12th BIHAR 12th MP vyakaran

पल्लवन (भाव विस्तार),bhav vistar

August 26, 2022
Spread the love

पल्लवन (भाव विस्तार)

लोभ समयोन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख
सामान्य के प्रति आकर्षण लोभ होता है, जबकि विशेष के प्रति आकर्षण प्रेम होता है। यदि मन हर किसी के प्रति ललचाता है, लोभ का प्रतिरूप होता है, किन्तु जब मनुष्य कामना से निस्पृह होकर केवल विशेष की ओर पवित्र और निष्काम भाव से आकर्षित होता है, वही यर्थाथ रूप में प्रेम होता है। आकर्षण की ओर उन्मुख होना सामान्यजन की मनोवृत्ति का लक्षण है किन्तु कष्ट, त्याग और पवित्रभाव से उसे प्राप्त करने का भाव प्रेम का लक्षण है। लोभ प्राप्त करने के लिए उत्प्रेरित करता है, किन्तु प्रेम निजी सुखों का परिहार करने के लिए उत्प्रेरित करता है। सामान्यजन लोभ के वशीभूत होकर उसके अधीन हो जाते है। लोभ से उत्पन्न वस्तु को पाकर सामान्य जन सुख अथवा विजय का अनुभव करते है, इसके विपरीत प्रेम त्याग करके भी सुख की अनुभूति करता है।
प्रवाहित होता जीवन नीर, मृत्यु का प्रस्तर सा उर चीर
जिस प्रकार पर्वतीय जल स्रोत पर्वत की चट्टानों को चीर कर भी प्रवाहित होता रहता है, उसी प्रकार जीवन की धारा भी मृत्यु के पाषाण हृदय को भेदकर प्रवाहित होती रहती है। मृत्यु पाषाण के तुल्य कठोर होती है, उसमें भावानात्मक अनुभूति नहीं होती। मृत्यु न तो रूदन से द्रवित होती है और न अनुनय विनय से, किन्तु जीवन मृत्यु की इस निर्मम कठोरता की उपेक्षा करते हुए जल धारा के सदृश अजस्त्र रूप से प्रवाहित होती रहती है। यदि मनुष्य मृत्यु के भवावहता से भयाक्रांत हो जाये तो मनुष्य के विकास के पथ पर प्रशस्त हो ही नहीं सकता। मनुष्य को चाहिये की वह मृत्यु की निर्ममता की उपेक्षा करता हुआ उल्लास, उमंग से परिपूर्ण जीवन के आनन्द का उपभोग कर ले। भ्रमर की भाँति जीवन के मकरन्द का रसास्वादन करें।
मृत्यु, अरी! चिरनिन्द्रे, तेरा अंक हिमानी सा शीतल
मृत्यु की क्रोड़ तुषार के समतुल्य ही शीतल होती है। मृत्यु की शीतल क्रोड में ही प्राणी को महा शांति प्राप्त होती है। मनुष्य, जीवन पर्यन्त संघर्षों में संलग्न रहता है, इस कारण उसे शांति नहीं मिल पाती। मनुष्य जो सतत् आत्म शांति के लिए जूझता रहता है, भटकता रहता है। मनुष्य के समस्त प्रयास चिर शांति के लिये ही होते है, किन्तु वास्तविक शांति उसे मृत्यु की शरण मे जाने के उपरान्त ही मिलती है। मृत्यु के पश्चात मनुष्य का समस्त संघर्ष समाप्त हो जाता है। वह दुःखों और पीड़ाओं से मुक्त हो जाता है। वह शून्य मे खोकर इस सांसारिक बन्धनों से मुक्ति पा लेता है। जब तक मनुष्य जीवित रहता है, विषय वासनाओं की ज्वालाऐं उसे जलाती रहती है। मृत्यु की गोद में सिर रखकर सोने जाने के पश्चात उसे हिम समान शीतलता प्राप्त होती है। वह शीतल चिर निन्द्रा में सोया रहता है।
अमरता है जीवन का हृास, मृत्यु जीवन का परम विकास
