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Vidyapati ke pad  Kavita Class 12 Question Answer | vidyapati | CBSE Hindi Antra Chapter 8

February 11, 2026
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Vidyapati ke pad Kavita Class 12 Question Answer | vidyapati | CBSE Hindi Antra Chapter 8

परिचय

 

कक्षा 12 CBSE hindi/Antra पाठ्यक्रम के Chapter 9 ‘Vidyapati ke pad में Vidyapatद्वारा रचित प्रेम, विरह और अनुराग से भरे पदों का भावपूर्ण अध्ययन किया गया है। यह अध्याय विद्यार्थियों को न केवल साहित्यिक सौंदर्य से परिचित कराता है, बल्कि मानवीय भावनाओं की गहराई को भी समझने में सहायक होता है।

 

परीक्षा की दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे लघु एवं दीर्घ उत्तर, भावार्थ, व्याख्या तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। इसलिए विद्यार्थियों के लिए इसका सही और सरल रूप में अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।

 

इस ब्लॉग पोस्ट में हम आपको CBSE Class 12 Hindi Antra Chapter 9 – Vidyapati Ke Pad के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, भावार्थ, व्याख्या और परीक्षा-उपयोगी नोट्स सरल भाषा में उपलब्ध करा रहे हैं, ताकि आप कम समय में बेहतर तैयारी कर सकें और अच्छे अंक प्राप्त कर सकें।

 

यदि आप कक्षा 12 हिंदी बोर्ड परीक्षा की प्रभावी तैयारी करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

 

Vidyapati Ke Pad Class 12 Hindi Summary

12 cbse /hindi/Antra /Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati/  में संकलित विद्यापति के तीनों पद प्रेम, विरह और अनुराग की भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। इन पदों में कवि ने मानवीय संवेदनाओं को इतनी कोमलता और गहराई से प्रस्तुत किया है कि पाठक सहज ही नायिका के मनोभावों से जुड़ जाता है। इन रचनाओं के माध्यम से प्रेम की मधुरता, विरह की पीड़ा और अनुराग की अनंतता का अत्यंत प्रभावशाली चित्र उभरकर सामने आता है।

 

12 cbse /hindi/Antra /Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati के   प्रथम पद में कवि ने विरहिणी नायिका के अंतर्मन में उठ रही पीड़ा को बड़े ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। प्रिय से बिछुड़ने के बाद उसका जीवन जैसे सूना और नीरस हो गया है। उसका मन, उसका हृदय और उसकी चेतना—सब कुछ प्रियतम के साथ ही चला गया है, जो गोकुल छोड़कर मधुपुर में निवास करने लगे हैं। इस वियोग ने उसे भीतर से तोड़ दिया है। फिर भी उसके मन में एक क्षीण-सी आशा बनी हुई है कि शायद कार्तिक मास में उसका प्रिय लौट आए। यही आशा उसे जीवित रखे हुए है। किंतु विरह की आग इतनी प्रज्वलित है कि वह अपनी पीड़ा किसी से कह भी नहीं पाती। उसे भय है कि लोग उसकी वेदना को समझ नहीं पाएँगे और उसे केवल कल्पना या अतिशयोक्ति मान लेंगे। इस प्रकार उसका दुःख भीतर ही भीतर घुटता रहता है।

 

12 cbse /hindi/Antra /Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati के   द्वितीय पद में नायिका अपनी सखी के समक्ष अपने प्रेम की गहन अनुभूति को व्यक्त करती है। वह कहती है कि उसने जन्म-जन्मांतर से केवल अपने प्रिय के रूप का ही दर्शन किया है, फिर भी उसकी आँखों की प्यास कभी नहीं बुझी। प्रिय के मधुर शब्द उसके हृदय में सदा गूँजते रहते हैं और उसके मन को मधुरता से भर देते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि प्रिय के समीप रहकर भी उसका प्रेम संतुष्ट नहीं होता, क्योंकि सच्चा प्रेम कभी स्थिर नहीं होता। उसमें निरंतर नवीनता, ताजगी और उल्लास बना रहता है। प्रत्येक क्षण प्रेम का नया रूप सामने आता है, जिससे अनुराग और अधिक गहरा होता जाता है। इस असीम प्रेमानुभूति को शब्दों में बाँध पाना सहज नहीं, फिर भी नायिका अपने भावों को सखी के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास करती है।

 

