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hanuman jayanti -maha bahu-veer bali -bajarang bali in hindi

March 29, 2018
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महा बाहु -वीर बली -हनुमान जयंती  पर विशेष

Hindi Hindustani
महा बाहु -वीर बली -हनुमान

        
 अतुलित बलधानम ,हेम  शैलादेहं  
        दनुज वन कृशानु नामग्रगण्यं 
        सकल गुण निधानं वाना राणादिशम 
        रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि 

आज  संकट मोचन ..महावीर .. महाबली   बल ,बुध्दि और ज्ञान के प्रदाता हनुमानजी का जन्मोत्सव है।
आज हम यहाँ तथाकथित बुद्धिजीवियों और आधुनिकवादियों  की भाँति पौराणिक ग्रंथों में वर्णित उन  प्रसंगों  को  विषय नहीं बनायेगे कि  हनुमानजी केसरी के पुत्र थे या पवनदेव देव के  या   भगवान शंकर के  …. उनका जन्म हरियाणा राज्य में हुआ था गुजरात राज्य में  …. उनका नाम हनुमान क्यों पड़ा  ? हनुमानजी को सिन्दूर ही क्यों लगाया जाता है ? इन्हे बजरंगी क्यों कहा जाता है ? क्या वे वास्तव में शिव के  रुद्रावतार थे ? क्या चैत्र मास की पूर्णिमा को ही उनका  जन्म  हुआ था ? यदि हनुमानजी ब्रह्मचारी थे तो वे मकरध्वज के पिता कैसे बने ? क्या हनुमानजी आज भी है ?यह ऐसे विषय जो विवाद उत्पन्न करते है। अपने आराध्य के प्रति सिर्फ और सिर्फ आस्था ,विश्वास श्रद्धा और समर्पण ही होना  चाहिये ..  बुद्धि और तर्क संशय और भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते है … हम सामान्य मनुष्य तो ईश्वरीय प्रेम की अनुभूति कृष्ण की गोपियाँ बन कर ही  अनुभुत  कर सकते है,जिसमे तर्क और बुद्धि का कोई स्थान नहीं । हनुमान जयंती के इस अवसर पर हम यह चिंतन -मनन करें  कि कोई भी जीव कैसे देव तुल्य पूजनीय  बन सकता है। हनुमानजी का जीवन चरित हम सामान्य मनुष्यों के लिए एक उद्धरण है।   
             हनुमानजी के सम्पूर्ण जीवन चरित के  अध्ययन से यह निर्विवादित रूप  से  प्रामाणित हो जाता है  कि  यदि  कोई  अपनी समस्त इन्द्रियों को वश में करके  मन ,वचन और कर्म से अपने आप को किसी लक्ष्य या उद्देश्य के लिए समर्पित कर दे ,तो निश्चित रूप से वह देव तुल्य पूजनीय हो जाता है ।सेवक होकर भी स्वामी बन सकता है  हनुमानजी का जीवन चरित इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है
           किसी का भी कुल या जन्म स्थान उसे महान नहीं बनता ,उसे महान  और पूज्य बनाते है -सद्कर्म और सदाचरण  …हनुमानजी इसलिए पूजनीय नहीं बने कि  उनके पिता केसरी या पवनदेव या भगवान शंकर थे। ..उनकी देह वज्र के समान  थी  या कि  वे शिव के रूद्र अवतार थे  ,,,उन्हें पूजनीय बनाया  उनकी समर्पित स्वामी भक्ति ने  ,उनके अपूर्व त्याग ने ,, उनकी निरभिमानिता ने .. ..  .उनकी वीरता ने  … उनकी  बुध्दि चातुर्यता ने  …. सेवा भावना ने   ….. उनकी सदाचारिता ने … यही वे गुण  है, जो मानव को भी देवतुल्य पूजनीय बना देते है ..
         इन्ही गुणों के कारण हनुमानजी अपने भक्तों के प्रिय है ,इन्ही गुणों के कारण  भक्त उनके श्रध्दालु बने।
