Hindi Hindustani
Important Days

deen dayal upadhyay

February 10, 2017
Spread the love

deen dayal upadhyay

Hindi Hindustani

deen dayal upadhyay

पंडित दींन  दयाल उपाध्याय

पंडित दींन  दयाल उपाध्याय स्मृति 
Hindi Hindustani११ फरवरी ,१९६८
पुण्य -तिथि

 

 ११ फरवरी ,१९६८ को मुग़ल सराय रेलवे यार्ड में एक लाश मिली –
यह लाश थी पंडित दीन  दयाल उपाध्याय की 
किसने की थी यह हत्या ?
कौन था हत्यारा ?
क्या था इस हत्या का मक़सद ?
ये सारे सवाल संदेह पैदा करते है ,आखिर क्यों हुई थी इस  शख्स की हत्या ?
यह राज़  पंडित दीन  दयाल उपाध्याय की बंद आँखों की तरह ही हमेशा -हमेशा के लिए बंद हो गया और उनकी चिता की राख के साथ ही राख होकर बिखर गया 
हत्या के जो कारण बताये गए  उसमे कयास ज्यादा और हक़ीक़त कम थी 
यह तो निश्चित है कि इस शख्स का ज़िंदा रहना किसी को अपने  लिए खतरा लग रहा था। 
पंडित दीन  दयाल उपाध्याय किसके लिए और किस तरह का खतरा थे इस पर बिना प्रमाण के टिपण्णी करना विवाद का विषय बन सकता है लेकिन इस शख्स का इस तरह का अंत का ध्यान  एक टीस से भर देता है। एक हूंक  सी उठ जाती है इस शख्स को याद कर। 
यहां हम पंडित दीन दयाल उपाध्याय व्यक्तित्व  आकलन राजनितिक दृष्टिकोण अथवा संघ के प्रमुख नेता के रूप में नहीं वरन कृतित्व के आधार पर करेगे।
Hindi Hindustaniपंडित दीनदयाल सच्चे अर्थों में एक राष्ट्र वादी थे। ऐसे राष्ट्रवादी जिसकी देश को ज़रुरत थी। वे विचार-क्रान्ति  के अग्रदूत थे। देश और सामाजिक परिवर्तन के प्रबल समर्थक थे। श्याम प्रसाद मुखर्जी ने पंडित दीन  दयाल उपाध्याय की प्रतिभा से प्रभावित होकर कहा था -यदि देश को दो  दींन  दयाल मिल जाते तो देश का राजनितिक परिदृश्य कुछ और ही होता। लोगों ने उन्हें सिर्फ संघ के नेता के रूप में देखा ,जबकि वे  कुशल संगठक ,राजनीतिज्ञ ,लेखक ,चिंतक और प्रखर वक्ता ,दार्शनिक ,समाज-शास्त्री  जैसे गुणों से  भी सम्पन्न  थे। एक साथ कई प्रतिभावों से सम्पन्न  होना उन्हें एक विशिष्ठ पहचान देता है। 
सत्ता पक्ष के विरोधी होने के कारण दुर्भावना ग्रसित लोगों ने उनकी योग्यता का  आकलन और मूल्यांकन ईमानदारी से नहीं किया ,अन्यथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सम्मान का कद बहुत ऊँचा होता। 
किसी भी व्यक्तित्व का मूल्यांकन उसके कृतित्व और विचारो से ही किया जा सकता है। 
उनका मानना था कि  स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं जब तक कि  देश की राष्ट्रीय पहचान न हो।राष्ट्रीय  पहचान ना होने के कारण  ही भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़  रहा है।स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब वह हमारी संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाये। अनेकता में एकता और विभिन्न रूपों में एकता की की अभिव्यक्ति भारतीय संस्कृति की सोच रही है। विविधता और बहुलता के बावज़ूद हमने हमेशा इसके पीछे की एकता को खोजने का प्रयास किया है।एक बीज ,जड़ों ,तनों  ,पत्तियों ,शाखाओं ,फूल और फलों के रूप में अभिव्यक्त होता है ,इन सभी के अलग -अलग रूप ,रंग ,और गुण  होते है ,फिर भी हम बीज के माध्यम से उनकी एकता के  सम्बन्ध को पहचानते है।  संस्कृति और सभ्यता तभी प्राप्त होती है जब स्वाभाव को धर्म के अनुसार बदल जाये। भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है कि  वो जीवन को एक विशाल रूप में देखती है। नैतिकता का सिद्धान्त ही धर्म है। धर्म के मौलिक सिद्धान्त अनंत  और सार्वभौमिक है ,उनके कार्यान्वन का समय ,और स्थान 
हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है ,माता शब्द हटाते ही यह ज़मीन का एक टुकड़ा रह जायेगा। 
Hindi Hindustani जब कोई राज्य राजनितिक और आर्थिक दोनों शक्तियां अधिग्रहण कर लेता है तो धर्म का पतन होने लगता है। 
तात्कालिक राजनीति पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा था  कि अवसर वाद की राजनीति  ने  लोगों का राजनीति  पर से विश्वास उठा दिया है। दुर्भाग्य से  किसी सिद्धान्त को ना मानने वाले अवसर वादी देश की राजनीती को नियन्त्रित  कर रहे है। नैतिकता के सिद्धान्त बनाये नहीं जाते ,खोजे जाते है। 

उन्होंने मतदाताओं से कभी यह नहीं कहा कि  हमें वोट दो। वे मतदाताओं से कहते थे –
व्यक्ति को वोट दे ,बटुए को नहीं। पार्टी को वोट दे व्यक्ति को नहीं। सिद्धान्त को वोट दे पार्टी को नहीं। 
उनके सामंजस्य की एक बानगी देखिये  –

पश्चिमी विज्ञानं और पश्चिमी जीवन शैली दो अलग -अलग चीजे है। पश्चिमी विज्ञानं सार्वभौमिक है और हमें आगे बढ़ने के लिए इसे अपनाना चाहिए किन्तु पश्चिमी जीवनशैली और मूल्यों के सन्दर्भ में यह सच नहीं है। पिछले १००० वर्षों में जबरदस्ती या स्वेच्छा से जो भी हमने ग्रहण किया ,अब उसे नकारा नहीं जा सकता। हमें मानवीय और राष्ट्रीय दोनों तरह से भारतीय संस्कृति के बारे में सोचना चाहिए। जिस देश का अपना कोई आदर्श और लक्ष्य नहीं ,वह देश नहीं बल्कि ज़मीन का एक टुकड़ा है ,जिस पर कुछ लोग समूह में रहते है। धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष की लालसा मनुष्यों में जन्मजात होती है और समग्र रूप में इनकी संतुष्ठि भारतीय संस्कृति का सार है। हमने अपने समक्ष मानव के समग्र विकास के लिए शरीर ,मन ,बुद्धि ,और आत्मा की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए चार  स्तरीय ज़िम्मेदारियोंका आदर्श रखा है। 

अपने उक्त आदर्शों को क्रियान्वित करने के प्रयास में पंडित दींन  दयाल उपाध्याय ने अपना सर्वस्व जीवन समर्पित कर दिया। उत्तम और श्रेष्ठ विचारों को ध्येय बनाकर परिवर्तित  राष्ट्र और समाज की कल्पना को साकार रूप में  देखने वाले स्वपनदर्शी का  स्वप्न  पूर्ण होने से पूर्व ही टूट गया। 

ऐसे राष्ट्रवादी विचारक और चिंतक को उनकी पुण्य  तिथि पर शत -शत  प्रणाम  ……  






No Comments

    Leave a Reply

    error: Content is protected !!
    error: Alert: Content is protected !!