जीवन की सार्थकता गतिशीलता एवं क्रियाशील होने में है। जो व्यक्ति अमरत्व को प्राप्त कर लेते है, उनके जीवन का विकास रूक जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति मृत हो जाते है, उनके जीवन को विकास करने का अवसर प्राप्त होने की संभावना होती है। इस देश में पुनर्जन्म को सिद्धान्त रूप में स्वीकार किया गया है, इस कारण मृत्यु के उपरान्त दूसरे जन्म में जीवन के विकास का पुनःअवसर प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। इसी कारण मृत्यु को जीवन का चरम विकास कहा है। अमरता प्राप्त कर लेने से तो जीवन चक्र का क्रम थम जाता है। यदि हमारा पुनर्जन्म हुआ है तो हम इस जन्म को नवीन अनुभव के लिये जिये, समय जो गतिशील है, समय जो परिवर्तनशील है, इस परिवर्तित समय के नव स्वरूप को नवीन, उल्लास, उमंग के साथ जिये।
‘तुलसी सन्त-सुअम्ब-तरू, फूले-फल पर हेत’
महाकवि तुलसी की इस उक्ति का अर्थ है कि सन्त पुरूष और स्वादिष्ट आम्र वृक्ष दूसरों के हित के लिए ही उत्पन्न होते है। भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान रही है। यहाँ के परोपकारी महापुरूषों ने दूसरे जीवों की रक्षा के लिये हँसते-हँसते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। महर्षि दधिचि ने हँसते-हँसते अपनी हड्डियाँ देवताओं को सौंप दी। ऐसे अनेकानेक सन्तों ने भी देश-सेवा के लियेअपना तन-मन धन न्यौछावर कर दिया। अपने तुच्छ स्वार्थों से ऊपर उठकर प्राणिमात्र का हित करना, दुखियों का दुःख दूर करना, पतितों का उद्धार करना, सबके साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना ही परोपकार है। जिस मनुष्य में परोपकार का भाव नहीं, वह मानव नहीं, दानव है। मानव तो प्रकृति का लक्ष्य भी परोपकार ही है। क्या नदी, क्या पर्वत, क्या वृक्ष सभी परोपकार का संदेश देते है।
कर्म प्रधान विश्वरचि राखा
महाकवि तुलसी ने कहा कि विश्व में कर्म की ही प्रधानता है। कर्म ही जीवन है और अकर्मण्यता मृत्यु। कर्म ही जीवित रहने का एक मात्र साधन है। कर्म बिना न मनुष्य जीवित रह सकता है, न पशु। इसीलिए नीतिकारों ने कहा है – न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशक्ति मुखे मृगा।
कर्मशील व्यक्ति का ही जीवन सुखी होता है। मान-सम्मान धन ऐश्वर्य सभी कर्मठ को ही मिलते है। कर्म ही मानव जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कर्म का ही संदेश दिया है। भाग्य की बैसाखी का सहारा भाग्यवादी ही लेते है। कर्म में लीन रहकर धीमी गति से चलने वाला दौड़ जीत लेता है और प्रसाद और आलस्य के कारण तेज गति से दौड़ने वाला खरगोश हार जाता है। कर्म से ही मानव आग के आविष्कार से लेकर नक्षत्रों तक पहुँच सका है। कर्मयोगी के लिये कर्म ही पूजा है। अतः मनुष्य का कर्म गहरा और उत्कृष्ट होना चाहिये।
प्रेम मे घनत्व अधिक है, तो श्रद्धा मे विस्तार
प्रेम और श्रद्धा दोनों ही मनुष्य हृदय मंे उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक भाव है किन्तु सतही तौर पर साम्य प्रतीत होने वाले इन दोनों में सूक्ष्म भेद भी है। प्रेम में किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्ति विशेष के प्रति आसक्ति का भाव रहता है। उसी के प्रति पूर्ण समर्पण रखता है। उसके लिए वह अपना सर्वस्व न्यौछावर कर सकता है। जिसके प्रति मनुष्य रागात्मक सम्बन्ध रखता है, उस पर वह अपना और सिर्फ अपना अधिकार समझाता है। उसे अपने प्रेम पर किसी अन्य का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, किन्तु श्रद्धा प्रेम के विपरीत व्यापक होता है। जिसके प्रति हमारी श्रद्धा होती है, उसके प्रति हम चाहेंगे कि उस पर अधिकधिक लोगों की श्रद्धा हो, सभी हमारे श्रद्धेय के अनुयायी हो, उनके बताये मार्ग का अनुगमन करें। अपने श्र(ेय पर वह सबका समान अधिकार समझता है। श्रद्धेय के प्रतिश्रद्धा रखने वालों के प्रति उसके मन में कोई ईर्ष्या अथवा द्वेष नहीं होता। प्रेम का स्वरूप संकुचित होता है किन्तु श्रद्धा का स्वरूप व्यापक होता है। प्रेम में भाव होता है कि ‘ना मैं देखू औरन कूँ, न तुझ देखन देहू, जब कि श्रद्धा में भाव होता है। जो मेरा है, वह तेरा है, सबका है।’
