पिता
पितृ दिवस पर विशेष

पिता
father day
( 1 )

दुनिया में यही एक रिश्ता है
जिसमे वह
पिसता ,घिसता ,रिसता है
फिर भी हँसता है
गरमी में तपता है
सरदी में ठिठुरता है
बारिश में भींगता है
फिर भी जिम्मेदारियों से
अविचल लड़ता है ,भिड़ता है
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पानी में कमल
काँटों में गुलाब
दिन को सूरज
रात को चाँद
बनकर जीता है
कभी मंद बयार सा बहता है
और कभी झरना बन जाता है
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सारे दुखों का गरल पीकर
शिव बन जाता है
दशरथ का राम
भाई का लक्ष्मण
मित्र का हनुमान
और कभी केवट की भूमिका निभाता है

बूढ़े माता-पिता का पुजारी बन जाता है
पत्नी को भार नहीं ,भार्या कहता है
बहिन हो या भाई ,हर रस्म निभाता है
सुत हो या कि सुता
स्नेह दोनों पर लुटाता है
दायित्व ,वात्सल्य ,समर्पण ,त्याग का
एक अकेला पर्याय बन जाता है
एक में अनेक
और
अनेक एक होकर
पिता कहलाता है
( 2 )

पिता यथार्थ में पीता है
मगर ,मदिरा नहीं
अपनी संतान के सारे कष्ट पीता है
कष्ट की एक- दो बूँद नही
सारा समंदर पीता है
बच्चों के लिए जीता है
इसीलिए वह पिता है
सुनाई नहीं देता किसी को उसका क्रंदन
है पाषाण
लेकिन
उसमें भी है स्पन्दन
दिल उसका भी रोता है
समंदर का पानी किनारे से बाहर नहीं आता
पिता के भीतर का आंसू भी बाहर नहीं
परमात्मा से वह इक्कीस नहीं,
न सही,
लेकिन उन्नीस भी नहीं
वह भी बीस है
औरों के लिए न सही
अपनी संतान के लिए रईस है
जो धूप में बादल का टुकड़ा बनकर चलता है
जो सरदी में संतान का तन ढक
खुद ठिठुरता है
जो बरसात में छाता बनके छा जाता है
इसीलिए पिता कहलाता है
वो नाव है ,
पतवार है
,किनारा है
हर एक का सहारा है
मुसीबतों से कभी न हारा
संतान के लिएईश्वर जितना ही प्यारा है
माँ का विश्वास है ,
संतान की आस है ,
इसीलिए वह ख़ास है







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