geeta adhyay saar-18 (1)

geeta adhyay saar-18 (1)
१८ वाँ अध्याय-
जय श्री कृष्णा
पिछले अध्याय में तीन प्रकार की श्रद्धा ,आसुरी मनुष्य , सात्विक -राजस -तामस ,आहारी , यज्ञ -तप – दान के
तीन-तीन भेद ,ओम तत्सत के प्रयोग और असत कर्म का वर्णन हुआ था
इस अध्याय में कुल ७८ श्लोक है।
इस अध्याय को मोक्ष – संन्यास योग कहा गया है
इस अध्याय में संन्यास किसे कहते है ?
संन्यास कैसा हो ?
सन्यासी का आचरण व भाव कैसा हो ?
संन्यास का साधन एवं फल क्या होता है ?
त्याग क्या है ?
त्याग का साधन एवं फल क्या होता है ?
त्यागी कैसा हो ?
त्यागी का आचरण व भाव कैसा हो ?
भगवान् ने उपर्युक्त प्रश्नों का विस्तार से वर्णन किया है
श्री मदभगवत गीता का यह सार अठारहवाँ अध्याय है। इस अध्याय मे भगवान् ने पृथक से कोई नवीन तथ्य उद्घाटित नहीं किया अपितु पूर्वोत्तर कथन का ही उपसंहार किया है। सामान्य अर्थो में इस अध्याय को समस्त ज्ञान का निष्कर्ष अथवा उपसंहार माना जा सकता है।
जब अर्जुन ने संन्यास और त्याग के बारे मे विस्तार से जानने की इच्छा व्यक्त की तो भगवान् ने कहा कि सकाम कर्मों का परित्याग सन्यास है और कर्मफल के प्रति आसक्ति का नाम त्याग है।
क्या सभी कर्म त्याज्य है ?
इस पर भगवान् कहते है कि यज्ञ ,दान ,और तप त्याज्य नहीं है क्योकि ये अन्तः करण को पवित्र करनेवाले है ,किन्तु इन कर्मों को भी फल की आसक्ति त्याग कर ही करना चाहिए।
कर्तव्य कर्म भी त्याज्य नहीं है ,भ्रम के कारण कर्तव्य कर्म का त्याग तामसिक हो जाता है। सभी कर्म दुःखरूप है ,ऐसा मानकर अपना कर्तव्य कर्म त्याग दे ,तो वह त्याग के फल को प्राप्त नहीं करता ,क्योकि वह तामसिक त्याग है।
सात्विक कर्म तो वह है जो कर्म को कर्तव्य मानकर आसक्ति रहित होकर किया जाये।
सतोगुण त्याग वह होता है ,जिसमे साधक अशुभ कर्म से द्वेष और शुभ कर्म के प्रति आसक्त ना हो। मनुष्य के लिए सभी कर्मों का त्याग संभव नहीं ,किन्तु जो कर्मफल में अनासक्त , वही सच्चा त्यागी है।
मृत्योपरांत कर्म का फल आसक्ति का त्याग करने वाले को मिलता है।
साख्य सिद्धान्त के अनुसार कर्म सिद्धि के पांच कारण है -स्थूल शरीर ,प्रकृति के गुण रुपी कर्ता ,पांच प्राण ,इन्द्रियां और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवगण। इन पांच कारणों से ही मनुष्य उचित- अनुचित कर्म करता है। अशुद्ध बुद्धिवाला स्वयं को ही कर्ता मान बैठता है ,इसके विपरीत मैं कर्ता हूँ का भाव ना रखकर एवं कर्मफल के प्रति अनासक्त रहने वाला मनुष्य उन सारे प्राणियों को मारकर भी किसी को नहीं मारता और ना किसी पाप से बंधता है।
कार्य का ज्ञान ,ज्ञेय और ज्ञाता -ये तीनों कर्म की प्रेरणा है और इन्द्रियां ,क्रिया व कर्ता ये तीनों कर्म के अंग है।
आगे भगवान् ज्ञान के तीनों गुणों के बारे में बताते हुए कहते है कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य समस्त प्राणियों में एक ही परब्रह्म परमात्मा को समभाव से देखता है ,वह सात्विक ज्ञान है।
जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य प्राणियों के अस्तित्व में भेद देखता है ,वह राजसिक ज्ञान है।
जिस ज्ञान द्वारा मनुष्य शरीर को सर्वस्व मानकर उसमे आसक्त रहता है ,वह तामसिक ज्ञान है।
ज्ञान की भांति कर्म के भी तीन भेद है -जो कर्म शास्त्र विधि से नियत ,कर्मफल की इच्छा और आसक्ति से रहित होकर बिना राग -द्वेष से किया जाता है ,वह सात्विक कर्म होता है।
कर्मफल की आसक्ति से किया गया कर्म राजसिक कर्म होता है और जो कर्म बिना विचार किये भ्रमवश किया जाता है ,तामसिक कर्म कहलाता है।
भगवान् आगे कहते है की कर्म का कर्ता भी तीन प्रकार का होता है ,जो आसक्ति ,अहंकार से रहित होकर धैर्य और उत्साह से ,सफलता -असफलता के परिणाम से निर्विकार होकर कर्म करता है वह सात्विक कर्ता है।
जो राग द्वेष ,कर्मफल के प्रति आसक्ति ,लोभ ,परपीड़ा ,अपवित्र विचार हर्ष-शोक से युक्त होकर कर्म करनेवाला राजसिक कर्ता होता है।
असभ्य ,धूर्त द्वेषी ,आलसी ,उदास ,अयुक्त और दीर्घसूत्री कर्ता तामसिक कर्ता कहलाता है
१८ वें अध्याय का शेष भाग अगले अंक में प्रकाश्य
आत्मिक – निवेदन – अपने स्वजनों और मित्रों के साथ भगवान् की इस अमृत -वाणी को
अवश्य SHARE करें …. जय श्री कृष्ण ….. राधे-राधे







No Comments