वासना की अमूर्त पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है।
इन्द्रियों द्वारा इच्छित कामनाओं का नाम ही वासना है। कामना की पूर्ति का मूर्त रूप भौतिक अनुभूति बन जाती है, लेकिन जब मनुष्य इसकी अमूर्त पूर्ति करता है, तब सौन्दर्य का सर्जन होता है। जब मनुष्य अपनी वासना को भौतिक रूप से न भोगकर उसे काव्य, चित्र अथवा गीत के माध्यम से प्रकट करता है, तब वासना का यह अमूर्त रूप कला का स्वरूप धारण कर लेती है। इस सृष्टि में जितने भी प्रकार की कला है, वह सब मनुष्य की वासना का ही प्रतिरूप है, किन्तु यह अमूर्त रूप में होती है। वासना को मूर्त अथवा अमूर्त रूप में उपभोग करने का सामर्थ्य मनुष्य में ही है। वासना की पूर्ति का उपभोग तो पशु प्रवृति है। यह मनुष्य ही है जिसने अपनी वासना के रूप को सभी के उपभोग के लिए बनाया है। काव्य, चित्रकला, संगीत आदि वासना का अमूर्त रूप है। इन सभी में सौन्दर्यानुभूति समाहित है। अतः यह कथ्य उपयुक्त ही है कि वासना का अमूर्त रूप ही सौन्दर्य है।
आंख मे हो स्वर्ग लेकिन पांव धरती पर टिके हो।
उदाहरण: जीवन में सफलता के लिए मनुष्य का महत्त्वाकांक्षी होना आवश्यक कारक माना जाना भले ही उचित हो किन्तु वह इतना महत्त्वाकांक्षी भी न हो जाए कि यथार्थ को ही उपेक्षित कर दे अर्थात व्यक्ति की कल्पना या स्वप्न ऐसे होने चाहिए जो कार्य रूप में परिवर्तित कर सके। महत्त्वाकांक्षा का तात्पर्य यह नही कि मनुष्य ऐसे कार्य को अपना घ्येय बना ले जो संभव ही न हो। अति आशावादी स्वप्नजीवी अथवा कल्पनाजीवी को जब असफलता हाथ लगती है, तो वे निराशा के इतने गहरे गर्त में गिरते है कि फिर कभी ऊबर नहीं सकते। अतएवं मनुष्य को चाहिए कि वह यह मानकर चले कि अपने प्रारम्भिक प्रयासों में असफलता भी मिल सकती है और उसे फिर से प्रयास करने पड़ सकते है।
एक साधे सब सधै, सब साधे सब जाय
उदाहरण: व्यक्ति को अपने जीवन में नाना प्रकार के लक्ष्य निर्धारित करने की अपेक्षा किसी एक उत्तम लक्ष्य को ही निश्चित करना चाहिए। जो व्यक्ति लक्ष्य वेध की पूर्ति के लिए अर्जुन की तरह एक लक्ष्य को चिडिया की आँख मानकर उस पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करता है, निश्चित ही सफल होता है। एक साथ दो घोड़ों अथवा दो नावों पर सवार होने वाले गन्तव्य पर पहुँचने से पूर्व गिर जाते है अथवा डूब जाते है। किसी वृक्ष के तने, डालियों, पत्तों व फूलों की अलग-अलग सेवा करने वाले को फलों से वंचित रहना पड़ता है, जबकि मूल अर्थात जड़ को ही सींये तो उसे फल की प्राप्ति होती है। महान लेखक एस.डी. कालरिज, जिसने चालीस हजार निबन्ध लेख लिखे, किन्तु सभी अपूर्ण, इसलिए उसकी योग्यता का लभा न उसे मिला, न देश व समाज को। अतः व्यक्ति को एक ही लक्ष्य अपना उद्देश्य पूर्ति में अपनी समस्त क्षमताएँ लगा देनी चाहिए।
अभ्यास हेतु महत्त्वपूर्ण सूक्तियाँ एवं उनके सांकेतिक अर्थ:

