परिवर्तन – सुमित्रानन्दन 1. कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल? भूतियों का दिगन्त छवि जाल, ज्योति चुम्बित जगती का भाल? राशि-राशि विकसित वसुधा…
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परिवर्तन – सुमित्रानन्दन 1. कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल? भूतियों का दिगन्त छवि जाल, ज्योति चुम्बित जगती का भाल? राशि-राशि विकसित वसुधा…
बापू के प्रति 1 तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन, तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल । हे चिर पुराण! हे चिर नवीन! भावार्थ – सुमित्रा…
1. कौन है अंकुश, इसे मैं भी नहीं पहचानता हूँ। पर, सरोवर के किनारे कण्ठ में जो जल रही है, उस तृषा, उस वेदना को जानता…
अभिनव मनुष्य1है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार,पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार।भोग-लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम,बह रही असहाय नर की भावना…
मैंने आहुति बनकर देखाअज्ञेय 1मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नन्दन-कानन का फूल बने?काँटा कठोर है, तीखा…