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kaikeyee ka anutap- maithili sharan gupt,kavya bhavarth,12-hindi,up board , कैकेयी का अनुताप-मैथिलीशरण गुप्त

September 21, 2023
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kaikeyee ka anutap- maithili sharan gupt

कैकेयी का अनुताप-मैथिलीशरण गुप्त

भावार्थ

1.

तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,

नीले वितान के तले दीप बहु जागे।

टकटकी लगाए नयन सुरों के थे वे,

परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।

उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर

करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर।

 वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,

प्रभु बोले गिरा, गम्भीर नीरनिधि जैसी।

भावार्थ:मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में मैथिलीशरण गुप्त कहते है कि कैकेयी और भरत सहित अयोध्यावासियों के पंचवटी पहुँचने के बाद रात्रि में श्रीराम की कुटिया के सामने बैठाई गई, जिसे देखकर ऐसा जान पड़ता था कि आकाश के मण्डप के नीचे कई दीपक जल रहे हैं।

आकाश में चमकते तारें ऐसे जान पद रहे थे मनो देवताओं की आँखें हो और वें  सभा में लिए जाने निर्णय का परिणाम जानने के लिए उत्सुक देवतागण टकटकी लगाये दिखाई दे रहे हो  ।

 उन्हें डर था कि भरत के आगमन का कुछ और मतलब निकालकर श्रीराम ,कोई अन्य कठोर फैसला न करें।

वहाँ उपस्थित लोगों को खिले हुए करौंदे पुष्पों से भरे हुए बगीचों से रह-रह कर आने वाली मन्द, शीतल और सुगन्धित पवन ने पुलकित कर रही थी ।

वहाँ ऐसी सुंदर चाँदनी छिटक रही थी, जो अन्यत्र दुर्लभ थी ।

सभा ऐसी जान पड रही थी जैसे चन्द्रलोक ही भूतल पर उतर आया हो ।

अलौकिक दृश्यों से भरपूर उस शांत सभा  में श्रीराम ने बहुत गंभीर स्वर में बोलना शुरू किया, जो सागर की तरह था।

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2.

हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना”।

सब सजग हो गए, भंग हुआ ज्यों सपना।

“हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?

मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?

पाया तुमने तरु-तले अरण्य-बसेरा,

रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा?

तनु तड़प-तड़पकर तत्प तात ने त्यागा,

क्या रहा अभीप्सित और तथापि अभागा?

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में जब राम अपने अनुज भरत से कहते हैं कि अब तुम अपनी इच्छा व्यक्त करो, तो वहाँ उपस्थित सभी लोग वैसे चौक जाते हैं, जैसे कोई सपना टूट गया हो . तात्पर्य  यह है कि सभी लोग राम-भरत की बातचीत सुनने और उसका परिणाम जानने के लिए व्यलुल  हो जाते हैं।राम की बात सुनकर भरत कहते हैं, “हे आर्य! अब मेरी क्या अभिलाषा शेष होगी, जब मुझे अयोध्या का एकछत्र राज्य और आपको वनवास मिल गया।”पिता भी दुखी होकर मर गए।ऐसे में इस अभागे की और कौन-सी इच्छा पूरी होनी है? इस प्रकार भरत ने दुःखपूर्ण शब्दों में राम के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त की।

3.

हा! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,

निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा।

अब कौन अभीप्सित और आर्य, वह किसका?

संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।

मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा,

हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा?”

प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा,

रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा

“उसके आशय की थाह मिलेगी किसको?

जनकर जननी ही जान न पाई जिसको?”

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में राम को अपनी व्यथा बताते हुए भरत कहते हैं कि विधाता ने मुझे इसी अपयश के लिए जन्म दिया था। उस व्यक्ति की क्या इच्छा शेष रही होगी, जिसका घर-संसार सब कुछ नष्ट हो गया है, अपनी ही माता के हाथों मेरा वध होने के लिए मैंने जन्म लिया है , जिसका घर-संसार सब कुछ नष्ट हो गया हो भला बताओ, आर्य, उसकी क्या मनोकामना शेष रह गई होगी ! आज मैं स्वयं को दोषी मानता हूँ। मैं खुद की उपेक्षा करता हूँ।अब आप ही बताओ, आर्य, अब भी मेरी कौन-सी मनोकामना रह गई होगी?भरत की ह्रदय विदारक कथन  सुनकर राम ने अपने अनुज को अपने ह्रदय से लगा लिया ।प्रसन्नता से श्री राम की आँखें भर आईं और भावुक होकर भरत की प्रशंसा करते हुए कहा कि जिसे जन्म देने वाली माता ही नहीं समझ सकी, भला कौन उसके हृदय की गहराई को समझ सकेगा।

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4.

