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शिक्षा, जे.कृष्ण मूर्ति
13- शिक्षा ( जे.कृष्ण मूर्ति )
प्रश्न 1।शिक्षा का क्या अर्थ है एवं इसके क्या कार्य हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर- जीवन सत्य का बोध और समग्र जीवन की प्रक्रिया को समझने में मनुष्य की सहायक पद्धति ही शिक्षा है , – पक्षी, फूल, वृक्ष, आसमान, सितारे, मत्स्य यें सब जीवन है। जीवन विलक्षण भी है और गूढ़ भी है, जीवन धनी भी है और निर्धन भी । मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ ईष्याएं, महत्वाकांक्षाएँ वासनाएँ, या सफलताएँ एवं चिन्ताएँ यें सब भी जीवन हैं ,बल्कि इससे कहीं ज्यादा । परीक्षाएँ उर्त्तीण लेना , आजीविका के लिए संघर्ष ,विवाहोपरांत संतानित्पत्ति ,सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते –करते मनुष्य यंत्रवत् बन जाता हैं।मनुष्य जीवन में चिन्तित और भयभीत बना रहता हैं। शिक्षा इन सभी का का निस्तारण और निराकरण करती है। भय के कारण मेधा शक्ति कुंठित हो जाती है, शिक्षा इसे दूर करती है। शिक्षा समाज के ढाँचे के अनुकूल बनने में सहायता करती है । सामाजिक समस्याओं का निराकरण करना ही शिक्षा का कार्य है।
प्रश्न 2।जीवन क्या है? इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है?
उत्तर-लेखक के विचारानुसार अखिल सृष्टि ही जीवन है। जीवन अद्भुत ,असीम और अगाध है। यह अनंत रहस्यों से भरा पड़ा है , यह एक व्यापक साम्राज्य है जहाँ प्राणी अपना-अपना कर्म करते हैं। लेखक जीवन की क्षुद्रताओं से व्यथित होकर कहते है कि आजीविका के लिए हम जीवन का पूरा लक्ष्य से खो देते हैं। पक्षी, फूल, वृक्ष, आसमान, सितारे, मत्स्य यें सब जीवन है। जीवन विलक्षण भी है और गूढ़ भी है, जीवन धनी भी है और निर्धन भी । मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ ईष्याएं, महत्वाकांक्षाएँ वासनाएँ, या सफलताएँ एवं चिन्ताएँ यें सब भी जीवन हैं ,बल्कि इससे कहीं ज्यादा ।
जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक संघर्ष है, ध्यान है, धर्म है , गूढ़ है, जीवन मन की प्रच्छन्न वस्तुएँ है-ईष्याएँ, महत्वाकांक्षाएँ, वासनाएँ, भय सफलताएँ एवं चिन्ताएँ। जीवन in सब से कहीं ज्यादा है। मनुष्य जीवन में भयाकुल, चिन्तित बना रहता हैं , शिक्षा जीवन को समझने में मदद करती है। शिक्षा इस विशाल विस्तीर्ण जीवन को, इसके समस्त रहस्यों को, इसकी अद्भुत रमणीयताओं को, इसके दुखों और हर्षों को समझने में सहायता करती है।
प्रश्न 3।बचपन से ही आपको ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो। क्यों?
उत्तर- बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना अत्यन्त आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो ,ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योकि बचपन से ही यदि व्यक्ति स्वतंत्र वातावरण में नहीं रहेगा तो व्यक्ति में भय का संचार हो जाता है। यह भय मन की में ग्रंथि बन जाता है और व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षा को दबा देता है। अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े हो जाते हैं त्यों-त्यों ज्यादा भय से ग्रसित होते जाते हैं, , नौकरी के छूटने से, परंपराओं से, मृत्यु से भयभीत और आशंकित रहते हैं ,यही नहीं इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी, पत्नी या पति क्या कहेंगे । अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत हैं । जहाँ भय है ,वहाँ मेधा नहीं है।इसलिए बचपन से ही ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ भय न हो, जहाँ स्वतंत्रता हो, एक ऐसी स्वतंत्रता जहाँ जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया समझ सकें। मनुष्य ने जीवन को कुरूप बना लिया है। जीवन के ऐश्वर्य और अनंत गहराई और अद्भुत सौन्दर्य की मान्यता को तभी महसूस करेंगे जब मनुष्य सड़े हुए समाज के खिलाफ विद्रोह करेंगा ताकि एक मानव की भाँति अपने लिए सत्य की खोज कर सकें।
प्रश्न 4।जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती। क्यों?
