ram krishna paramhans

ram krishna paramhans
अवतरण दिवस पर विशेष
श्री राम कृष्ण परम हंस

श्री राम कृष्ण परम हंस के अवतरण दिवस पर विशेष
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| माया परमात्मा को वैसे ही ढक लेती है ,जैसे बादल सूर्य को …. जब बादल छंट जाते है , सूर्य दिखाई देने लगता है ,वैसे ही माया के हट जाने पर ईश्वर के दर्शन हो जाते है |
श्रद्धा ,आस्था ,विश्वास ,समर्पण और भक्ति का ऐसा समन्वय कि ह्रदय भक्ति भाव से परिपूर्ण हो जाता है। भक्त इस दुविधा में पड जाता है कि वह अपने नेत्र उनके मुख मंडल पर स्थिर करें अथवा चरणों पर ? कर्ण उनके अमृतवचनों का श्रवण करे या जिह्वा उनकी महिमा का बखान करे ? हस्त उनके पद प्रक्षालन करे या नासिक भक्तिमय वातावरण में फैली हुई सुवासित गंध में स्वयं को डुबो दे?
मनुष्य दो प्रेरणा शक्ति से संचालित होता है ,एक बुद्धि और दूसरा आत्मा। जहाँ बुद्धि अतार्किक होकर निरुत्तर ही जाती है ,वही से आत्मा की सत्ता का अभ्युदय होता है। संत श्री राम कृष्ण परमहंस आत्म शक्ति से अभिप्रेरित थे ,ना कि बुद्धि से। आत्मा प्रेम में मग्न होकर नाचती है ,गाती है ,झूमती है, बुद्धि इसे पागलपन कहती है। बुद्धि जिसे पागलपन कहती है ,वही तो भक्त का आनंद है।
प्रेम तक पहुँचाने का मार्ग पागलपन के बीच से ही होकर गुजरता है,अन्यथा प्रेम तक पहुंच ही नहीं जा सकता । संत श्री राम कृष्ण परमहंस का प्रेम में मग्न होकर भाव विभोर होकर नाचना आत्मिक प्रसन्नता की ही अभिव्यक्ति है।भक्ति का आनंद बुद्धि से नहीं हृदयानुभूति से होता है। प्रेम और भक्ति अनुभूति है ,बुद्धि विलास नहीं। जिसे सत्य का साक्षात्कार हो जाये उसके लिए सांसारिक वैभव त्याज्य है। द्वैत ,अद्वैत और विशिष्ठा द्वैत तीनो का ही समावेश था उनकी साधना में ,कोई भेद नहीं कोई पृथकता नहीं।
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| बुलबुला और जल एक ही है ,बुलबुला जल से उत्पन्न होकर जल में ही विलीन हो जाता है ,जीवात्मा और परमात्मा भी वैसे ही है ,एक परिमित है ,दूसरा अपरिमित ,एक पराधीन है दूसरा स्वाधीन |
जब आत्म शक्ति प्रबल हो जाती है ,तब अन्य शक्तियाँ स्वतः ही आकर्षित होने लगती है।अद्वैत साधक तोतापुरी और तंत्र साधिका वृद्धा भैरवी का दक्षिणेश्वर मंदिर में आना इस तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करती है।अपढ़ होते हुए भी दर्शन और ज्ञान स्वतः ही चलकर आ गए। संत श्री राम कृष्ण परमहंस ने इस सत्य का सहज बोध करा दिया कि विभिन्न धर्म प्रतियोगी नहीं, धर्म तो अपने आप में स्वतः सिद्ध सर्व श्रेष्ठ ही होता है ,यदि वह श्रेष्ठ नहीं होता तो धर्म ही नहीं होता।
सभी धर्म एक ही ईश्वर के पास ले जाते है ,जैसे सभी नदिया एक ही सागर में विलय हो जाती है, इस रूप में उन्होंने हिन्दू ,इस्लाम और ईसाई धर्म का निरूपण किया। अनुभूति के स्तर पर पहुँचकर समस्त भेद समाप्त हो जाते है। रामकृष्ण परमहंस की साधना समस्त धर्मो का सार है।
विरह की वेदना और मिलन का आनंद क्या होता है रामकृष्ण परमहंस के जीवन से जाना जा सकता है। ऐसी साधना थी रामकृष्ण परमहंस की जो अंधकार से प्रकाश , अज्ञान से ज्ञान और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली है। रामकृष्ण परमहंस की भूख थी तो सिर्फ माँ के दर्शनों की की प्यास थी तो माँ के दर्शनों की – देह में प्राण स्थिर थे तो सिर्फ अमूर्त को मूर्त रूप में देखने के लिए।