          सेवक होना  हनुमानजी की पहचान भी है। सेवक क्या होता है और सेवा कैसे की जाती है  ,अगर हमारे देश के राजनेताओ को  यह सीखना है तो हनुमान जी से बढ़कर  और कोई दूसरा उदहारण नहीं हो सकता। देश के नेताओं को अपनी गिरेबान में झांककर देखना चाहिए की जो अपने आपको सेवक कहते है ,क्या उनमे सेवक कहलाने के गुण  है ?सच्ची सेवा का अधिकार तन ,मन ,धन ,यश और भोग का त्याग करके ही प्राप्त होता है। राज नेताओं के मुख से स्वयं को सेवक कहना सच्चे सेवक की प्रतिष्ठा को कलंकित करना है।
          कोई भी जब अच्छा कार्य करता है ,अच्छा कार्य उसे ऊपर उठता है ,उसे सम्मान प्राप्त होता है  ,उसका यश फैलता है ,उसकी प्रशंसा होती ,उसकी प्रतिष्ठा में अभिवृध्दि होती,किन्तु इन सब के साथ -साथ अहंकार भी आता है और यही अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता ह। कहा भी गया है -अभिमानं सुरपानं अर्थात  अहंकार सुरापान के सामान है। किन्तु हम हनुमानजी के जीवन चरित से सीख सकते है कि  यश प्राप्ति के उपरांत भी निरभिमानी कैसे रहा जा सकता है  ?
           भक्ति मार्ग पर निरभिमानी होकर ही चला जा सकता है। लंका दहन के पश्चात् जब हनुमान जी लौटकर आये तो भगवान श्री राम ने हनुमानजी की बहुत प्रशंसा की ,किन्तु अपनी प्रशंसा सुनकर भी हनुमानजी में थोड़ा भी अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ। हनुमानजी ने इस कार्य का श्रेय स्वयं  न लेकर  बड़ी विनम्रता से कहा -सो सब तव प्रताप रघुराई ,नाथ न कछू मोरी प्रभुताई
यह है विनम्रता  …. यह है निरभिमानता ,,,क्या यह गुण  ग्राह्य नहीं है ?
                       हनुमानजी से बुध्दि चातुर्य का गुण  भी उद्धरित किया जा सकता  है क्योकि हनुमानजी चतुर शिरोमणि भी थे। अपने बुध्दि चातुर्य से उन्होंने अपने स्वामी भगवान श्री राम की विजय का मार्ग भी आसान बना दिया। युध्द में विजय के लिए रावण ने शक्ति की देवी को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ का आयोजन किया। यदि यह यज्ञ सफल हो जाता तो रावण विजय का वरदान प्राप्त करने में सफल हो जाता किन्तु हनुमानजी ने रावण द्वारा युध्द विजय के प्रयोजन से किये जा रहे यज्ञ में मन्त्र का अर्थ परिवर्तन करवा दिया। वह मन्त्र था-
जय त्व  देवी चामुण्डे जय भूतार्ति हारिणि
जय सर्वगते देवी काल रात्रि  नमोस्तु ते
इस मन्त्र में हनुमानजी ने भूतार्ति हारिणि शब्द में की जगह   करवा लिया और  भूतार्ति हारिणि भूतार्ति कारिणि  में परिवर्तित हो गया ,इससे अर्थ – पीड़ा हरनेवाली की जगह पीड़ित करने वाली हो गया । इस प्रकार हनुमानजी ने अपने बुध्दि चातुर्य से रावण का विजय हेतु किया जानेवाला यज्ञ विफल कर दिया । इसी लिए हनुमानजी को बल के साथ बुध्दि प्रदाता भी माना गया है।
अब तो मेरे बुध्दिवादी मित्रों को समझ में आ गया होगा  कि सेवक अर्थात छोटा होकर भी महान बना सकता है। मनुष्य को  मान -सम्मान ,यश -प्रतिष्ठता कर्म से प्राप्त होती है …अपने सद्कर्मों से वे पूजनीय बनते है ,उनकी कीर्ति सदैव गूंजती है  … मस्तक चरण वंदना में नत  होते है  …जय-जय कर होती है। … हनुमानजी इसीलिए पूजनीय है  …. वंदनीय है ..  प्रात:स्मरणीय है