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।”

चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी-स्वर को।

सबने रानी की ओर अचानक देखा,

वैधव्य-तुषारावृता यथा विधु-लेखा।

बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा,

वह सिंही अब थी हहा! गोमुखी गंगा-

हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना,

सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना

यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया,

अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में राम ने कहा कि भरत को उसकी माता भी नहीं पहचान सकी, तो कैकेयी ने कहा कि यदि यह सच है, तो मेरी अज्ञानता को भूलकर अपने घर लौट चलो। कैकेयी ने जो  कहा उसे सुनकर  सब विस्मित हो गए और अचानक उनकी ओर देखने लगे। श्वेत कपड़े पहनी हुई  कैकेयी उस समय ऐसी लगती थीं मानो वह  चाँदनी से ढकी हुई  हों। स्थिर बैठे हुए भी कैकेयी के मन में अनगिनत विचारों की तरंगें उठ रही थीं। आज रानी कैकेयी, जो कभी सिंहनी-सी लगती थी, दीनता से भरी हुई थीं। वह गोमुखी गंगा की तरह शांत, ठंडी और पावन थीं।।कैकेयी ने आगे कहा कि मैं भरत को जन्म देने  के बाद भी उसे  नहीं पहचान सकी। राम ने भी इसे अभी स्वीकार किया है। वह राम से कहती है कि यदि आपका कहना सही है तो अयोध्या वापस चलो।मैं अपराधी हूँ, भरत नहीं। मैंने ही  तुम्हें वन में भेजने का अपराध किया है। तुम मुझे जो भी दंड दो, मैं उसे मानूँगी , लेकिन घर चलो, अन्यथा लोग भरत को दोषी मानेंगे।

5.

दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है,,

पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है?,

यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ,,

तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ.,

ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो,

पाओ यदि उसमें सार उसे सब चुन लो।,

करके पहाड़-सा पाप मौन रह जाऊँ?”,

राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ?”,

थी सनक्षत्र शशि-निशा ओस टपकाती,,

रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती।,

उल्का-सी रानी दिशा दीप्त करती थी,,

सबमें भय-विस्मय और खेद भरती थी।

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में राम को भरत की सौगन्ध खाते हुए कैकेयी कहती हैं कि सौगन्ध खाने से व्यक्ति की दुर्बलता प्रकट होती है, लेकिन विवश नारी  के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। वह राम से कहती है, हे राम! भरत ने मुझे तुम्हारे वनवास के लिए नहीं उकसाया था। यदि इसमे सत्यता न हो तो मैं अपने पति की तरह अपने पुत्र को भी  खो दूँ। यह सब कहने से मुझे कोई नहीं रोके। सब लोग मेरी बात सुनें। यदि मेरे शब्दों में कोई सत्यता  है तो उसे मान लें। मैं इतना बड़ा पाप करके मौन रहूँ और कुछ भी पश्चाताप नहीं करूँ मुझसे यह अधिकार न छीने । कैकेयी ने यह सब रही थी ,तब तारों  भरी चाँदनी रात में ओस के रूप में आंसू बह रहे थे, और नीचे मौन सभा  हृदय को थपथपाते हुए रो रही थी।  कहने का तात्पर्य यह है कि कैकेयी के हृदय-परिवर्तन और उनके पश्चाताप को देखकर सभा में उपस्थित सभी लोग कैकेयी की संवेदना के सहभागियों के साथ  मानो प्रकृति ने भी कैकेयी को उसके  अपराध के लिए क्षमा कर दिया  हो। आज रानी कैकेयी पश्चाताप की आग में जलकर चारों ओर सदभाव की किरणें बिखेर रही थीं, जिसने अपनी अनुचित माँग से पूरे अयोध्या और वहाँ के निवासियों के  जीवन को त्रस्त  कर दिया था। भय, आश्चर्य और दुःख के भाव वहाँ उपस्थित लोगों में एक साथ छा गए।

6.

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क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी.

मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी।

जल पंजर-गत अब अरे अधीर, अभागे,

वे ज्वलित भाव थे स्वयं मुझी में जागे।

पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?

क्या शेष बचा कुछ न और जन में?

कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य-मात्र क्या तेरा?

पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा।

थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,

जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके?

छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे,

रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे?