12 cbse /hindi/Antra /Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati/  के तृतीय पद में कवि ने विरहिणी नायिका की अत्यंत करुण और दयनीय स्थिति का सजीव चित्रण किया है। वियोग की पीड़ा अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी है। उसकी आँखों से निरंतर आँसू बहते रहते हैं, जिससे उसकी पलकों का खुलना तक कठिन हो गया है। उसका शरीर दिन-प्रतिदिन दुर्बल और क्षीण होता जा रहा है। उसमें न उठने की शक्ति बची है, न बोलने का सामर्थ्य। वह जीवन और मृत्यु के बीच झूलती हुई-सी प्रतीत होती है। उसकी समस्त चेतना अब केवल अपने खोए हुए प्रिय की स्मृतियों के सहारे टिकी हुई है। विरह ने उसके अस्तित्व को ही जैसे जकड़ लिया है।

 

इन तीनों पदों के माध्यम से विद्यापति ने प्रेम के विविध रूपों—आशा, तृष्णा, पीड़ा और समर्पण—का अत्यंत संवेदनशील चित्र प्रस्तुत किया है। उन्होंने न केवल नायिका के बाह्य दुःख को उकेरा है, बल्कि उसके अंतर्मन की सूक्ष्म भावनाओं को भी जीवंत बना दिया है। यही कारण है कि ये पद आज भी पाठकों के हृदय को स्पर्श करते हैं और प्रेम तथा विरह की अनुभूति को गहराई से अनुभव कराने में पूर्णतः सफल सिद्ध होते हैं।

 

 

 

Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati/ Question Answer / विद्यापति के पद/प्रश्न-उत्तर

प्रश्न 1.

प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?

उत्तर :

नायक अपनी प्रियतमा को छोड़कर परदेश चला जाता है और पीछे रह जाती है विरह से संतप्त नायिका। प्रियतम के वियोग में उसका मन निरंतर व्यथित रहता है। जब वर्षा ऋतु का श्रावण मास आता है, तो उसके भीतर की कामनाएँ और अधिक प्रबल हो उठती हैं। यह ऋतु जहाँ सामान्यतः मिलन और उल्लास की प्रतीक मानी जाती है, वहीं प्रियतम के अभाव में नायिका के लिए असह्य पीड़ा का कारण बन जाती है। वह विरह की अग्नि में और अधिक जलने लगती है। अपने इस दुख से प्रियतम को अवगत कराने के लिए वह पत्र द्वारा संदेश भेजना चाहती है, किंतु उसे कोई ऐसा विश्वसनीय व्यक्ति नहीं मिलता जो उसका पत्र प्रियतम तक पहुँचा सके। इस विवशता के कारण उसका दुःख और भी बढ़ जाता है। 

प्रश्न 2.

कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है ?

उत्तर :

इस कथन के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करता है कि नायिका का प्रेम अत्यंत गहन और अनन्य है। वह प्रियतम को निरंतर अपने समीप अनुभव करती है, फिर भी उसका मन तृप्त नहीं होता। वह चाहती है कि बार-बार, बल्कि जन्म-जन्मांतर तक अपने नेत्रों से प्रियतम के रूप का दर्शन करती रहे। जब भी वह उसे देखती है, प्रियतम उसे नित्य नवीन प्रतीत होता है। उसकी शोभा में कोई भी नीरसता नहीं आती, इसलिए नायिका उस सौंदर्य को निरंतर निहारते रहना चाहती है। 

 

 

प्रश्न 3.नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।

नायिका का कथन है कि प्रेम की अनुभूति शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। उसने जीवन भर प्रियतम को देखा है, फिर भी उसके नेत्र आज तक तृप्त नहीं हुए। उसने प्रियतम के मधुर स्वरों को सुना है, किंतु सुनकर भी संतोष नहीं मिला। अनेक मिलन-रात्रियाँ साथ बिताने के बाद भी वह प्रेम-क्रीड़ा के रहस्य को पूरी तरह समझ नहीं पाई। प्रियतम उसके हृदय में सदा विद्यमान है, फिर भी अतृप्ति बढ़ती ही जाती है। प्रेम-रस का पान करके वह विदग्ध तो हो गई है, किंतु पूर्ण तृप्ति अब भी दूर है। प्रेमानुभूति प्रतिक्षण रूप बदलती रहती है, इसलिए भरपूर प्रेम-सुख के बाद भी उसके प्राण अतृप्त बने रहते हैं। 

प्रश्न 4.

‘सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से कवि का क्या आशय है ?

