परिवर्तन – सुमित्रानन्दन
1.
कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगन्त छवि जाल,
ज्योति चुम्बित जगती का भाल?
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार।
धरा पर करती थी अभिसार!
भावार्थ – सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि आज हमारी समद्धि और ऐश्वर्य, जो हमारे स्वर्णिम अतीत की पहचान थी, कहाँ विलुप्त हो गए? वे भारतवर्ष के वैभवपूर्ण और समृद्धशाली अतीत से वर्तमान की तुलना करते हुए कहते हैं कि हमारा देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था, लेकिन वह स्वर्ण युग कहाँ खो गया है? पुराने समय में, इस छोर से उस छोर तक सुख-समृद्धि का जाल फैला हुआ रहता था। इस देश में ज्ञान का आलोक भारत माता के मस्तक पर दमकता रहता था , अर्थात् यहाँ के लोग सुशिक्षित थे । धरती का कण- कण हरियाली से भरा रहता था। हरी-भरी फसलों से भरे खेतों को देखकर ऐसा लगता था जैसे पृथ्वी ने अपने यौवन का विस्तार कर लिया हो । भू लोक की सुंदरता देखकर ऐसा जान पड़ता था ,जैसे स्वर्ग स्वयं पृथ्वी से मिलने भूलोक पर उतर आया हो।
2
प्रसूनों के शाश्वत श्रृंगार,
(स्वर्ण भृंगों के गन्ध विहार)
गूंज उठते थे बारम्बार
सृष्टि के प्रथमोद्गार।
नग्न सुन्दरता थी सुकुमार
ऋद्धि औं सिद्धि अपार।
भावार्थ – सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि रंग-बिरंगे और सुगन्धित पुष्पों से पृथ्वी श्रंगारित रहती थी। उन सुगन्धित पुष्पों पर गुंजार करते हुए भंवरे को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे स्वयं सृष्टि भौंरों के रूप में घूम-घूम कर अपने ह्रदय का उद्गार व्यक्त कर रही हो। उस समय धरती पर उन्मुक्त और सुकुमार चारों ओर छाया रहता था । धरती सुख-समृद्धि से परिपूर्ण थी। वास्तव में, वैभवता से परिपूर्ण वह सुंदर युग सुंदर सपने के समान था।
3
अये, विश्व का स्वर्ण स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद विख्यात?
दुरित, दुःख दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण भ्रू-पात।
भावार्थ – सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि वह युग जीवन में आशा, उल्लास, सुंदरता से परिपूर्ण प्रथम प्रभात से समान था।कवि आज उस पुराने युग की विशेषताओं को नहीं पाकर क्षुब्ध मन से प्रश्न करते है कि आज वह सत्य कहाँ खो गया, जिसका हमारे ऋषि-मुनियों ने खुले कण्ठ से गुणगान किया था? हमारे वेद, जो पूरी मानव जाति को ज्ञान देते हैं, आज कहाँ खो गए? वे दिन कितने सुखद थे? जब हमारा समाज पाप, दुःख, दीनता आदि से मुक्त था और बुढ़ापा और मौत जैसी विभीषिकाओं से भी दूर था।
4.
हाय! सब मिथ्या बात!
आज तो सौरभ का मधुमास
शिशिर में भरता सूनी साँस!
वही मधुऋतु की गुंजित डाल
झुकी थी जो यौवन के भार,
अकिंचनता में निज तत्काल
सिहर उठती, जीवन है भार!
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि पुराने समय का स्मरण करते हुए पन्त जी कहते हैं कि वर्तमान हालात को देखकर कल की सुख-समृद्धि पर भला कौन विश्वास करेगा ? आज, अतीत की वे सारी बातें निरर्थक और झूठी लगती हैं। आज सुगन्धित बसन्त ,शिशिर जाड़े का रूप धारण कर दुःख और दीनता में परिवर्तित हो गया है। बसन्त ऋतु में भौंरों के समूहों से घिरे हुए वृक्षों की डालियाँ नए पत्तों और फूलों से लदकर झुकती थीं, आज वही डालियाँ नए पत्तों, फूलों और मंजरों के लिए तरस रही हैं। आज, दूसरों को सुख और आनन्द देने वाली डालियाँ अपने ही जीवन पर बोझ बन गई हैं। कवि इन उदाहरणों के माध्यम से समय की परिवर्तनशीलता का बोध करना चाहता है।
5
आज पावस नद के उद्गार
काल के बनते चिह्न कराल,
प्रात का सोने का संसार,
जला देती सन्ध्या की ज्वाल!