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यह चित्र देख रहे है  आप -हनुमानजी की पूरी देह पर सिन्दूर लगा हुआ है -हनुमानजी की देह पर सिन्दूर क्यों लगाया जाता है ? इसके बारे में किवदंती प्रचलित है कि जब हनुमानजी को ज्ञात हुआ  कि  मस्तक पर सिन्दूर लगाने से स्वामी की आयु बढती है ,तो उन्होंने अपने स्वामी श्री  राम की दीर्घ आयु के लिए अपनी पूरी देह पर ही सिन्दूर लगा लिया  

सतही रूप से बात सामान्य जान पड़ती है ,किन्तु अंतर में अपने स्वामी के प्रति हित कामना निहित है। 

हम सब भी सेवक है -ईश्वर के..   पृथ्वी माता के ..  राष्ट्र के  …. माता -पिता के  … क्या हम में  है  ऐसी  हित भावना  ? यह एक विचारणीय  …. .चिंतनीय प्रश्न है हम सब के लिए 

यह दूसरा चित्र देखिये – ह्रदय में भगवान श्री राम  और सीता दिखाई दे रहे है

प्रचलित मान्यता के आधार पर  यह माना जाता है कि एक बार माता सीता ने हनुमानजी को एक बहुमूल्य की माला दी ,जिसे हनुमानजी ने तोड़ कर फेंक दिया। सीता द्वारा कारण  पूछने पर हनुमानजी ने अपना ह्रदय चीरकर राम-सीता का चित्र दिखाते हुए कहा कि इससे अधिक मूलयवान मेरे अन्य कुछ नहीं
हनुमानजी का यह  कथन कितना गहरा अर्थ छिपाये हुए है
 जिससे हम निस्वार्थ प्रेम करते है -वह हमारे ह्रदय में बसा होता है।
ऐसा ही प्रेम हम भारतीयों में इस धरती माता के प्रति हो ,जिसके हम पर अनेकानेक उपकार है
ऐसा ही भाव राष्ट्र के प्रति हो जो हमें पहचान देता है
ऐसा ही भक्ति भाव माता-पिता के प्रति हो , जिनके  ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है
ऐसा ही प्रेम ,ऐसा ही समर्पण ,ऐसा ही भक्ति भाव हमारे ह्रदय में हो ,यही सन्देश देता है यह चित्र हम भारतीयों को 
हनुमानजी बल ,बुध्दि ,विद्या और भक्ति के प्रदाता है। हम सब उनसे बल ,बुद्धि ,विद्या और भक्ति का वरदान माँगते है  …. माँगा उसी से जाता है ,जो इन सब का स्वामी हो  ….. और हनुमानजी इन सब के स्वामी है –
जय जय हनुमंत संत हितकारी ,सुन लीजे प्रभु अरज़ हमारी 
अब विलम्ब केहि कारण स्वामी ,कृपा करहु उर  अन्तर्यामी 
जय-जय हनुमंत अगाधा ,दुःख पावत जन  केहि अपराधा 
अपने जन को तुरत उबारो ,  सुमिरत होय आनंद हमारो 
बल ,बुद्धि विद्या देहु मोहि ,हरहु कलेस विकार 
हनुमान जयंती पर विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में हनुमान जी से सम्बंधित विभिन्न लेख प्रकाशित होंगे। उन लेखों को पढ़कर कई बातें ऐसी होगी जो परस्पर विरोधाभास लिए होंगी ,यथा-उनकी उत्पत्ति को लेकर ..  ,पिता के नाम को लेकर  …उनके जन्म स्थान को लेकर उनके देह त्याग और अमरता को लेकर  …उनकी मुखाकृति को लेकर  … ये ऐसी बातें है जो पाठक और भक्तों को दुविधा में डाल देती है कि आखिर सत्य क्या है ?कई ऐसी घटनायेँ उनके जीवन के साथ जुडी हुई है जो अविश्वसनीय और काल्पनिक जान पड़ती है।
      सामान्य वर्ग अपनी आस्था ,विश्वास और श्रध्दा के कारण बिना प्रमाण के भी यह स्वीकार कर लेता है कि  ऐसा हुआ होगा अथवा ऐसा ही है ,किन्तु स्वयं को बुध्दिजीवी और आधुनिकवादी तर्क देकर प्रमाणिकता की बात उठाते है। अपना पाण्डित्य प्रदर्शित करते हुए अपने अकाट्य तर्कों से दूसरों की आस्था और विश्वास को भी हिला कर रख  देते है।  धर्म ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं और तथ्यों का खंडन करते है। विश्वास करनेवालों को अंध -विश्वासी ,रूढ़िवादी ,धर्मान्ध और  अल्पज्ञ जैसे  शब्दों से  सम्बोधित करते है।

       लेकिन तथाकथित बुध्दिजीवी और आधुनिकवादी यह क्यों भूल जाते है कि  धर्म और ईश्वर प्रमाणों पर नहीं  ,आस्था और विश्वास पर  टिके होते है। वैसे भी धर्म और ईश्वर को प्रमाणिकता की आवश्यकता नहीं होती ,धर्म और ईश्वर स्वानुभूत -स्वानुप्राणीत होते है। क्या सूर्य को यह प्रमाणित करने की आवश्यकता पड़ती है कि  मै ही जग को प्रकाशित करता हूँ ?नहीं न ,

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