उत्तर- जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती ,ऐसा इसलिए कहा गया है क्योकि अधिकांश व्यक्ति ज्यों-ज्यों बड़े हो जाते हैं त्यों-त्यों ज्यादा भय से ग्रसित होते जाते हैं, , नौकरी छूटने से, परंपराओं से, मृत्यु से भयभीत और आशंकित रहते हैं ,यही नहीं इस बात से भयभीत रहते हैं कि पड़ोसी या अन्य क्या कहेंगे । अधिकांश व्यक्ति किसी न किसी रूप में भयभीत हैं । जहाँ भय है ,वहाँ मेधा नहीं है
भय के कारण मेधा शक्ति दब जाती है। मेधा शक्ति जिससे भय और सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता के साथ सोचा जा सकता हैं ताकि सत्य की खोज की जा सकें । यदि मनुष्य भयभीत होगा तो फिर वह कभी मेधावी नहीं हो सकेंगा, क्योंकि भय मनुष्य को किसी कार्य को करने से रोकता है। वह महत्त्वाकांक्षा फिर चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक, चिन्ता और भय को जन्म देती है। भय की स्थिति सुस्पष्ट , सीधे-सरल , मन का निर्माण करने में सहायता नहीं कर सकती ।भय की स्थिति में मेधा उपस्थित नहीं हो सकती ।
प्रश्न 5।जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है?
उत्तर- जब मनुष्य जीवन में ऐश्वर्य , अनंत गहराई और अद्भुत सौन्दर्य की धन्यता की अनुभूति कर लेता है ,तदुपरांत जीवन में तनिक भी कसमसाहट का भाव आता है ,तो वह संगठित धर्म के विरुद्ध, परंपरा के विरुद्ध और इस सड़े हुए समाज के विरुद्ध विद्रोह कर बैठता है, ताकि वह एक मानव की भाँति सत्य की खोज कर सके। अपने लिए सत्य की खोज ही जिन्दगी है और यह तभी संभव है जब वह स्वतंत्रत होगा , इसके लिए आवश्यक है कि उसके भीतर क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित हो। व्यक्ति सुरक्षित रहना चाहता है और सुरक्षा में जीने का अर्थ है अनुकरण में जीना अर्थात् भय में जीना। भय से मुक्त होने के लिए व्यक्ति को विद्रोह करना पड़ता है ।अतः जीवन में विद्रोह का महत्वपूर्ण स्थान है।
प्रश्न 6।व्याख्या करें
यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए निरंतर संघर्ष कर रहा है।
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ जे। कृष्णमूर्ति द्वारा लिखित संभाषण ‘शिक्षा’ से ली गई है। इसमें संभाषक कहना चाहते हैं हमने ऐसे समाज का निर्माण कर रखा है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के विरोध में खड़ा है।
यह व्यवस्था इतनी जटिल है कि यह शोषक और शोषित वर्ग में बँट गया है। मनुष्य के द्वारा मनुष्य का शोषण हो रहा है। एक-दूसरे पर वर्चस्व के लिए आपस में होड़ है। यह पूरा विश्व ही अंतहीन युद्धों में जकड़ा हुआ है। इसके मार्गदर्शक राजनीतिज्ञ बने हैं जो सतत् शक्ति की खोज में लगे हैं। यह दुनिया वकीलों, सिपाहियों और सैनिकों की दुनिया है। यह उन महत्त्वाकांक्षी स्त्री-पुरुषों की दुनिया है जो प्रतिष्ठा के पीछे दौड़े जा रहे हैं और इसे पाने के लिए एक-दूसरे के साथ संघर्षरत हैं।
