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navratri,7thday-kaal ratri-माता का साँतवा रूप

April 2, 2017
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navratri,7thday-kaal ratri-माता का साँतवा रूप

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काल रात्रि –माता का साँतवा रूप और  नवरात्र का साँतवा दिन 

काल रात्रि –
माता का साँतवा रूप और  नवरात्र का साँतवा दिन 
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काल रात्रि 

 

७-कालरात्रि – काल रात्रि अर्थात माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति .नवरात्र के सातवें दिन माता को काल रात्रि के रूप में पूजा जाता है। श्यामल वर्ण में गर्दभ वाहिनी माता का कालरात्रि रूप अत्यंत विलक्षण है। माता का यह रूप राक्षसो को भयभीत कर देनेवाला तथा भक्तों को भयहीन कर देने वाला है। सातवें  दिन माता के इसी स्वरुप की पूजा होती है। 
साधकों के लिए आज का रात्रि सिध्द्यों की रात्रि मानी जाती है .साधक का मन सहस्त्र सार में अवस्थित होता है .
स्वरुप –वर्ण अमावस्या की रात्रि जैसा स्याह घना ,विकीर्ण चिकुर ,कंठ में व्योम तड़ित,त्रिनेत्री ,श्वासों से नि:सृत होती हुई  ज्वाला , गर्दभ वाहन पर आसीन ,चतुर्भुजा –एक हस्त वरदान दे रहा है तो दूसरा अभय के लिए आश्वस्त कर रहा है ,दो हस्तों  में शत्रु का नाश और शक्तों की रक्षा  करनेवाले शस्त्र- खडग और लौह कंटक  . बाह्यरूप इतना भयावह कि भूत प्रेत और राक्षस भी भय से काम्पने लगते है किन्तु अपने भक्तो के लिए आंतरिक रूप से नवनीत सा स्निग्ध ह्रदय .अपने भक्तों के लिए शुभम्कारी और समस्त भय दूर करने वाली है -माता काल रात्रि .
  
दुर्गा सप्त शती में वर्णित है .सृष्टि के निर्माण से पूर्व जब सर्वत्र अन्धकार व्याप्त था ,उस समय देवी शक्ति ने सर्वप्रथम जिस देवी को प्रकट किया ,वह देवी काल रात्रि ही थी .महाकाली ,महामाया ,क्षुधा .तृषा ,निद्रा ,एकवीरा ,दुरत्यया देवी काल रात्रि के ही विभिन्न रूप है .
माता के स्तुत्य मन्त्र 
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 एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्तिथा 
लम्बोष्ठी कर्णीकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी। 
 
वाम पादेल्लसल्लोहलता कण्टक भूषणा 
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी।।
 
ॐ  कालरात्र्यै  नमः 
 
स्तोत्र –
हीं कल रात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती
काल माता कलिदर्पघ्नी कमदीश कुपान्विता
 
काम बीज जपान्दा कम बीज स्वरूपिणी
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी
 
क्लीं हीं श्री मन्त्रवर्णेन कालकंटकघातिनी
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा 
 
कवच –
ॐ क्लीं में ह्रदय पातु पादौ श्री काल रात्रि
ललाटे सततं पातु  तुष्टग्रह निवारिणी
 
रसनां पातु कौमारी,भैरवी चक्षुषोर्भम
कटौ पृष्ठे महेशानी करणोशंकरभामिनी
 
 
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि
तानि सर्वाणिमें देवी  सततं पातु स्तम्भिनी  
 

 


ॐ  कालरात्र्यै  नमः     ॐ  कालरात्र्यै  नमः     ॐ  कालरात्र्यै  नमः




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