उत्तर :

इस कथन के माध्यम से कवि यह प्रतिपादित करता है कि प्रेमानुभूति का वर्णन करना अत्यंत कठिन है, क्योंकि प्रेम हर क्षण अपना स्वरूप बदलता रहता है। प्रेम का प्रत्येक पल एक नया अनुभव प्रदान करता है, जो पहले प्राप्त अनुभूति से सर्वथा भिन्न होता है। यही कारण है कि जब प्रेम के अनुभव को शब्दों में बाँधने का प्रयास किया जाता है, तो यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि क्या कहा जाए। वर्तमान प्रेमानुभूति पूर्व अनुभव से अलग होती है और भविष्य की अनुभूति उससे भी भिन्न होगी। इस निरंतर परिवर्तनशीलता के कारण प्रेम का पूर्ण वर्णन संभव नहीं हो पाता।    

 

 

प्रश्न 5.

कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर :

प्रियतम के वियोग में नायिका अत्यंत दुःखी है और उसका शरीर दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा है। विरहावस्था में उसे संसार की कोई भी वस्तु सुखद नहीं लगती। यहाँ तक कि प्रकृति के वे साधन, जो सामान्यतः मादक और आनंददायक माने जाते हैं, उसे कष्टप्रद प्रतीत होते हैं। कोयल की कूक और भँवरों की गुंजार उसके हृदय में पीड़ा को और तीव्र कर देती है। इसलिए जब वे स्वर गूँजते हैं, तो वह अपने कान बंद कर लेती है, ताकि वह मधुर ध्वनियाँ उसे सुनाई न दें। उनका कलरव उसके विरह को और अधिक उग्र बना देता है। 

प्रश्न 6.

कातर दुष्टि से चारों तरफ़ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?

उत्तर :

नायिका की कातर मनोदशा और प्रियतम की खोज का मार्मिक चित्रण कवि ने इन शब्दों में किया है—

‘कातर दिठि करि चौदसि हेरि-हेरि, नयन गरए जलधारा।’

इन पंक्तियों में नायिका की व्याकुल दृष्टि, चारों ओर प्रियतम को ढूँढ़ने की बेचैनी और आँसुओं की अविरल धारा के माध्यम से उसकी गहन विरह-व्यथा सजीव रूप में उभर आती है। 

 

प्रश्न 7.

निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए –

तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिक।

उत्तर :

तृप्त, क्षण, विदग्ध, निहार, प्रीति, श्रावण, अपयश, क्षीण, त्वम्, कार्तिक।

 

प्रश्न 8.

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –

(क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।

सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।

(ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल॥

सेहो मधुर बोल स्त्रवनहि सूनल स्तुति पथ परस न गेल॥

(ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मूदि रहए दु नयान।

कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान॥

उत्तर :

उत्तर के लिए इस पाठ के सप्रसंग व्याख्या भाग को देखिए।

 

भाग – “स”

Chapter 9 /Vidyapati ke pad/Vidyapati/ important Question Answer / विद्यापति के पद/प्रश्न-उत्तर

परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न  –‘बारहमासा’

 

 

प्रश्न 1.

 

‘बारहमासा’ का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।

 

उत्तर :

‘बारहमासा’ में विद्यापति ने नायक के वियोग में संतप्त नायिका की विरह-व्यथा का सजीव और मार्मिक चित्रण किया है। प्रथम पद में नायिका अपने प्रियतम के गोकुल छोड़कर मथुरा चले जाने से अत्यंत व्याकुल है। श्रावण मास का आगमन उसकी विरह-वेदना को और तीव्र कर देता है। वह अपने प्रिय को संदेश भेजना चाहती है, किंतु कोई संदेशवाहक न मिलने के कारण असहाय अनुभव करती है।

 

द्वितीय पद में कवि ने नायिका की प्रेम-अतृप्ति और तीव्र कामना का चित्रण किया है। सावन ऋतु उसकी विरह-तृष्णा को और भड़का देती है। तृतीय पद में नायिका की ऐसी दशा दिखाई गई है कि प्रियतम के अभाव में प्रकृति के आनंददायक दृश्य भी उसे पीड़ादायक लगने लगते हैं। इस प्रकार ‘बारहमासा’ का प्रतिपाद्य प्रेम-वियोग, नारी-हृदय की संवेदनशीलता और ऋतु-परिवर्तन के साथ बढ़ती विरह-व्यथा का चित्रण है।

 

 

प्रश्न 2.

 

प्रथम पद में कवि ने नायिका की कौन-सी विवशता का चित्रण किया है?

 

उत्तर :

प्रथम पद में कवि ने नायिका की उस विवशता का चित्रण किया है, जो प्रियतम के वियोग से उत्पन्न होती है। उसका नायक गोकुल छोड़कर मथुरा चला गया है और वहाँ से कोई समाचार नहीं भेजता। इस अनिश्चितता के कारण नायिका का दुःख और बढ़ जाता है।

 

वह अपने प्रियतम तक प्रेम-संदेश पहुँचाना चाहती है, किंतु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता जो उसका संदेश पहुँचा सके। इसी असमर्थता और विवशता को कवि ने अत्यंत करुण रूप में प्रस्तुत किया है।

 

 

प्रश्न 3.

