद्विषावहै
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति :
हे प्रभु ,हम गुरु -शिष्य की रक्षा कीजिये। आनंद का पान कराइये। हमारा ज्ञान राष्ट्र हित में हो। हम द्वेष .. विरोध न करें .. अत्यंत प्रेम से अध्ययन -अध्यापन करें -कराये … हमें आध्यात्मिक ,आधि भौतिक ,आधि दैविक शांति प्राप्त हो …
ऐसी पवित्र प्रार्थना का दिन है -गुरु पूर्णिमा
शिष्य को गुरु के बताए मार्ग से मन की शुध्दि करनी चाहिए .गुरु से कभी परा मुख नहीं होना चाहिए .गुरु की निंदा करनेवाला तब तक नरक भोगेगा ,जब तक सूर्य –चन्द्र रहेगे . गुरु का सम्मान ना करनेवाला निर्जल अरण्य में ब्रह्म राक्षस के समान है .गुरु सेवा से वंचित को अभागा मानना चाहिए .गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग ,धन -धान्य ,विद्या ,पुत्र ,सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं है। वेद के अनुसार गुरु के अनुसार गुरु से बढ़कर वंदनीय और पूजनीय अन्य कोई नहीं है.
श्रीमद्भगवद गीता में कहा है-गुरु वह है जो ज्ञान दे और ब्रह्म की ओर ले जाये।
हरि रूठ जाये तो गुरु शरण है ;किन्तु गुरु के रूठने पर उसकी रक्षा देवता भी नहीं कर सकते ,स्कन्द पुराण में भगवान शिव के इस कथन की कबीर ने भी पुनरावृत्ति करते हुए कहा है –
कबीरा ते नर अंध है ,गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है ,गुरु रूठे नहि ठौर
चाणक्य ने गुरु निंदा तो क्या ,गुरु की निंदा सुनने को भी पाप बतलाया है।
तुलसीदासजी ने गुरु स्तुति करते हुए लिखा है –
बंदऊ गुरु पद कंज ,कृपा सिंधु नर रूप हरि
माया मोह तम पुंज ,जासु वचन रविकर निकर
तुलसीदासजी ने गुरु के सम्बन्ध में कहा है –
गुरु बिन भव निधि तराई न कोई
जो बिरंचि संकर सम होई
अर्थात संसाररूपी सागर को कोई अपने आप तर नहीं सकता। चाहे वः ब्रह्माजी जैसा सृष्टि कर्ता हो या संहार कर्ता शिव हो। अपने मन की चाल से अपनी मान्यताओं के जंगल से निकलने के लिए पग डंडी दिखानेवाले सद्गुरु अवश्य चाहिए।
करता करें ना कर सकें ,गुरु करें सब होय
सात द्वीप नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय
चाणक्य और चंद्र गुप्त ,समर्थ गुरु रामदास और शिवजी तथा राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानन्द उदहारण है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरु
वर्तमान में वैश्विक व्यवसायीकरण ने गुरु धर्म को भी व्यवसाय बना दिया है।आध्यात्मिक ज्ञान के स्थान पर शारीरिक मानसिक घरेलू परेशानियाँ दूर करने या भौतिक सुख प्रदान अथवा आकस्मिक धन लाभ का प्रलोभन देने वाले तांत्रिक गुरु बन बैठे है। ऐसे तथाकथित -छद्म गुरुओं ने गुरु प्रतिष्ठा को न सिर्फ क्षति पहुँचाई है बल्कि गुरु के प्रति आस्था और विश्वास की जड़ों को कमज़ोर किया है।समय-समय पर टीवी न्यूज़ चैनल ,समाचार पत्र और सोशल मिडिया पर वायरल होनेवाले प्रकरण इस तथ्य की पुष्टि करते है । व्यक्तिगत हित साधने वाले ऐसे गुरु -शिष्य जहाँ एक ओर पवित्र भावना को कलुषित कर रहे है ,वही दूसरी ओर गुरु के प्रति की युगों से चली आ रही आस्था ,विश्वास और समर्पण की भावना को भी कलंकित कर रहे है।
गुरु लोभी शिष्य लालची ,दोनों खेले दॉव
दोनों बूडे बापूरे ,चढ पाथर की नाव
यदि गुरु शिष्य अपना -अपना हित साधनेवाले हुए तो पत्थर की नाव में बैठ कर नदी पार करने जैसी मूर्खता होगी।
जाका गुरु भी अंधला ,चेला खरा निरन्ध
अंधे ,अँधा ठेलिया ,दोनों कूप पड़ंत
ऐसा गुरु न अपने शिष्य का कल्याण कर सकता है और न ऐसा शिष्य अपने गुरु का लाभ उठा सकता है।
एक ओर गुरु ऐसे शिष्य को तलाश रहा है जो आर्थिक लाभ दे सकें और शिष्य ऐसे गुरु को तलाश रहा है ,जो आर्थिक लाभ पहुंचा सकें। दूसरी ओर सच्चा गुरु सच्चे शिष्य को तलाश रहा है और सच्चा शिष्य सच्चे गुरु को तलाश रहा है।
सच्चे गुरु दुर्लभ है। हमें अपने बुध्दि विवेक से सच्चे और छद्म गुरु को पहचानना है।चाणक्य और चंद्र गुप्त, समर्थ गुरु रामदास और शिवजी महाराज तथा राम कृष्ण परम हंस और स्वामी विवेकानंद जैसे गुरु -शिष्य आज भी है ,बस -पहचानना शेष है ।
समय जो गतिशील है ,समय जो परिवर्तनशील है ,समय के साथ –साथ बहुत कुछ बदल जाता है .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी देश ,समाज और मानव कल्याण का अनिवार्य अंग हुआ करती थी ,उन परम्पराओ और मान्यताओ में से कुछ समय के साथ –साथ अप्रासंगिक होती चली गई और कुछ विलुप्त प्राय-सी हो गई .जो परम्पराएँ और मान्यताएँ कभी हुआ करती थी ,लेकिन आज नहीं है.लेकिन उनमे से कुछ परम्पराएँ और मान्यताएँ ऐसी है जो कल भी थी ,आज भी और कल भी रहेंगी.







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