अखिल यौवन के रंग उभार
हड्डियों के हिलते कंकाल
कचों के चिकने, काले व्याल ।
केंचुली, काँस सिवार,
गूंजते हैं सबके दिन चार
सभी फिर हाहाकर।
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त समय के बदलाव का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आज वर्षा ऋतु में बाढ़ लाकर जो नदियाँ चारों ओर तबाही मचाती हैं, वही नदियाँ वर्षा ऋतु के बीत जाने के बाद अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं। कवि सुख के बाद दुःख के आने का दूसरा उदाहरण बताते हैं कि सुबह सूर्य की पहली सुनहली किरणों से पूरी धरती और पूरी प्रकृति सोने के रंग में रंग जाती है, लेकिन दिन चढ़ने पर सूर्य की आग, उस सुनहले संसार को जला कर भस्म कर देती है। यौवनावस्था में शरीर के सुंदर रंग और उभार उसे मजबूत और आकर्षक बनाते हैं, लेकिन वृद्धावस्था में मानव शरीर केवल हड्डियों का ढाँचा रह जाता है और उसमे कोई आकर्षण शेष नहीं रहता। काले सर्प के सदृश चिकने और सुंदर केश सर्प की केंचुली-सी मलिन काई के समान, काँस के पुष्प से सफेदजैसे उलझे हुए लगते हैं। जीवन में सुख स्थायी नहीं रहता। रहता। जीवन में सुख के चार दिन व्यतीत करने के बाद दुःख आना निश्चित है।
6
आज बचपन का कोमल गात
जरा का पीला पात
चार दिन सुखद चाँदनी रात
और फिर अन्धकार, अज्ञात!
शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल!
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल!
मृदुल होठों का हिमजल हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर;
भावार्थ: सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि आज बचपन का कोमल, सुंदर शरीर वृद्धावस्था में पीले, सूखे, खुरदरे पत्ते की तरह हो जाएगा। जीवन में सुखदायक चाँदनी रातें हैं, लेकिन ये सुख के क्षण बहुत कम समय के लिए रहते हैं. शेष जीवन में, अज्ञात अन्धकार से भरी रात्रि रहती है, जिसमें सारे सुख नष्ट हो जाते हैं। दुःख के क्षणों में आँसू इस तरह गिरते हैं, जैसे पीले पत्ते पतझड़ में गिरते हैं। आँखों से बहते आँसू, फूल के समान गालों को ऐसे झुलसाते हैं, जैसे शिशिर की ओस फूलों और पत्तों को झुलसाती है।उस समय प्रेमी के अधर प्रणय के चुम्बनों को ही नहीं बल्कि अपने प्रेमी के अधरों को भी भूल जाते हैं,। युवावस्था में जिन होंठों पर हमेशा ओस के कणों की तरह निर्मल और आकर्षक हँसी रहती है।वृद्धावस्था में, गहरी साँसों के छोड़ने से वही होंठ मलिन हो जाते हैं और हँसी विलुप्त हो जाती है ।
7
सरत भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर।
शून्य साँसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग!
मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार!
भावार्थ –सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि चिन्ताहीन युवावस्था में जो भौहें शरद ऋतु के स्वच्छ आकाश की तरह स्वाभाविक और सरल होकर मुख की सुंदरता बढ़ाती हैं, उम्र बढ़ने के साथ-साथ उन्हीं भौंहों से चिंता की लकीरें स्पष्ट रूप से झाकने लगती हैं।भौंहों चिंता के कारण अपनी सरलता खोकर सिकुड़ने लगती हैं। प्रेमी-प्रेमिका के होंठ जो मिलन के सुखद समय में एक दूसरे से जुड़े होते हैं, वे दुःख से व्याकुल होकर गहरी साँसें छोड़ने को मजबूर होते हैं। यही कारण है कि मिलन का समय छोटा होता है, जबकि वियोग का समय लंबा होता है; सुख कुछ समय रहकर चला जाता है, जबकि दुःख का असर देर तक रहता है।
8
अरे, वे अपलक चार नयन
आठ आँसू रोते निरुपाय,
उठे रोओं के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय!
