veer savarkar in hindi

विनायक दामोदर सावरकर
वीर सावरकर
(जन्म-२८ मई ,१८८३ , निर्वाण -२६ फरवरी १९६६ )
हे मातृ भूमि ,तेरे चरणों में पहले ही मै अपना तन -मन समर्पित कर चुका हूँ। राष्ट्र सेवा ही ईश्वर सेवा है ,यह मानते हुए तेरी सेवा करते हुए मैंने ईश्वर की सेवा की है।
क्रांति और क्रन्तिकारी जैसे शब्दों को यथार्थ रूप में यदि किसी ने परिणत किया है तो सिर्फ और सिर्फ वीर सावर ने। जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित रहा स्वतन्त्रता पूर्व भी और स्वतंत्रता के पश्चात् भी । तरुणावस्था में ही तरुणाई को क्रांति की प्रचंड ज्वाला में झोंककर जिसने अपने इरादों को फौलादी बना लिया,इतना फौलादी कि वह हर कष्ट … हर पीड़ा को सहन कर सकें । जिसने अपनी ओजस्वी वाणी और धारदार लेखनी से अंग्रेजी सरकार को भयाक्रांत कर दिया ।
दुनिया के जितने भी चर्चित लोग है ,वे अपने दो-चार गुणों या विशेषताओं से पहचाने जाते है ,किन्तु सावरकर एक नहीं ,दो नहीं बल्कि ढेर सारी खूबियों का सम्मिश्रण थे -वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के प्रचण्ड क्रन्तिकारी होने के साथ -साथ कवि लेखक ,इतिहासकार , समाज सुधारक और राष्ट्रवादी हिंदुत्व के अग्रणी पुरोधा भी थे। उनके मुख से निकलनेवाले शब्द ,शब्द नहीं बल्कि तीष्ण बाण होते थे। उनकी कलम किसी दुधारी तलवार से कम न थी ,तभी तो १८५७ के ग़दर का सनसनीखेज इतिहास(द इंडियन वार ऑफ़ इण्डिपेण्डेंस )लिखकर अंग्रेजी हुकूमत को कँपा दिया था । उनकी इस पुस्तक को अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था ।
युवाओ में राष्ट्रीयता की अलख जगाने के लिए ही उन्होंने युवाओं को संगठित कर मित्र मेलों का आयोजन किया। अभिनव भारत क्रन्तिकारी संगठन तैयार किया। विदेशी कपड़ों की होली जलाई। राष्ट्रवादी होने के कारण ही अंग्रेजी सरकार द्वारा उन्हें वकालत नहीं करने दी गयी..लन्दन प्रवास के दौरान वे लाला हरदयाल से मिले थे। १३मई१९१० को लन्दन टाइम्स में छपे लेख के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ,लेकिन सावरकार आँख में धूल झोंककर भाग निकले। बाद में पकड़े जाने पर २४ दिसम्बर १९१० को आजीवन कारावास का दंड दिया गया और फिर ३१ जनवरी १९११ को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। यह विश्व इतिहास की अनूठी घटना थी ,जब किसी को दो -दो कारावास की सजा दी गयी हो।
नासिक ज़िले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के षडयंत्र में इन्हे काले पानी की सजा देकर ( सेलुलर पोर्ट ब्लेयर की ) जेल में क़ैद कर दिया गया। शत्रु कितना ही ताक़तवर क्यों न हो ,वह वीरों के शरीर को तो क़ैद कर सकता है ,किन्तु उनकी आत्मा को नहीं ,उनकी भावनाओं को नहीं। सावरकर वीर क्रन्तिकारी ही नहीं बल्कि सहृदय कवि भी थे। कागज़ ,कलम ,दवात नहीं मिली तो सावरकर ने जेल की दीवारों पर कील से कविता लिख डाली ,जिसे बाद में लिपिबद्ध किया। दस साल तक कड़ी यातना सहन की ,लेकिन ज़ज़्बा कम नहीं हुआ। १९२१ में भारत लौटने पर फिर से ३ साल के लिए जेल में बंद कर दिया गया। जेल में ही इन्होने हिन्दुत्व पर पुस्तक की रचना की।
भीड़ में आगे -आगे चलकर नारे लगाने से कोई वीर नहीं हो जाता। वीर वह होता है जिसे अपने प्राणों का मोह नहीं होता ,वीर वह होता है जो अपने प्राण हथेली पर रखकर चलता है ,वीर वह होता है जो ,सिर पर कफ़न बांधकर चलता है। दो-चार महीने ए क्लास जेल में रहकर मक्खन लगी डबल रोटी खाने ,संतरे या मौसम्बी का जूस पीने या उपवास रखने से वह महात्मा तो कहला सकता है ,लेकिन वीर नहीं।सावरकर के नाम के साथ जुड़ा विशेषण वीर यूँ ही नहीं जुड़ गया। वे सचमुच सच्चे अर्थों में वीर थे। सालों तक जेल में कष्टमय जीवन व्यतीतकर अपने इरादों पर अडिग रहनेवाला निस्संदेह वीर कहलाने का अधिकारी है। सावरकर जानते थे कि अंग्रेज स्वतन्त्रता को थाली में परोसकर भेंट नहीं करेंगे और न याचक बनकर याचना करने से झोली में डालेंगे । स्वतन्त्रता का कमल तो रक्त सरोवर में ही खिलता है।इसीलिए उन्होने जोखिम भरा क्रांति का मार्ग चुना।
जेल से छूटने के बाद संघ संस्थापक के संपर्क में आये और स्वयं सेवक संघ से जुड़ गए।
सावरकर की उग्र विचारधारा गांधीजी के नम्र विचारधारा के बिलकुल विपरीत थी। सावरकर ने बंटवारे की शर्त पर भारत की आज़ादी का पुरजोर शब्दों में विरोध किया था।ऐसे इसी कारण सावरकर पर गांधीजी की हत्या में हाथ होने का संदेहकिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया ,किन्तु दोष साबित न होने के कारण छोड़ दिया गया। आज़ादी के बाद सावरकर समाज सुधार में जुट गए। वे जातिगत भेद-भाव और छूआ -छूत के प्रबल विरोधी थे।उन्होंने कहा था -अस्पृश्यता देश और समाज के माथे का कलंक है। इससे करोड़ों लोग अभिशप्त है। जब तक यह अस्पृश्यता रहेगी, शत्रु हमें परस्पर लड़ाकर ,हमें बांटकर हमें कमज़ोर करने में सफल होते रहेंगे।अछूतों को ईश्वर के दर्शन उपलब्ध हो ,क्योकि ईश्वर पतित पावन है। शास्त्रों का सार भी यही है। ईश्वर दर्शन की मांग जिस व्यक्ति को जिस व्यक्ति को स्वीकार्य नहीं ,वह स्वयं अछूत है,पतित है ,चाहे उसे चरों वेद कण्ठस्थ हो ।
ऐसे थे इस कर्म योगी के पुनीत कर्म …भारत माता के ऐसे सपूत को उनके जन्म दिवस पर शत -शत नमन








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