World no tabacco day

मेरा दुश्मन –मै
अधिकांश कहानियों में एक खल पात्र होता है ,जो नायक या उसके परिवार का दुश्मन होता है और वह नायक और उसके परिवार को मार देना चाहता है .जिसे सिनेमा की भाषा में विलेन या खलनायक कहा जाता है , लेकिन आज हम बात करेंगे ऐसे लोगों की ज़िन्दगी की कहानी के बारे में ,जिनकी ज़िन्दगी का विलेन या खलनायक कोई और नहीं बल्कि वह खुद होता है ..और गा-गाकर कहता है –
नायक नहीं …खलनायक हूँ मै
ध्रूम-पान और तम्बाकू उद्पादों का सेवन करने वालो का दुश्मन और कोई नहीं स्वयं वही होता है .
जलती हुई सिगरेट खुद चीख-चीखकर कहती है ,आज तू मुझे जला रहा है ,कल तेरी ज़िन्दगी भी इसी तरह सुलग रही होंगी .
आज मेरी ज़िन्दगी धुँवा-धुँवा हो रही है ,कल तेरी ज़िन्दगी धुँवा-धुँवा हो रही होंगी .
तम्बाकू सेवन की एक छोटी सी बुरी आदत आगे आनेवाले समय में विकराल मौत की शक्ल अख्तियार कर लेती है .कुछ सालों तक तो यही पता नहीं चलता कि .मौत उसके भीतर छिपकर बैठ गई.