संत श्री राम कृष्ण परम हंस की साधना प्रमाणित कराती है कि बच्चों की सा हठ परमात्मा को भी विवश कर देता है। नवजात शिशु रोकर ही दूध पाता है ,वैसे ही साधक ह्रदयतल से आर्तनाद कर सप्त आवरणों को भेद कर परमशक्ति को भी प्रगट होने के लिए बाध्य कर देता है। माँ काली के दर्शन कर यह भी प्रमाणित कर दिया।
बुद्धि से मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है और प्राप्त ज्ञान का उपयोग या तो वैयक्तिक सुख के लिए करता है ,या फिर प्राप्त ज्ञान को दूसरो पर निरूपित अथवा आरोपित करता है।संत राम कृष्ण परम हंस के समकालिक और परवर्ती जितने भी संत हुए है उनमे से अधिकांश ने बुद्धि और ज्ञान को ही प्राथमिकता दी। बुद्धि और ज्ञान बल से ऐसे प्रकाण्ड पंडितों और विद्वानों ने अपनी विद्वता का लोहा तो मनवा लिया किन्तु स्वयं ज्ञान के सार तत्व के आनन्द प्राप्ति के उस लाभ से वंचित रह गए जो संत श्री राम कृष्ण परम हंस को प्राप्त हुआ।
ज्ञान और बुद्धि के सिद्धान्तों ने पंडित और विद्वानों के नाम को अमरता तो प्रदान कर दी,किन्तु कालान्तर में उनके सिद्धान्त अप्रासंगिक होते चले गए। संत श्री राम कृष्ण परमहंस की भक्ति बृज की गोपिकाओं की सी थी ,तो बुद्धिवादियों की भक्ति उद्धव की भांति ज्ञान आधारित।माँ काली के लिए विरह वेदना और दर्शन की आतुरता में संत श्री राम कृष्ण परमहंस वैसे ही तड़पते थे ,जैसे सूर की गोपिकाएँ भगवान श्री कृष्ण के लिए ।
वे शरीर को आत्मा का आवरण मानते थे। उनका मानना था कि कामिनी कंचन की आसक्ति यदि पूरी तरह तिरोहित हो जाये तो देह और आत्मा के स्वरुप को पृथक -पृथक देखा जा सकता है। वे ईश्वरीय सत्ता को आत्मानुभूति का विषय मानते थे। वे बुद्धि और ज्ञान को ईश्वरीय पथ में अग्रसित होने में सहायक मानते थे।
इतनी भीड़ में अपनी दिव्य दृष्टि से बाह्य रूप से तार्किक नरेन्द्र के भीतर छुपे हुए विवेक को पहचान लिया। यही कारण था युवक नरेन्द्र को नरेन्द्र से स्वामी विवेकानंद बनाने का।
स्वामी राम कृष्ण परमहंस के श्री मुख से
क़ुतुबनुमा की सुई हमेशा उत्तर की ओर रहती है ,इसी से समुन्दर में जहाजों को अड़चन नहीं पहुँचती ,इसी तरह जिसका मन ईश्वर की ओर केंद्रित रहता है ,वह संसार रुपी समुन्दर में नहीं भटक सकता।
जैसे बहते पानी में लकड़ी का टुकड़ा डालने पर उसके दो भाग हो जाते है। ब्रह्म में कोई भेद नहीं ,परन्तु माया के कारण भेद दिखाई देता है ,परमात्मा और जीवात्मा में ऐसा ही सम्बन्ध है
ईश्वर के ध्यान में वैसे ही दृष्टि लगाए रखे जैसे बगुला सब ओर से ध्यान हटाकर एकाग्रता से शिकार पर ध्यान केंद्रित रखता है।
मेढक दम जब झड़ जाती है ,तब जल -थल दोनों में रहता है ,इसी भांति अज्ञानता का अंधकार मिट जाने पर प्राणी ,संसार और ईश्वर दोनों में रहता है
जिस प्रकार सरसों से भरी बोरी सरसों चरों तरफ फ़ैल जाती है ,उसे एकत्र करना कठिन हो जाता है ,उसी प्रकार सभी दिशाओं में विचरने करने वाले मोह के कारण प्रथित मन का एक स्थान पर केंद्रण कठिन है।
जो प्रलोभनों के मध्य रहकर मन को क़ाबूकर पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है ,वही सच्चा शूरवीर है
ईश्वर भक्त ईश्वर लिए अपने सर्वस्व सुख देता है ,जैसे चींटी शक्कर के ढेर में मर जाती किन्तु पीछे नहीं लौटती।
जिस प्रकार एक भिक्षुक एक हाथ में सितार और दूसरे में ढोलक लिए मुख से गाता जाता है ,उसी प्रकार सांसारिक प्राणी सांसारिक कर्म करते हुए ईश्वर स्मरण करता रहे।
आध्यात्मिकता के भक्ति सरोवर के ऐसे परम हंस के श्री चरणों में कोटि -कोटि नमन।










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