मैंने आहुति बनकर देखा-अज्ञेय
मैंने आहुति बनकर देखा
अज्ञेय
1
मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नन्दन-कानन का फूल बने?
काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रान्तर का ओछा फूल बने?
मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?
भावार्थ: कवि अज्ञेय अपने संकल्प को दृढ़ता से स्थापित करते हुए कहते है वह किसी भी प्रकार के दुःख से छुटकारा पाने की इच्छा नहीं रखते है। वह अपने जीवन में दुःखों और पीड़ा का आकांक्षी है, कवि नहीं चाहते कि उनका जीवन देवताओं के वन के समान सदा खिले रहने वाले पुष्पों से महक उठे। कवि का मानना है कि जैसे काँटे की फल में परिवर्तित हो जाने में नहीं , बल्कि उसके कठोरपन और नुकीलेपन में है, उसी प्रकार जीवन की सार्थकता संघर्ष और पीड़ा से लड़ने में है।कवि कहते हैं कि वह कभी नहीं चाहते कि जीवन की इस युद्धभूमि से वह बिना चोट खाए ,सकुशल लौट आए, क्योंकि रणभूमि में लगी चोट एक योद्धा का श्रृंगार हैं।कवि अपने प्रेम से प्रतिफल प्राप्ति की कामना नहीं रखना चाहता।
2
मैं कब कहता हूँ विजय करूं-मेरा ऊँचा प्रासाद बने?
या पात्र जगत् की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने? द्य
पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?
नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?
भावार्थ-
कवि न ही विश्वविजेता बनना चाहता है और न वह दुनिया के वैभव एवं सुविधाओं का भी आकांक्षी नहीं है। कवि अपने जीवन में इतना महान् भी नहीं बनना चाहता है। कि लोग हमेशा उसे श्रद्धा की दृष्टि से देखें, लोग उसे सम्मान एवं आदर के भाव से निहारें। वह यह भी नहीं चाहता है कि उसके जीवन का मार्ग हमेशा प्रशस्त रहे। अर्थात उसके द्वारा किए गए कार्यों की सदा प्रशंसा ही हो, उसे आलोचना न सहनी पड़े। सफलता एवं श्रेष्ठता से परिपूर्ण जीवन की भी कवि का कामना नहीं है। कवि की यह भी आकांक्षा नहीं है कि आज उसे जो सबका नेतृत्व करने का सुअवसर प्राप्त है, वह सदा से उसके साथ रहे अर्थात भविष्य में न छिने। वस्तुतरू कवि स्वयं को किसी भी ऐसी आदर्श स्थिति से वंचित रखना पाहता है, जिसका सामान्यतया अधिकांश लोग कामना करते हैं। वह स्वयंको, अपने जीवन को एक ऐसे सामान्य व्यक्ति के जीवन के रूप में जीने के लिए प्रस्तुत करना चाहता है, जो परहित की चिन्ता से व्याकुल हो, जो दूसरों के दुःख को अपना समझकर उसे दूर करने की कोशिश करे, जो अपने देश एवं समाज के हितों की पूर्ति करने में काम कर सके।
3
मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने-
फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने।
अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है-
क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है?
वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-
वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन-कारी हाला है
मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-
मैंने आहुति बनकर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!
भावार्थ: अज्ञेयजी कहते हैं कि भले ही उस धूल का हर कण मुझे जीवन में आगे बढ़ने से रोके, और मेरे लिए पीड़ादायक बन जाए, मैं अपने जनपद की धूल बन जाना स्वीकार करता हूँ अज्ञेयजी कहते हैं कि जब हम अपना कर्तव्य समझ कर जिसका पालन-पोषण करते हैं, जिस पर अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं ,उस श्रम, त्याग और आत्मीयता का फल केवल दुःख, उदासी और अश्रु के रूप में नहीं मिल सकता ।
अज्ञेयजी कहते है कि प्रेम को जीवन के अनुभव का कड़वा प्याला मानने वाले लोग सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखते और मानसिक रूप से विकृत होते हैं, किन्तु वे भी चेतनाहीन निर्जीव की तरह हैं, जिनके लिए प्रेम चेतना लुप्त करने वाली मदिरा है।
वास्तव में प्रेम एक संजीवनी बूटी की तरह है जो मनुष्यों को चेतना देता है। अज्ञेयजी कहते हैं कि जब वें कई –कई चुनौतियों और बाधाओं से गुजरे , इन चुनौतियों और बाधाओं से गुजर कर उन्होनें जीवन के अंतिम रहस्य को समझ लिया है, । जब उन्होनें अपने आप को आहुति बनाया, तो उन्हें प्रेमरूपी यज्ञ की पवित्र कल्याणकारी ज्वाला दिखाई दी।
4
मैं कहता हूँ मैं बढ़ता हूँ मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ
कुचला जाकर भी धूली-सा आँधी-सा और उमड़ता हूँ
मेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बने
इस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!
भव सारा तुझको है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने-
तेरी पुकार-सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने!
कवि चाहता है कि उसका संघर्षपूर्ण जीवन चुनौती बन जाए।
जीवन में असफलता उसके लिए तलवार की धार बन जाए , सफलता की राह कंटीली हो जाए , जीवन के कठिन संघर्षों में बार-बार रुक जाना ही उसका प्रहार बन जाए ।
कवि अज्ञेय ईश्वर को धन्यवाद देते हुए कहते है कि मैं अपना सारा संसार तुम्हें अपनी हार-जीत सहित समर्पित कर रहा हूँ, ।
मैं चाहता हूँ कि मेरे द्वारा तुम्हें आहुति दी गई यज्ञ की अग्नि बन जाएँ और मेरे जीवनरूपी यज्ञ को पूर्ण बनाये।
तुम्हारी पुकार की तरह ही मेरा मौन प्रेम भी बहुत व्यापक हो जाए।




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