किसी को सोने के सुख साज
मिल गया यदि ऋण भी कुछ आज,
चुका लेता दु:ख कल ही ब्याज
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि संसार के दु:ख का चित्रण करते हुए पन्त जी कहते हैं कि प्रिय की विरह-वेदना में पथराई आँखें बिना पलक झपकाए फूट-फूट कर रोती हैं। उनकी असहाय आँखों का दर्द कम करने का कोई उपाय नहीं है। मृत्यु के दौरान होने वाली पीड़ा की कल्पना करके और अपने आप को असहाय महसूस करके व्यक्ति की स्थिति चिंताजनक हो जाती है। भय की आशंका उसके रोम-रोम को इस प्रकार खड़ा कर देती है, जैसे वे एक-दूसरे का आलिंगन करना चाहते हैं। दुःख से उसे ऐसा दर्द हो रहा है, मानो उसके शरीर में काँटे डाल दिए गए हों। कवि पन्त कहते है कि सुख मानव का निरंतर साथी नहीं होता है। यदि किसी को आज सुख-सुविधा के साधन उधार मिल भी जाएँ, तो समय का चक्र उसे कल इतना कमजोर और दुखी बना देता है कि उसे सारे भोगे गए सुख ब्याज सहित चुकाने पड़ते हैं और उसकी हालत पहले से भी बदतर हो जाती है।कवि ने समय को क्रूर महाजन के समान बतलाया है।
9
काल को नहीं किसी की लाज!
विपुल मणि रत्नों का छविजाल,
इन्द्रधनुष की सी जटा विशाल
विभव की विद्युत ज्वाल |
चमक, छिप जाती है तत्काल;
मोतियों जड़ी ओस की डार
हिला जाता चुपचाप बयार!
भावार्थ- सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि इन्द्रधनुष की तरह चकाचौंध करने वाली और मोहक सम्पत्ति, जो मानव द्वारा अनेक रत्नों और मणियों के रूप में संचित की गई थी , एक समय के बाद क्षण भर में नष्ट हो जाती है। वैभव और सुख-सम्पत्ति का प्रभाव भी मानव जीवन पर क्षणिक होता है, जैसे बिजली की चमक अपनी चमक बिखेर कर तुरंत किसी अनजाने संसार में विलुप्त हो जाती है।
10
खोलता इधर जन्म लोचन
मूंदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण
अभी उत्सव औ हास हुलास
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छवास!
भावार्थ :सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि इस मृत्युलोक में जन्म-मरण का चक्र निरंतर चलता रहता है, संसार बदलता रहता है। कितने ही लोग जन्म लेकर संसार देखते हैं, तो कितने ही लोग मरकर हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाते हैं। इस तरह, जन्म लेने पर खुशी से उत्सव मनाया जाता है, तो मृत्यु के शोक में रोते हैं। वास्तव में, यह दुनिया एक अद्भुत विधान है। अगले ही क्षण दुःख बरबस आकर अपना प्रभाव जमा लेता है, और देखते ही देखते खुशी का साम्राज्य नष्ट हो जाता है ।
11
अचरिता देख जगत् की आप
शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप
ओस के आँसू नीलाकाश,
सिसक उठता समुद्र का मन,
सिहर उठते उहुगन!
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त को ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे अखिल सृष्टि संसार की क्षणिकता देखकर व्यथित हो रही है पवन अपने दुःख को आहे भर प्रकट रही है ।नीले आकाश के लिए भी यह सब असह्य हो गया है और वह दुखी होकर वृक्ष की शाखा पर ओस की बूंदें बनकर अपने आँसू प्रकट रहा है। उस करुणापूर्ण दृश्य को देखकर ग्रह-तारे भी कम्पित हो उठे हैं, और सागर भी धीरज खोकर सिसकियाँ भर रहा है।
12
अहे निष्ठुर परिवर्तन!
तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन!
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन!
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते क्षुब्ध होकर कहते है कि हे निष्ठुर परिवर्तन जब तुम प्रलयकारी ताण्डव करते हो, तो उसके भँवर में फँसकर इस दुनिया का कारुणिक अंत हो जाता है।तुम्हारे आँखें खोलने और बंद होने से इस दुनिया में उत्थान-पतन और क्रान्तिएँ होती हैं। तुम्हारे नेत्र खोलने पर उन्नति होती है और बंद करने पर पतन होता है।
13
अहे वासुकि सहस्रफन!
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर!
शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर,
वक्र-कुण्डल दिङ्मण्डल।
भावार्थ : सुमित्रा नंदन पन्त रचित परिवर्तन इस काव्यांश में कवि सुमित्रा नंदन पन्त कहते है कि हे सहस्र फनों वाले वासुकि! हर समय इस संसार के घायल वक्षस्थल पर तुम्हारे लाखों अदृश्य चरण अपने चिह्न छोड़ते रहते हैं। तुम्हारे विष के झागों से भरी हुई और पूरे विश्व को अपनी लपेट में लेने वाली सैकड़ों भयंकर फुकारें निरंतर आकाश में घूमती रहती हैं। हे बदलावकारी वासुकि! मृत्यु तुम्हारा जहरीला दाँत है, दो कल्पों के बीच का समय तुम्हारी केंचुली है, पूरी दुनिया तुम्हारा रहने का बिल है और दिशाओं का घेरा तुम्हारी गोलाकार कुण्डली है।




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