world day against child labour
१२ जून , बाल श्रमिक दिवस पर विशेष


दृश्य -१
स्थान -सड़क के किनारे बने ढाबे का वह हिस्सा जहाँ बरतन साफ़ किये जाते है
समय -दिन
पात्र -१३-१४ वर्ष का एक दुबला -पतला बच्चा,एक युवा सामाजिक कार्य कर्ता
एक दुबला -पतला बच्चा बरतन साफ़ कर रहा है। एक युवा सामाजिक कार्य कर्ता बच्चे के पास आकर रुकता है। बच्चे को रोक कर पूछता है –
सामाजिक कार्य कर्ता -क्या नाम है तेरा ?
बच्चा –मज़बूर मज़दूर
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- तुम्हारी मज़बूरी क्या है ?
बच्चा – भूख पढ़ने नहीं देती ,चिंता खेलने नहीं देती और सरकारी कानून कायदे काम नहीं करने देते
युवा सामाजिक कार्य कर्ता-बाप का नाम ?
बच्चा – गरीब चंद
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- माँ का नाम ?
बच्चा – मज़बूरी देवी
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- कहाँ रहता है ?
बच्चा – पुलिया के नीचे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता-तेरा बाप क्या काम करता है ?
बच्चा – दिन को मज़दूरी करता है और रात को दारू पीकर सोता है
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- और माँ ?
बच्चा – वह भी मज़दूरी करती है
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- कितने भाई -बहिन हो ?
बच्चा – गिनती आती तो क्या यहाँ मज़दूरी करता
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- खाता क्या है ?
बच्चा – दुत्कारे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता– पीता क्या ?
बच्चा – आँसू
युवा सामाजिक कार्य कर्ता– बड़ा होकर क्या बनाना चाहता है ?
बच्चा – चोर उच्चका बदमाश
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- मान लो ,मै भगवान हूँ ,मुझसे क्या माँगेगा ?
बच्चा – जितने भी गरीब आदमी है उन सब को नपुसंग बना दे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता– मै तुझे कुछ देना चाहूँ। तो क्या मांगेगा ?
बच्चा – आज रात का खाना और सलमान खान की फिल्म का टिकट
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- …. और कपडे ?
बच्चा – उसकी क्या ज़रुरत ,कपड़ों की ज़रुरत बेशर्मो को होती है ,अपनी बेशर्मी को ढकने के लिए
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- सरकार से क्या चाहता है ?
बच्चा – हमारे लिए जो नियम-कायदे बनाये है , उन्हें किताब से निकल कर हमें दे दे। उन्हें रद्द्दी वाले को बेचकर सल्लू भाई की मूवी देखूँगा
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- समाज से क्या चाहते हो ?
बच्चा – हमें रोटी न दे न सही ,कम से कम हमे धिक्कारे तो नहीं
युवा सामाजिक कार्य कर्ता- पैसे वालों लोगों को तुम्हारी तरफ से क्या कहूँ ?
बच्चा – उनसे कहना हमारा खून चूसनेवाले पैने दाँत निकालकर समुन्दर में फेंक दे या आसमान में उछाल दे
युवा सामाजिक कार्य कर्ता -नहाते क्यों नहीं … और फटे मैले-कुचले कपडे क्यों पहनते हो ?
बच्चा -(हंसकर ) कैसे पढ़े-लिखे साहब हो आप भी ? इतना भी नहीं समझते ,साफ़-सुथरे कपड़ों में हमें गरीब कौन समझेगा ,ऐसे रहते है , तभी तो काम मिलता है।
(तभी बैकग्राउंड से ठेकेदार की आवाज़ ओवर लेप होती है )
आवाज- ओ सूअर के बच्चे … क्या कर रहा है वहाँ …काम तेरा बाप करेगा ?
बच्चा –चलता हूँ ,साब
धीरे-धीरे चलते हुए बच्चा कैमरे की फ्रेम से बाहर निकल जाता है ,
कट.

यह किसी फिल्म का दृश्य नहीं बल्कि हमारे समाज की हकीकत है,आईना है।
क्यों यह बाल मज़दूर हालात के मज़बूर है ?
क्यों खुशियाँ इनसे दूर है ?

world day against child labour -12 june
बच्चा है ,लेकिन पिता जितना बोझ ढो रहा है। अखबार -किताबें खरीदता है, लेकिन पढ़ने के लिए नहीं बल्कि बेचने के लिए ,जिससे यह रोटी खरीदता है अपने लिये और अपने घर वालों के लिए । दूसरे बच्चो को मैदान में खेलते देखकर बाल मज़दूर सोचता तो है ,मै भी खेलू ,इस विचार के दूसरा विचार आता है, मै खेलूँगा तो घर कैसे चलेगा ….. चूल्हा कैसे जलेगा ? दूसरे बच्चों को कंधे पर बस्ता लेकर स्कूल जाते हुए देखकर पढ़ने की इच्छा तो होती है ,लेकिन मज़बूरी पैरों को कारखाने की तरफ मोड़ देती है।

ये बच्चे जिनके चेहरे फूलों की तरह खिले होने चाहिए ,मुरझाये हुए है। ये बच्चे चुप है, लेकिन इनकी आँख से निकलनेवाली हर बूँद समाज से सवाल करती है ,क्यूँ … आखिर क्यूँ ..ये बच्चे पेटभर खाना खाकर छत के नीचे मुलायम बिस्तर पर सोते हुए सपने नहीं देख सकते ?