दूसरी ओर अपने-अपने अनुयायियों के साथ संन्यासी और धर्मगुरु हैं जो इस दुनिया में या दूसरी दुनिया में शक्ति और प्रतिष्ठा की चाह कर रहे हैं। यह विश्व ही पूरा पागल है, पूर्णतया भ्रांत। यहाँ एक ओर साम्यवादी पूँजीपति से लड़ रहा है तो दूसरी ओर समाजवादी दोनों का प्रतिरोध कर रहा है। इसीलिए संभाषक कहता। है कि यहाँ प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी के विरोध में खड़ा है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने के लिए प्रतिष्ठा, सम्मान, शक्ति व आराम के लिए संघर्ष कर रहा है। यह सम्पूर्ण विश्व ही परस्पर विरोधी विश्वासों, विभिन्न वर्गों, जातियों, पृथक्-पृथक् विरोधी राष्ट्रीयताओं और हर प्रकार की मूढ़ता और क्रूरता में छिन्न-भिन्न होता जा रहा है ।
और हम उसी दुनिया में रह सकने के लिए शिक्षित किए जा रहे हैं। इसीलिए संभाषक को दुख है कि व्यक्ति निर्भयतापूर्ण वातावरण के बदले सड़े हुए समाज में जीने को विवश है। अतः हमें अविलंब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की अविलम्ब एक स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा ताकि हम उसमें रहकर अपने लिए सत्य की खोज कर सकें, मेधावी बन सकें ताकि हम अपने अंदर सतत् एक गहरी मनोवैज्ञानिक विद्रोह की अवस्था में रह सकें।
प्रश्न 7- नूतन विश्व का निर्माण कैसे हो सकता है ?
उत्तर- महत्त्वाकांक्षा तथा प्रतिस्पर्धा के कारण आज अखिल विश्व में अराजकता व्याप्त है। विश्व पतन की ओर अग्रसर है। वैश्विक पतन को रोकना मानव समाज के लिए एक चुनौती है। अभय होकर ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है । किसी धर्म विशेष के दृष्टिकोण से या साम्यवादी – पूँजीपति के दृष्टिकोण से न सोचें अपितु एक समग्र मानव की भाँति इस समस्या का हल खोजने का प्रयत्न करें। समस्या का हल तब तक नहीं खोजा जा सकता , जब तक कि हम सम्पूर्ण समाज और महत्वाकांक्षा के विरुद्ध क्रान्ति नहीं करेंगे , जिस पर मानव समाज आधारित है। इस चुनौती का प्रत्युत्तर तभी दिया सकता है जब हम महत्वाकांक्षी न होंगे , परिग्रही न होंगे, अपनी ही सुरक्षा से चिपके हुए न होंगे। सर्व हिताय की भावना से किये प्रयास से ही नूतन विश्व का निर्माण कर सकेंगे।
प्रश्न 8।क्रान्ति करना। सीखना और प्रेम करना तीनों पृथक-पृथक प्रक्रियाएँ नहीं हैं, कैसे?
उत्तर- विश्व में अराजकता व्याप्त है। समाज को अराजकता की स्थिति से निकालने के लिए जन क्रान्ति की आवश्यकता है। तभी सुव्यवस्थित समाज का निर्माण हो सकेंगा । यद्यपि यह चुनौतीपूर्ण है ,किन्तु इस ज्वलन्त समस्या का हल खोजना होगा । सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस चुनौती का उत्तर किस प्रकार देंगे । इस ज्वलंत समस्या की खोज में अराजक समाज के विरुद्ध क्रान्ति का शंखनाद करना होंगा तभी इस चुनौती का प्रत्युत्तर दिया जा सकेगा ।
अराजक समाज के विरुद्ध क्रान्ति चुनौतीपूर्ण है –कौन इस क्रांति का नेतृत्व करेगा ? जब न कोई गुरु हो न मार्गदर्शक। हर चुनौती एक नयी सीख दे जाती है। तब हमारा जीवन स्वयं गुरु हो जाता है और हम सीखते जाते हैं।मनुष्य जीवन पर्यंत सीखता है । जिस किसी वस्तु में सीखने के क्रम में गहरी दिलचस्पी रखते हैं ,उसके संबंध में प्रेम खोजते हैं। उस समय हमारा सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण सत्ता उसी में रहती है। इस महत्वकांक्षा को पूरा करने के क्रम में क्रान्ति, सीखना, प्रेम सब साथ-साथ चलते है। प्रेम, क्रान्ति और सीखना पृथक, प्रक्रियाएँ नहीं हैं।







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