jrd tata- भारतीय नागरिक उड्डयन के जनक in hindi

भारतीय नागरिक उड्डयन के जनक
भारतीय नागरिक उड्डयन के जनक-JRD TATA के जन्म-दिन पर विशेष
२९ जुलाई -जन्म -तिथि
दुनिया में तीन तरह के लोग होते है –
एक वे जो अपना सम्पूर्ण जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर देते है
दूसरे वे जो केवल और केवल अपने व अपनों के लिए जीते है
तीसरे वे लोग जो अपना जीवन जीते हुए दूसरों के लिए भी जीते है
पहले और तीसरे तरह के लोग दुनिया को कुछ ऐसा दे जाते है कि जब भी ऐसे लोगों का जन्मदिन अथवा पुण्य -तिथि आती है ,दुनिया उन्हें याद करती है।ऐसी शख्सियत को याद भी किया जाना चाहिए क्योकि ऐसी शख्सियते हमारे हमारे दिमाग की सुसुप्त तंत्रिका -तंत्र को झंकृत कर जाती है ,कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा कर जाती है ,ह्रदय की शांत पड़ गई लहरों को फिर से तरंगित कर देती है।
इस सन्दर्भ में २९ जुलाई को उद्योगपति जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा का नाम रेखांकित किया जा सकता है ,जिनकी २९ जुलाई को जन्म तिथि है।
जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा ना केवल एक उद्योगपति थे ,बल्कि सामाजिक सेवाओं के प्रति उदारता भी रखते थे, जिन्हें भारतीय नागरिक उड्डयन का जनक भी कहा जाता है क्योकि इन्होंने ही भारत में सर्व प्रथम हवाई सेवा शुरू की थी जो वर्तमान में इंडियन एयरलाइन्स के नाम से जानी जाती है।जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा ने
कोई भी राष्ट्र केवल अपने आध्त्यामिक ज्ञान से आर्थिक रूप से संपन्न नहीं हो सकता। राष्ट्र को विकसित बनाने के लिए उस राष्ट्र का आर्थिक रूप से संपन्न होना भी आवश्यक है। देश को आर्थिक रूप से संपन्न और सुदृढ़ बनाने में उद्योगों की अहम् भूमिका होती है।
भारत जैसे देश में औद्योगिक संस्थाओ की स्थापना और विस्तार में जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा के योगदान को कम नहीं आँका जा सकता। आज टाटा समूह का का व्यवसाय ८०अधिक देशों में फैला हुआ है।इस्पात ,इंजीनिअरिंग ,वायुयान सेवा ,होटल जैसे विभिन्न क्षेत्रों की १०० से अधिक कम्पनियाँ टाटा समूह में शामिल है जबकि जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा ने अपनी शुरुआत १४ उद्योगों से की थी। टाटा समूह में आज लगभग ४.५० लाख कर्मचारी कार्यरत है। टाटा समूह का व्यवसाय आज ६,००,००० करोड़ से भी ज्यादा का है।
अपने कुशल नेतृत्व से टाटा समूह को शीर्ष पर पहुँचाने में जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा का महत्वपूर्ण योगदान है। नेतृत्वशीलता के बारे वे कहते थे कि नेतृत्वशीलता का अर्थ है दूसरों में जो सर्वोत्तम है ,उसे कैसे बाहर लाया जाये।इसके भावनाओं का भी दमन करना पड़ सकता है यद्यपि दुःख होता है किन्तु आवश्यक भी है। नेतृत्वशीलता के लिए आवश्यक है कि आप स्नेह से लोगों को साथ लेकर चले।
वे कहते थे कि जब भी नया प्रारम्भ करे संदेह की अपेक्षा विशवास के साथ करें। यदि कोई कार्य करो तो यह सोच कर करो कि यह मुझे ही करना है। प्रार्थना यह सोचकर करो कि सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर है।
वर्तमान में कुछ बड़े उद्योगों ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी के तहत समाज कल्याण के कार्य करना प्रारम्भ किया है , किन्तु जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा परहित सरिस धर्म नाही ,कर भला- हो भला ,जिओ और जीने दो ,दान ,परोपकार ,लोक-कल्याण की महत्ता का बोध बहुत पहले ही चुके थे । जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा ५० वर्षों तक सर दोराबजी टाटा के ट्रस्टी रहे। इनके कार्यकाल में ही सामाजिक उद्देश्य से जुड़े संस्थान TISS/TIFR और ( Asia का पहला और सबसे बड़ा cancer hospital )TATA MEMORIAL CENTER अस्तित्व में आ चुके थे। शासकीय कर्मचारियों को जो सुविधाएँ प्राप्त हो रही है ,ये सारी सुविधाएँ निजी क्षेत्र में जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा पूर्व में ही अपने कर्मचारियों को देने लगे थे। उन्होंने अपने कर्मचारियों को के हित के लिए नई नीतियां लागू की। उन्होंने कंपनी के मामलों में एक मजबूत आधार देने के उद्देश्य से प्रबन्धन के साथ कर्मचारी एसोसिएशन की शुरूआत की। आठ घंटे काम ,निःशुल्क चिकित्सा सुविधा , कर्मचारी दुर्घटना क्षति -पूर्ति जैसी योजनाओं को क्रियान्वित किया। जन-कल्याण ,परोपकार ,परमार्थ जैसे कार्यो के लिए मुक्त हस्त से दान दिया। अमेरिका के हॉवर्ड बिज़नेस स्कूल को २२० करोड़ कादान देकर उन्होंने अपने ह्रदय की विशालता का परिचय दिया। सेवा की इस पवित्र भावना को अपनाकर उन्होंने सामाजिक दायित्व उदारतापूर्वक निर्वाह किया। निर्वाण से पूर्व वे अपने सामाजिक ऋण से उऋण होकर गए।
अपने उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म -विभूषण (१९५७) और भारत रत्न (१९९२)से सम्मानित किया।
भारत को आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान करने वाले जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा के इस उद्धरण का उल्लेख किया जाना अन्य उद्यमियों के लिए प्रेरक वाक्य होगा –
पैसा खाद की तरह है ,इसको इकट्ठा करोगे तो बदबू पैदा करेगा ,और यदि इसको फैलाकर कहीं डालोगे तो यह बहुत बढेगा।








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