कचरा बीनता हुआ यह बच्चा कूड़े के ढेर में अपना खोया हुआ बचपन ढूढ़ रहा है या अपनी बीमार के लिए दवाई के पैसे या फिर अपने छोटे भाई-बहिन के रोटी ?
इधर मौसम बदलता है। उधर उसके रहने की जगह। रात कहाँ बिताएगा -किसी सीवरेज पाइप में ? ओवर ब्रिज के नीचे ? सड़क के किनारे फुटपाथ पर या सड़क के बीचों बीच बने डिवाइडर पर ? पता नहीं।

आइस क्रीम पार्लर पर किसी को आइसक्रीम खाते देखकर … कन्फेक्शरी की दूकान के बाहर किसी को चॉकलेट खाते देखकर … चाट के ठेले पर किसी को गोल-गप्पे खाते देखकर जो आँखें दूर खड़ी भूखी नज़रों से घूर -घूर कर देख रही है ,उस पर गुस्सा करूँ या तरस खाऊ ? गुस्सा करू तो किस पर ? इस बच्चे के माँ -बाप पर जिन्होंने इसे पैदा किया ? या फिर सामाजिक और सरकारी व्यवस्था पर ?सोचता हूँ, क्यों इनके कन्धों पर बस्ता नहीं … क्यों इनके हाथों में गेंद नहीं … इनके चार कपड़ों में से दो कपडे कौन छीनकर ले गया ?

सर्दी हो ,गर्मी हो ,या बरसात … आंधी आये या तूफ़ान वक़्त पर जाना है। देर हो गई तो गलियां सुननी पड सकती है और पीटा भी जा सकता है। जरूरी काम से छुटटी करनी पड़ गई ,पगार कट जाएगी ,अनजाने में नुकसान हो गया ,पगार में से काट लिया जायेगा । नियोक्ता को बच्चों को काम पर लगाने का सबसे बड़ा फायदा तो यह होता है कि बाल मज़दूरों से आधी मज़दूरी देकर दुगना काम लिया जा सकता है।
जिन बच्चों को देखकर हमारे समाज के प्रबुद्ध और साहित्यकार कहते है -ये देश के कर्ण धार है … ये देश का भविष्य है। … तो क्या ऐसा होगा देश का भविष्य … ऐसे होंगे देश के कर्ण धार ? होटल -ढाबे पर काम करते हुए

… सडकों पर कार साफ़ करते हुए … कचरे में से कुछ ढूढ़ते हुए … फुटपाथ पर बूट पोलिश करते हुए … ऐसे बच्चों से बनेगा देश का भविष्य ? क्यों बच्चों का शारीरिक -बौद्धिक विकास का स्वर्णिम अवसर छीनकर रोटी के लिए इनके बचपन की हत्या की जा रही है ? क्यों वर्तमान के लिए भविष्य को कुचला जा रहा है ?
भारत में बाल श्रमिकों की संख्या दुनिया के दूसरे से ज्यादा ही नहीं बल्कि स्तिथि भी दिल दहला देनेवाली है। फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग में ये मासूम बच्चे १००४ डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में दहकती भट्टियों में काम कर रहे है। दरियों और कालीनों कीबनवाई में इनकी कोमल अंगुलियां टूट सी गयी है ,इसी तरह आतिश बनाने वाले कारखानों में पोटाश ,सल्फर और फास्फोरस जैसे खतरनाक रसायनों में काम करते हुए अस्थमा ,टी बी जैसी बीमारियों से ग्रसित हो रहे है , बल्कि कितनी बार तो विस्फोटक दुर्घटनाओं में जल – मर जाते है। इसी तरह खेती के काम के अतिरिक्त जयपुर और सूरत में रत्न पोलिश ,मुरादाबादमें पीतल ,खुर्जा में चीनी मिटटी ,सम्बलपुर में बीड़ी ,लखनऊ में जरी की कढ़ाई , अलीगढ़ में ताला , मन्दसौर में स्लेट ,मेघालय में काँच उद्योग में लाखों बच्चे रोटी के लिए ज़िन्दगी बहुत सस्ते में बेचने के लिए मज़बूर हो रहे है।बच्चों की यह स्तिथि समाज के माथे पर कलंक है, तो मानवता के गाल पर थप्पड़ है।
गंदे ,फ़टे कपड़ों में इन बच्चों को देखकर एक बार तो मन करता है कि चीख -चीखकर गालियाँ दूँ ,इनके माँ -बाप को ,जिन्होंने इन बच्चों को पैदा किया। समझ नहीं आता कैसे दूँ इन बच्चों को शिक्षा ? कैसे करूँ इनकी रक्षा ?सरकार से गुहार करता हूँ ,सरकार कहती है, हमने एक नहीं ,दो नहीं ,ढेरों कानून बनाये है इनके के लिए। समाज से कहता हूँ ,समाज कहता है ,कितनी सारी संस्थाएं खोले बैठे हम इन बच्चों के लिए। राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक कोशिश हो रही है इन बच्चों की हालत सुधारने के लिए। फिर भी लाखों -करोड़ों की संख्या में बाल श्रमिक क्यों ? १२ जून से सोचना शुरू करता हूँ ,अगला १२ जून आ जाता है ,स्तिथि वही की वही ,न जवाब मिलता है और न समाधान।







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