गीत-2 – महादेवी वर्मा
1.
पंथ होने दो अपरिचित ,प्राण रहने दो अकेला!
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले वह घिरा घन;
और होंगे नयन सूखे, तिल बुझे औ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ , शत विद्युतों में दीप खेला!
भावार्थ- महादेवी वर्मा रचित गीत -2से उद्धृत इस काव्यांश में महादेवीजी कहती है कि भले ही तुम्हारा साधना-पथ अनजान हों और तुम्हारा उस मार्ग पर साथ देने वाला कोई नहीं हो, फिर भी आपको घबराना नहीं चाहिए और तुम्हारी स्थिति डगमगानी नहीं चाहिए। महादेवी जी कहते हैं कि भले ही आज मेरी छाया मुझे अमावस्या के गहरे अन्धकार के समान घेर ले और मेरी काजल लगी आँखें बादलों की तरह रोने लगें,मुझे चिंता नहीं । जिनकी आँखें कठिनाइयों को देखकर सूख जाती हैं, जिनके तारे निर्जीव और धुंधले हो जाते हैं, और जिनके आँखों की पलकें रोते रहते से रूखी हो जाती हैं, वे किसी और की होंगी।विघ्न-बाधाओं से मैं घबराने वालों में से नहीं हूँ। मेरी दृष्टि में आर्द्रता तो रहेंगी ही , मेरे जीवन के दीपों ने सैकड़ों विद्युतों में खेलना सीखा है। मुसीबतों से घबराकर पीछे हटना मेरा स्वभाव नहीं है।
2.
अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शूल की संकल्प सारे;
दुरूखव्रती निर्माण उन्मद, यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति, से तिमिर में स्वर्ण बेला!
भावार्थ- महादेवी वर्मा रचित गीत-2 से उद्धृत इस काव्यांश में महादेवीजी कहती है कि वे कोई अन्य ही चरण होंगे जो अपनी हार स्वीकार कर मार्ग के काँटों को अपना संकल्प समर्पित करके निराश व हताश होकर लौट जाते हैं,मै उनमे से नहीं हूँ । मैं निराश या हताश नहीं हूँ। दुःख सहने का व्रत मेरे चरणों ने धारण किया है।मेरे चरणों को नवनिर्माण का स्पर्श पाने की प्रबल इच्छा है। मेरे चरण स्वयं को अमर समझते हुए प्रिय के पथ को निरंतर नाप रहे हैं. इस तरह, मेरे लक्ष्य से आत्मा और परमात्मा के मिलन की दूरी घटती जा रही है।मेरे चरणों में दृढ़ता हैं। अन्धकार को स्वर्णिम प्रकाश में बदल देने का सामर्थ्य रखते है ।इसी दृढ़ता से भयानक अन्धकार भी आशाओं से बदल जाएगा।इस तरह लक्ष्य हासिल हो जायेगा ।
3
दूसरी होगी कहानी,
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी,
आज जिस पर प्रलय विस्मित, मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ , चिनगारियों का एक मेला!
भावार्थ- महादेवी वर्मा रचित गीत -2 से उद्धृत इस काव्यांश में महादेवीजी कहती है कि जब तक मैं अपने लक्ष्य, परमात्मा को नहीं पा लूँगी, तब तक मेरा साधना स्वर शांत नहीं होगा। साधना का यह कठिन रास्ता भी मेरे लिए अनजान नहीं होगा। महादेवीजी कहती हैं कि मैं अपनी आध्यात्मिक शक्ति से अपने दृढ़ निश्चय या संकल्प से उस पथ पर पद चिह्नों बनाऊँगी, जिन्हें मिटाना समय की धूल के लिए भी मुश्किल होगा। मैं उस परमात्मा को अपनी दृढ इच्छा शक्ति से प्राप्त करके ही रहूँगी । दृढ इच्छा शक्ति से प्रलय भी आश्चर्यचकित होगा ।
उस प्रियतम परमात्मा को पाने के लिए मैं अपने आँसुओं का खजानेका बाजार लगा रही हूँ,ताकि ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर होने के लिए मेरे जैसे अन्य साधकों में भी इन मोती जैसे आँसूओं का प्रकाश जाग्रत हो अर्थात ईश्वर प्राप्ति का भाव उत्पन्न हो ।
4 हास का मधु दूत भेजो,
रोष की भ्र-भंगिमा पतझार को चाहे सहेजो।
ले मिलेगा उर अंचचल, ,वेदना-जल, स्वप्न-शतदल,
जान लो वह मिलन एकाकी, विरह में है दुकेला!
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!
भावार्थ- महादेवी वर्मा रचित गीत -2 से उद्धृत इस काव्यांश में महादेवीजी कहती है कि हे प्रिय! तुम मेरें लक्ष्य को प्रभावित करने के लिए चाहे मुस्कान रूपी दूत भेजो या फिर क्रुद्ध होकर मेरे जीवन में पतझड़-सी नीरवता का संचार कर दो किन्तु मेरे हृदय में तुम्हारे लिए कोमल भावनाएँ यथावत बनी रहेंगी।अपने हृदय की भावनाओं से पूर्ण वेदना के जल और स्वप्नों का कमल पुष्प लिए तुम्हारी सेवा में सदैव उपस्थित रहूँगी, मुझे विश्वास है मै तुम्हें अवश्य पा लूंगी।तुमसे मिलने के उपरान्त मेरा स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जायेगा ; मुझे तुमसे अलग कोई स्वतंत्र सत्ता की भावना नहीं होगी , लेकिन वियोग की स्थिति में यह भावना औरअनुभूति और अधिक तीव्र हो जाती है। हे प्रियतम! तुम्हें पाने का रास्ता बहुत कठिन और अपरिचित है, लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं है। मैं अपने दृढ़ संकल्प से तुम्हें अवश्य पा जाउंगी ।




No Comments