  1. जिन खोजा तिन पाइया गहरे पानी पैठ।
    संकेत- जो जितना अधिक परिश्रम/संघर्ष करेगा, उसे ही सफलता प्राप्त हेाती है।
  2. महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में पलता है।
    संकेत- कभी-कभी मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा उसे क्रूर बना देती है।
  3. तेते पाँव पसारिये, जेती लाम्बी सौर
    संकेत- आय से अधिक खर्च नहीं करना चाहिए।
  4. अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन ते होई।
    संकेत- अत्यधिक घर्षण से चंदन से भी आग प्रकट हो जाती है इसी प्रकार कष्टों के बीच से भी सुख प्राप्त किया जा सकता है।
  5. गौरव गन्ध उन्हें उतना ही, यत्र तत्र-सर्वत्र मिला,
    जितने कष्ट कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला।
    संकेत- गुलाब कांटों के बीच में खिलता है किन्तु संुगधित होता है, इसी तरह जिसके जीवन में कष्ट अथवा संधर्ष होता है, उसका जीवन सुखमय होता है।
  6. जाकी रही भावना जैसी, प्रभुमूरत देखी तिन वैसी।
    संकेत- जो जैसी भावना रखता है, प्रभु उसे उसी रूप में दिखाई देता है।
  7. कायर भाग्य की और वीर पुरूषार्थ की बात करते है।
    संकेत- कायर ही भाग्य की बातें करते है जबकि वीर पुरषार्थ पर विश्वास करता है।
  8. मनः प्रसाद चाहिये केवल, क्या कुटीर फिर क्या प्रासाद।
    संकेत- मन की प्रसन्नता ही सबसे बड़ी आत्मिक प्रसन्नता है।
  9. मलयगिरि की भीलनी, चन्दन देय जलाये,
    संकेत- अयोग्य व्यक्ति लिए उपयोगी वस्तु का कोई महत्त्व नहीं।
  10. प्रलय पयोधर बरस रहे है रक्त अश्रु की धार
    मानवता में राक्षसत्व का है आज पूर्ण प्रचार।
    संकेत- वर्तमान में जुल्म, शोषण, अत्याचार एवं भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। दुराचारियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, असहाय एवं कमजोर शोषित हो रहे है।
  11. स्वतन्त्रता का कमल रक्त सरोवर में ही खिलता है।
    संकेत- बलिदान से स्वतन्त्रता प्राप्त होती है।
  12. हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
    संकेत- जिसके हृदय में राष्ट्रप्रेम का भाव नहीं, वह मनुष्य, मनुष्य नहीं है।
  13. प्रतिभा श्रम और अभ्यास के तटों में बंध कर बहती है।
    संकेत- सतत् परिश्रम और अभ्यास से ही प्रतिभा को निखारा जा सकता है।
  14. दुःख की पिछली रजनी बीच, विसकता सुख का नवल प्रभात।
    संकेत- कष्ट व संघर्ष से ही सुख प्राप्त किया जा सकता है।
  15. स्वावलंबन की एक झलक पर न्यौछावर कुबेर का कोष।
    संकेत- आत्म निर्भर बनकर ही आर्थिक रूप से सम्पन्न हुआ जा सकता है।
  16. करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
    संकेत- निरन्तर अभ्यास से ही कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
  17. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
    संकेत- संसार में झूठ ही सबसे बड़ा पाप है और सत्य ही सबसे बड़ी तपस्या है।
  18. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
    संकेत- कमजोर इच्छाशक्ति वाले कभी सफल नहीं होते, दृढ इच्छाशक्ति वाले बड़ी-बड़ी बाधाओं पर विजय पा लेते है।
  19. क्षमा सोहती उस भुजंग को जिसके पास गरल है।
    संकेत- समर्थ होकर क्षमा करना गुण है किन्तु कमजोर होकर क्षमा करना कायरता है बुुरे स्वभाव के व्यक्ति अपनी प्रवृति का त्याग नहीं करते।
  20. कागा कहा कपूर चुगाये, स्वान नहलाये गंग।
    संकेत- बुरे स्वभाव के व्यक्ति अपनी अपनी प्रवृति का त्याग नहीं करते है।
  21. प्रभुता पाहि काहि मद नाहि।
    संकेत- शक्ति प्राप्त व्यक्ति अहंकारी हो जाता है।
  22. चन्दन विष व्यापै नहीं, लिपटे रहत भुजंग।
    संकेत- अच्छे स्वभाव के व्यक्तियों पर बुरे लोगों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  23. शठ सुधरहि सत्संगति पाई, पारस कुधातु सुहाई।
    संकेत- अच्छी संगति पाकर बुरे लोग भी अच्छे हो जाते है।
  24. विष भरा कनक घटे जैसे।
    संकेत- दुर्गुणों का प्रभाव न पड़ने देना।
  25. कै हंसा मोती चुगै, के लंघन मरि जाये।
    संकेत- स्वाभिमानी लोग प्राण त्याग सकते है किन्तु परिस्थितियों के साथ समझौता नहीं करते।
  26. जहाँ सुमति तहँ सम्पत्ति नाना, जहाँ कुमति विपत्ति निदाना।
    संकेत- अच्छी बुद्धि सभी सुखों का कारण हो सकती, वही कुबुद्धि सभी कष्टों का कारण बन सकती है।
  27. पराधीन सपनेहूँ सुख नाहि।
    संकेत- गुलाम व्यक्ति कभी जीवन में सुख प्राप्त नहीं कर सकता है।
  28. दैव-दैव आलसी पुकारा।
    संकेत- अकर्मण्य एवं आलसी व्यक्ति कभी जीवन में सुुख प्राप्त नहीं कर सकता।
  29. क्षमा वीरस्य भूषणम।
    संकेत- क्षमा ही वीरों का आभूषण है।
  30. सबै दिन जात न एक समान।
    संकेत- मनुष्य के जीवन में सदैव दुःख नही रहता और न सदैव सुख ही रहता है। सुख-दुख दिन-रात की तरह आते है।

No Comments

    Leave a Reply

    error: Content is protected !!
    error: Alert: Content is protected !!