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में मन्थरा को निर्दोष बताते हुए कैकेयी कहती हैं कि मन्थरा तो एक मामूली  दासी है। वह मेरी भावनाओं को कैसे बदल सकती है? वास्तव में मेरा मन खुद अविश्वासी हो गया था। कैकेयी ने अपने मन को अधीर और अभागा मानते हुए अपने अन्तर्मन से कहा कि मेरे देह  में स्थित है मन! ईर्ष्या-द्वेष से भरपूर वे तीव्र भाव मेरे अंदर ही जागे थे ।कैकेयी ने अगले ही क्षण सभा  को संबोधित करते हुए पूछा कि क्या मेरे मन में सिर्फ आग लगाने वाले भाव थे?क्या मैं ईर्ष्यालु और द्वेष से पूर्ण  नारी के अतिरिक्त और कुछ नहीं थी ?क्या मेरे मन का पुत्र-स्नेह या वात्सल्य का  कुछ भी मूल्य नहीं है? जिस पुत्र मोह के कारण मैंने अपराध किया , आज मेरा पुत्र मुझसे पराया व्यवहार कर रहा है। कैकेयी अपने किए गए कामों पर पछताते हुए कहती हैं कि मैं तीनों जगहों (धरती, आकाश और पाताल) मुझे क्यों न धिक्कारे, मेरे विरुद्ध  जो कुछ भी कह सकते  है कहे, लेकिन हे राम! मैं सिर्फ इतनी ही विनती करती हूँ कि मेरा भरत को पुत्र कहने का मेरा मातृपद अधिकार मुझसे न छीना जाए। ।

7.

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कहते आते थे यही सभी नरदेही,

“माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।”

अब कहें सभी यह हाय! विरुद्ध विधाता,-

“है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।”

बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,

दृढ़ हृदय ने देखा, मृदुल गात्र ही देखा।

परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,

इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा।

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी-

‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।’

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में कैकेयी कहती हैं कि युगों पहले मानव जाति में कहावत चली आ रही थी कि पुत्र, कुपुत्र भले ही हो, माता कभी कुमाता  नहीं हो सकती , लेकिन विधाता के नियमों के विरुद्ध अब सभी लोग कहेंगे कि  पुत्र कभी कुपुत्र नहीं  हो सकता चाहे माता कुमाता हो जाए।कैकेयी ने अपने दोष प्रकट करते हुए  कहती है  कि वह अपने पुत्र भरत के दृढ़ हृदय को नहीं समझ सकी, केवल बाहरी रूप ही देखा है। अब तक मैं सिर्फ उसके नरम शरीर को देख सकी, उसके परमार्थी स्वरूप को नहीं देख सका। यही कारण है कि आज मैं इन परेशानियों से घिरी हूँ और मेरा जीवन व्यर्थ  हो गया है। मैं अब युगों तक बुरी माता के रूप में जानी जाऊँगी। आने वाले यूह में लोग कहेंगे कि रघुकुल में एक अभागी रानी थी, जिसे अपने पुत्र ने छोड़ दिया था।

8.

निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा

“धिक्कार! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा”

“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,

जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।”

पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई-

“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।”

“हाँ! लाल? उसे भी आज गमाया मैंने,

विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने।

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में कैकेयी खेद व्यक्त करते हुए  कहती कि अब जन्म-जन्मान्तर तक मेरी आत्मा यह सुनने के लिए विवश होगी कि अयोध्या की रानी कैकेयी को बहुत बडे स्वार्थ ने घेर लिया और उसने धर्म के मार्ग को छोड़कर अधर्म का मार्ग चुना। कैकेयी की इन बातों को सुनकर राम सहित सभी ने एक स्वर में कहा कि भरत जैसे महान् पुत्र को जन्म देने वाली माता सौ बार धन्य हैं। सभासदों की बात सुनकर कैकेयी ने अपनी बात दोहराई और कहा कि हाँ, मैं उसी पुत्र की अभागी माता हूँ, जिसे मैंने अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर गवां दिया। वह पुत्र भी अब मेरा नहीं रहा । उसने मुझे माता मानने से  नकार दिया गया है। स्वार्थ के वशीभूत होकर मैंने न केवल अपना सब कुछ खोया , बल्कि  खुद को कलंकित भी कर लिया।

9.

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निज स्वर्ग उसी पर वार दिया था मैंने,

हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने।

पर वही आज यह दीन हुआ रोता है,

शंकित तबसे धृत हरिण-तुल्य होता है।

श्रीखण्ड आज अंगार-चण्ड है मेरा,

तो इससे बढ़कर कौन दण्ड है मेरा?

पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में,

जन क्या-क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में?