तंबाकू मारता है, धोखा मत खाओ ,पैसा खर्च करके अपनी मौत न खरीदो.
ध्रूम-पान छोड़े ,अपने लिए न सही अपनों के लिए छोड़े .एक अकेली मौत न मालूम कितनी आँखों में कभी न सूखनेवाले आंसू दे जाती है .
सरकार और तम्बाकू उत्पादकों के अपने –अपने निजी हित है .
वें पैसे लेकर मौत का सामन बेच रहे है .और हम पैसे देकर मौत का सामन खरीद रहे है .
क्यों ज़िन्दगी से इतनी नफ़रत और मौत से इतना प्यार है.
ध्रूम-पान छोड़ जिओ…..अपने लिए और अपनों के लिए .
सिगरेट के हर कश के सिगरेट की लम्बाई कम होती जाती है ,उसी के साथ –साथ ज़िन्दगी की लकीर भी छोटी होती जाती है .
WHO कहता है –
तम्बाकू दिल तोड़ता है
लेकिन हमारे फ़िल्मी नायक –अजय …शाहरूख और अक्षय कहते है कि जुबां एक है तो दिल भी एक होने चाहिए .
पैसों के लिए रील लाइफ के नायक रियल लाइफ के खलनायक बन जाते है .
नायक समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करता है – लेकिन करोड़ों रूपया कमाकर भी समाज को मौत के मुँह में ले जानेवाले उत्पाद का सेवन करने का विज्ञापन कर कैसा आदर्श प्रस्तुत कर रहे है –
सब जानते है -तंबाकू सेवन से कई गंभीर और जानलेवा बीमारियों के होने का खतरा रहता है. यह भी जानते है कि इससे इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, फेफड़े और लिवर और , मुंह का कैंसर हो सकता है , इरेक्टाइल डिस्फंक्शन और हृदय रोग जैसी बीमारियां इसमे शामिल हैं,.
भारत में प्रतिदिन होने वाली मौतों में 3500 मौत का कारण ध्रूम-पान और तंबाकू उत्पाद से होती है .
जगाया उसे जा सकता है जो वास्तव में सोया हुआ है ,किन्तु जो जाग्रत अवस्था में भी सोने का बहाना कर रहा है ,उसे उठाया नहीं जा सकता .वैसे ही समझाया उसे जा सकता है जो समझने के लिए तैयार हो .
अज्ञानतावश गलती हो जाये ,उसकी गलती क्षम्य है ,वह दूसरों की सहानुभूति का पात्र भी हो सकता है किन्तु जो परिणाम को जानते हुए भी गलती करता है .वह न तो सहानुभूति का पात्र होता है और न क्षमा का .इनकी गलती कानूनी अपराध की श्रेणी में न सही किन्तु मानवीय अपराध ज़रूर कहा जायेंगा .
चिकित्सा विज्ञानं सावधान भी करता है और चेतावनी भी देता है कि ध्रूम पान और तम्बाकू उत्पाद का सेवन मृत्यु का कारण भी बन सकता है .किन्तु ध्रूमपान करनेवाले दुस्साहसी बावजूद इसके ध्रूम पान और तम्बाकू उत्पाद का सेवन करने से परहेज नहीं करते .ऐसे लोग अपना जीवन तो बरबाद करते ही है साथ ही अपने पूरे परिवार को भी मानसिक और आर्थिक परेशानी में डाल देते है .
ध्रूम पान और तम्बाकू उत्पाद का सेवन करनेवाला गंभीर रूप से बीमारी से घिर जाने पर स्वयं भी मौत से डरने लगता है .
वह मरना नहीं चाहता और परिवार वाले भी उसे मरने नहीं देना चाहते .गंभीर बीमारी का इलाज़ करने पर लाखों रूपया खर्च होता है .ऐसे लोग पहले तो अपनी ज़मा पूँजी खर्च करते है ,और अधिक की आवश्यकता होने पर पत्नी के गहने-जेवर बिकने की नौबत आ जाती है कभी –कभी तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि सालों की मेहनत की कमाई से बनाया हुआ घर भी गिरवीं चला जाता है या फिर बेचना ही एक मात्र विकल्प बन जाता है .
ध्रूम पान और तम्बाकू उत्पाद के सेवन से गंभीर रूप से बीमार तो अस्पताल के आई .सी. यू,में अवचेतन अवस्था में पड़ा होता है .परेशान होते है पत्नी ,बच्चें और निकट के परिजन . आई .सी. यू. के भीतर मरीज शारीरिक पीड़ा सह रहा होता है और बाहर पत्नी बच्चें मानसिक और आर्थिक पीड़ा झेल रहे होते है .
डाक्टर परिजनों को आश्वासन देते है –हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे है .कुछ मामलों में डाक्टर अपनी कोशिश में कामयाब हो भी जाते है .चिकित्सा विज्ञानं की भाषा में वह मरीज़ जीवित तो होता है किन्तु कल तक अपने पैरों से भगाने-दौड़नेवाला दूसरे के सहारे चलने पर मज़बूर हो जाता है .उसके हाथों में इतनी शक्ति नहीं रह जाती कि अपने हाथों से खाना खा सके .
जो इस स्थिति से बच जाते है ,उनकी शेष ज़िन्दगी उधार का रूपया चुकाने में बीत जाती है .ज़िन्दगी पीड़ादायक बन जाती है ,मरीज जिंदा है लेकिन वह हर घडी –हर पल भीतर ही भीतर ईश्वर से प्रार्थना करता है कि ऐसी ज़िल्लत भरी ज़िन्दगी जीने से अच्छा है ,मुझे मौत दे दे ,उधर परिजनों को यह संतोष रहता है कि पैसा गया कोई बात नहीं ,हमारे अपने की जान तो बच गई. .
लेकिन उस दर्द को शब्द में कैसे बयाँ करें जिसने अपने को भी खोया और धन दौलत भी .
काश ,ध्रूम-पान करने और तम्बाकू उत्पाद का सेवन करनेवाले इस दर्द को आज ही महसूस कर ले.
अभी भी ,खोने को कुछ नहीं लेकिन पाने के लिए अभी भी बहुत कुछ है .

बस ज़रुरत एक संकल्प की ….दृढ इच्छा शक्ति के साथ निभाने की …..







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