hindi poem

hindi poem
hindi poem-दरिया में समंदर नहीं गिरता
हम तो दरिया है ,अपना हुनर जानते है
हम जहां से जाएंगे ,रास्ता हो जायेगा
हमें मंज़िलों की परवाह नहीं
जहां रुकेंगे वही मुकाम हो जायेगा

जहां रुकेंगे वही मुकाम हो जायेगा

हालत के कदमों पर कलंदर नहीं गिरता
टूटे भी तो तारा ज़मीं पर नहीं गिरता
गिरते है समंदर में बड़े शौक से दरिया में
लेकिन किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता
सब कुछ मिल सकता है
सच्ची गर चाह हो
मान लो हारना गुनाह हो
जिद की धूप में
ना आराम की पनाह लो
ना मुश्किलों की थाह लो
चुभे चाहे जितने काँटे
होंठों पे ना आह हो
ना कराह हो
थमेंगे अब पैर वही पर
सच्ची गर चाह हो
मान लो हारना गुनाह हो
जिद की धूप में
ना आराम की पनाह लो
ना मुश्किलों की थाह लो
चुभे चाहे जितने काँटे
होंठों पे ना आह हो
ना कराह हो
थमेंगे अब पैर वही पर
जहाँ पे मुकाम हो
जंग अँधेरे से
अब करने की ठानी है
अब करने की ठानी है
हौसलों की आग में
इरादों की तलवार ढाली है
हाथ में है छीनी -हथौड़ा
पर्वतों को चीरकर
निकल जाएंगे हम
इरादों की तलवार ढाली है
हाथ में है छीनी -हथौड़ा
पर्वतों को चीरकर
निकल जाएंगे हम
सूरज के गांव पहुँचकर ही
अब थमेंगे कदम
अब थमेंगे कदम







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