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में प्रायश्चित की आग में जलती हुई कैकेयी ने राम से कहा कि मैंने अपने उस पुत्र पर अपना स्वर्गीय सुख भी न्योछावर कर दिया था ,उसके लिए ही  मैंने तुम्हारा अधिकार  भी तुमसे  छीन लिया था। आज मेरा वही पुत्र दीन-हीन होकर विलाप कर रहा है। वह किसी पकड़े गए हिरन की तरह सबसे डर गया है। आज मेरा पुत्र भरत, जो चन्दन की तरह शीतल है, अंगारे की तरह ज्वालामुखी की तरह तप्त हो रहा  है। एक माता के लिए इससे बड़ा  दूसरा दंड क्या हो सकता है । राम! अब मुझे अधिक कठोर दण्ड मत दो। मैंने मोह में फँसकर अपने हाथ-पैर मोहिनी नदी में फेंके और पटके। मेरा व्यवहार पागलपन या सपने में किये गए गये व्यवहार की तरह था ,ऐसा मानते हुए मुझे माफ कर दो।

10.

हा! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी?

मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी।

हा दया! हन्त वह घृणा! अहह वह करुणा!

वैतरणी-सी है आज जाह्नवी-वरुणा!

सह सकती हूँ चिर, नरक, सुने सुविचारी,

पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी।

लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा,

मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा।

घर चलो इसी के लिए, न रूठो अब यों,

कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?

भावार्थ: मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में कैकेयी ने राम से  अपनी पीड़ा प्रकट  हुए कहा कि मेरे गंभीर अपराध के लिए जो भी दंड मिलेगा, वह कम होगा। मेरी दीनतापूर्ण याचना को सुनकर यह न समझा जाए कि मैं दण्ड से बच रही हूँ या दण्ड को स्वीकार नहीं कर रही हूँ। मेरे लिए आज दया, घृणा, करुणा जैसे शब्द व्यर्थ हो गए हैं। आज गंगा और वरुणा जैसी शुद्ध नदियाँ मेरे लिए नरक की भाँति हो गई हैं। मैं सभी बुद्धिमान लोगों के समक्ष कहती हूँ कि मैं नरक में लंबे समय तक रह सकती हूँ, लेकिन स्वर्ग पाने की प्रार्थना का बोझ मुझे नहीं उठाया जायेगा क्योंकि यह पीड़ा नरक की पीड़ा उससे कहीं ज्यादा  है। कैकेयी ने आगे कहा कि हे राम, मैंने अपने हृदय को वज्र-सा कठोर बनाकर जिसके लिए तुम्हें वन में भेजा था, आज उसी के लिए तुम रूठना छोडकर , घर चलो। मैं बहुत कुछ कहना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बातें कौन मानेगा?

11.

मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,

मेरे दुगुने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे।

मैं इसे न जानूँ, किन्तु जानते हो तुम,

अपने से पहले इसे मानते हो तुम।

तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,

यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा।

तो पाप-दोष भर पुण्य-तोष है मेरा,

मैं रहूं पंकिला, पद्म-कोष है मेरा,

आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर,

समझावें तुमको अतुल युक्तियाँ देकर।

उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा।

मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा,

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भावार्थ : मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘कैकेयी का अनुताप’ से उद्धृत इस काव्यांश में कैकेयी  राम से कहती है  कि हे पुत्र! मुझे भरत प्रिय है और भरत को तुम प्रिय हो। । इसलिए तुम मेरे लिए दोगुने प्यारे हो। इसलिए मुझसे अलग मत रहो। यद्यपि मैं अभी तक भरत को नहीं जान सकी, तुम तो इसे पूरी तरह जानते हो और इसे अपने आप से अधिक प्यार करते हो। तुम दोनों भाइयों के आपसी प्रेम के प्रभाव से आज मेरे पाप का दोष पुण्य के सन्तोष में बदल गया है। कैकेयी ने आगे कहा कि कीचड के समान हूँ ,किन्तु  मुझे खुशी है कि मैंने अपनी कोख से कमल रुपी रत्न भरत को जन्म दिया है। भविष्य में विद्वान लोग तम दोनों भाइयों के प्रेम को साबित करेंगे और उसे श्रेष्ठ सिद्ध करेंगे, जो होना भी चाहिए, लेकिन एक विवश माँ के लिए इन तर्कों  का महत्त्व नहीं है । अब इस धैर्यहीन माँ की एकमात्र इच्छा है कि वह आप दोनों को हर समय अपनी आँखों के सामने देखे। कभी अपने से दूर न होने दें। आज इस माँ का अधीर हृदय तुम्हें अपनी बाँहें फैलाकर अयोध्या लौटने की विनती करता है।

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