mahatma jyoti baa fule-dalit uddhar ke praneta
११ अप्रैल ,१८२७ –ज्योति बा फुले के जन्म दिवस पर विशेष

दलितोद्धारक –ज्योति बा फुले
११ अप्रैल ,१८२७
महात्मा ज्योति बा फुले –दलित उद्धार के प्रणेता
स्वतंत्रता पूर्व का भारत -गुलाम भारत। प्रत्येक भारतीय गुलाम था-अंग्रेजों का गुलाम। यही वह समय था ,जब भारतीय समाज का एक वर्ग ,जिसे दलित कहा जाता था ,वह अपने ही देश में अपने ही लोगों का गुलाम बना हुआ था। एक ओर वह एक ओर राजनीतिक गुलामी की त्रासदी भुगत रहा था ,वही दूसरी ओर सामाजिक गुलामी की बेडियों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था …बेबस …. असहाय । इस वर्ग के भीतर अंग्रेजों की गुलामी से ज्यादा अपनों से ही सताए जाने का दर्द भरा हुआ था। दलित दोहरी गुलामी सह रहा था। उस पर जुल्म ,अत्याचार और शोषण करनेवाले अंग्रेज नहीं बल्कि अपने आपको सवर्ण कहलानेवाले कट्टरवादी ब्राह्मण भारतीय ही थे ,जिनकी धर्म की आड़ लेकर बनाई गई सामाजिक व्यवस्था के कारण दलित वर्ग पाशविक जीवन जीने के लिए बाध्य था ।
उन्ही सवर्ण कहलाने वालों के वंशज आज आरक्षण व्यवस्था से तिलमिला रहे है ,आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ चीख रहे है। आदमी चीखता तब है ,जब दर्द होता है।सरकार सुन नहीं रही तो इन्हे गुस्सा आ रहा है।
ये दलित भी बहुत गिड़गिड़ाया था -सवर्ण के सामने ,लेकिन सवर्ण वर्ग के पूर्वजों का कलेजा नहीं पिघला। जुल्म अत्याचार की पराकाष्ठा देखिये-उस समय का दलित ,पीड़ित ,शोषित वर्ग न तो सार्वजनिक कुओं -तालाबों से पानी भर सकता था और न मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर अपने भगवान की मूर्ति के दर्शन कर सकता था ,न इस दलित वर्ग के बच्चे पाठशाला में दाखिला ले सकते थे। यहाँ तक कि कुछ जाति के लोगों को नगर के बाहर ही झोपड़ी बना कर रहना पड़ता था। इस दलित वर्ग के लिए अंग्रेजों से भी बढ़कर सबसे बड़े दुश्मन यही सवर्ण कहलानेवाला वर्ग था।
जब जुल्म हद से गुजर जाता है ,तब जुल्म सहने वाला बाग़ी हो जाता है ,आँसू बहाने की बजाय वह शेर की तरह दहाड़ने लगता है। .वह जुल्म और अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा होता है …दीपक होकर भी आँधियों को भी चुनौती देने लगता है
जब ब्राह्मणों की पाखण्ड की आँधी चल रही थी -महाराष्ट्र के पुणे नगर में ११ अप्रैल ,१८२७ को एक ज्योति प्रज्वलित हुई – जिसने अज्ञानता के अँधेरे को मिटाने का दुस्साहस दिखाया ,दलित को मनुष्य होकर मनुष्य की तरह जीने का भाव जाग्रत किया। जिसने शिक्षा के महत्त्व को जाना और इसी शिक्षा को शस्त्र बनाकर सामाजिक कुरीतियों की शृंखला में जकड़ी हुई नारी को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।
ज्योतिबा का जीवन प्रेरणा हैं हम सब के लिए .. यदि इरादों में मज़बूती हो तो विपरीत स्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। स्वयं को आहूत करके ही अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
इतिहासकर मानते है कि देश को कमज़ोर विदेशी आक्रमणकारियों ने बनाया किन्तु इस बात की ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि देश के दलित वर्ग को राष्ट्र शक्ति का हिस्सा माना ही नहीं गया ,उन्हें हमेशा अलग-थलग रखा गया। उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश ही नहीं की गई,इसीलिए इस वर्ग ने भी पैदा होकर जीने को विवशता मान लिया। ऐसे ही वर्ग का उद्धार करने का ज्योति बा ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और आजीवन इसी उद्देश्य पूर्ति में समर्पित हो गए।
महात्मा ज्योति बा का यह कार्य साहसिक इसलिए भी कहा जायेगा क्योकि उनका यह कार्य उस समय प्रारम्भ किया था जब ब्राह्मणवाद का वर्चस्व शिखर पर था। धार्मिक अन्धविश्वास ,जातिगत भेदभाव ,असमानता और अस्पर्शता जैसी कुरीतियां गहराई तक जड़े जमा चुकी थी ,इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाना किसी चुनौती से कम न था।
ज्योति बा जान गए थे शिक्षा के द्वारा ही सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। इसीलिए विरोधों के उपरांत भी वे स्वयं शिक्षित हुए ,अपनी अनपढ़ पत्नी को शिक्षित बनाया ,फिर दोनों ने मिलकर अशिक्षित बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए बालिका विद्यालय की स्थापना की। स्वर्ण वर्ग द्वारा विरोध हुआ किन्तु ज्योति बा विरोध के उपरांत भी निर्भीकता के साथ अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे। अपने पिता का भी विरोध सहना पड़ा। ब्राह्मणों द्वारा उनके पिता पर इतना दबाव डाला गया कि पिता ने अपने बेटे-बहू को घर से निकल दिया।ज्योति बा ने पिता से अलग होना स्वीकार कर लिया किंतु अपने सिंद्धान्तों को अपने से अलग नहीं होने दिया।
बालिका शिक्षा का सूत्रपात ज्योति बा ने ही किया था। नारी उद्धार के लिए विधवा द्वारा केश मुंडन का विरोध और विधवाओ के पुनर्विवाह का समर्थन करना उस समय के लिए निस्संदेह एक साहसिक कार्य था।
ज्योति बा ने पृथक -पृथक सम्प्रदायों का समन्वय करने के उद्देश्य से सत्य शोधक समाज की स्थापना की ,जिसे उस समय के प्रबुद्ध वर्ग द्वारा समर्थन भी प्राप्त हुआ। ज्योति बा की बढ़ती लोकप्रियता से कट्टरवादी ब्राह्मण भयाक्रांत हो उठे। बताया जाता है कि ज्योति बा के बढते प्रभावों को देखते हुए उनकी हत्या का षडयंत्र भी रचा गया था।
ज्योति बा ने सामाजिक वैमनस्य और विरोधाभासों का अंत करने के लिए जो वैचारिक चेतना की अलख जगाई ,उसे जीवन की अंतिम सांस तक प्रज्वलित रखा।
ज्योति को महात्मा बुद्ध और भीमराव अम्बेडकर की बीच की कड़ी कहा जा सकता है। २६ नवम्बर १८९० को ज्योति बा की जीवन ज्योति बुझ गई किन्तु उनके विचारों की अलख अब भी प्रज्वलित है।





No Comments