 

प्रियतम के वियोग में राधा प्राकृतिक उपादानों की उपेक्षा किस प्रकार करती है?

 

उत्तर :

प्रियतम के वियोग में राधा को प्रकृति का सौंदर्य भी कष्टप्रद प्रतीत होता है। जो दृश्य सामान्यतः आनंद प्रदान करते हैं, वही उसके लिए पीड़ा का कारण बन जाते हैं। पुष्पों से भरे वन को देखकर वह अपनी आँखें मूँद लेती है, क्योंकि ये दृश्य उसे प्रियतम की स्मृति दिलाते हैं।

 

उसी प्रकार न तो उसे कोयल की मधुर कूक अच्छी लगती है और न ही भँवरों का गुंजन। वह इन स्वरों से बचने के लिए अपने कान बंद कर लेती है। इस प्रकार राधा प्रकृति के समस्त उपादानों की उपेक्षा करती है।

 

 

प्रश्न 4.

 

श्रीकृष्ण मथुरा जाते समय गोकुल से क्या हरण करके ले गए और क्यों?

 

उत्तर :

श्रीकृष्ण मथुरा जाते समय गोकुल से गोप-ग्वालों और गोपियों का मन अपने साथ हरण करके ले गए। इसका कारण यह था कि गोकुल के निवासी श्रीकृष्ण से आत्मिक और निष्कपट प्रेम करते थे।

 

उनका प्रेम केवल भौतिक नहीं, बल्कि पूर्णतः भावनात्मक और आध्यात्मिक था। इसलिए श्रीकृष्ण के चले जाने के बाद भी उनका मन गोकुल में न रहकर श्रीकृष्ण के साथ ही चला गया।

 

 

प्रश्न 5.

 

श्रीकृष्ण के विरह में संतप्त गोपियों की क्या दशा हो गई है?

 

उत्तर :

श्रीकृष्ण के विरह में गोपियों की दशा अत्यंत दयनीय हो गई है। उनका शरीर अत्यधिक दुर्बल हो चुका है और वे प्रतिक्षण श्रीकृष्ण की स्मृतियों में डूबी रहती हैं। उनके नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा प्रवाहित होती रहती है।

 

कवि ने उनकी तुलना चतुर्दशी के क्षीण चंद्रमा से की है, जो प्रतिदिन और अधिक दुर्बल होता जाता है। उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि वे बिना सहारे के पृथ्वी पर बैठने में भी असमर्थ हो गई हैं।

 

 

प्रश्न 6.

 

विद्यापति के प्रकृति-चित्रण पर टिप्पणी लिखिए।

 

उत्तर :

विद्यापति ने अपनी रचनाओं में प्रकृति का अत्यंत सजीव, कोमल और भावप्रधान चित्रण किया है। उन्होंने वसंत और शरद ऋतुओं का विशेष रूप से सुंदर वर्णन किया है। उनके काव्य में प्रकृति का आलंबन और उद्दीपन—दोनों रूपों में चित्रण मिलता है, किंतु उद्दीपन रूप अधिक प्रभावशाली है।

 

वसंत को उन्होंने ऐसे चित्रित किया है मानो बालक के जन्म पर उत्सव मनाया जा रहा हो। ऋतु-परिवर्तन के साथ वसंत का क्रमिक विकास दर्शाया गया है। पशु-पक्षी, वन-उपवन, नगर-ग्राम, सर-सरिता आदि के चित्र अत्यंत आकर्षक हैं। साथ ही मानवीकरण और आलंकारिक शैली के माध्यम से प्रकृति को सजीव और भावपूर्ण बना दिया गया है।

 

 

प्रश्न 7.

 

कवि विद्यापति ने नायिका को किस रूप में प्रस्तुत किया है?

 

उत्तर :

कवि विद्यापति ने नायिका को प्रियतम के वियोग में संतप्त, संवेदनशील और भावुक नारी के रूप में प्रस्तुत किया है। वियोगावस्था में उसे प्रकृति का सौंदर्य भी कष्टदायक प्रतीत होता है।

 

पुष्पों से भरे वन, कोयलों का कलरव और भँवरों का गुंजन—जो सामान्यतः आनंद प्रदान करते हैं—नायिका के लिए पीड़ा का कारण बन जाते हैं। इस प्रकार कवि ने नायिका को एक ऐसी विरहिणी के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका संपूर्ण अस्तित्व प्रेम-वियोग में डूबा हुआ है।

 

 

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