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September 19, 2023
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1

शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल!

अपलक अनन्त नीरव भतल!

सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल.

लेटी है श्रान्त, क्लान्त. निश्चल!

तापस-बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,

लहरें उर पर कोमल कुन्तल!

भावार्थ-  सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि  चारों ओर शांत, तरल और चमकीली चाँदनी  व्याप्त है। पृथ्वी को आकाश जैसे टकटकी बाँधे निहार रहा है। पृथ्वी बहुत शांत है और  निशब्द  है। क्षीण धार वाली गंगा बालू के बीच मन्द-मन्द बहती है, मानो कोई सुंदर छरहरे, दुबले-पतले शरीर वाली सुन्दर युवती गर्मी से थकी हुई, ऐसे सुखद, शांत वातावरण में मुरझाई हुई और शांत लेटी हुई हो । चन्द्रमा का बिम्ब गंगा के जल में ऐसा दिखता है जैसे कोई गंगा रुपी तपस्वी अपने कोमल हाथों पर चन्द्रमुख रखकर लेटी हुई हो।छोटी-छोटी लहरें उसके वक्षस्थल पर ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे कोमल केश लहराते हैं।

2

गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर

चंचल अंचल-सा नीलाम्बर!

साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर

सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर!

भावार्थ – सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि जब तारों से भरे आकाश की चंचल परछाईं गंगा के जल में पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो गंगा रुपी गोरी बाला के स्पर्श से कॉपता हुआ  उसका तारों से भरा नीला आँचल लहरा रहा हो। छोटी-छोटी, कोमल, टेढ़ी, बलखाती लहरें आकाशरूपी नीले आँचल पर प्रकाशित होती हुई ऐसी जान पड़ती  हैं, मानो उसकी रेशमी साड़ी में सलवटें  पड़ी हुई  हो।

3

चाँदनी रात का प्रथम प्रहर,

हम चले नाव लेकर सत्वर

सिकता की सस्मित सीपी पर मोती की ज्योत्स्ना रही विचर

लो, पालें चढ़ीं, उठा लंगर!

मृदु मन्द-मन्द, मन्थर-मन्थर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर,

तिर रही, खोल पालों के पर!

भावार्थ: सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि   वे चाँदनी रात के प्रथम पहर में एक छोटी-सी नाव लेकर शीघ्रता से आगे बढते  हैं। वे गंगा तट की सुंदरता ऐसी जान पड़ती है  मानो चाँदनी खुली पड़ी रेतीली सीपी पर भ्रमण कर रही हो। ऐसे सुंदर वातावरण में नौका-विहार करने के लिए गंगा में नावें  पालें  खोलकर खड़ी हैं , लंगर उठा लिए जाने के बाद  तैरने के लिए स्वतंत्र हो गई । लंगर उठते ही छोटी-छोटी नावें अपने पालरूपी पंख खोलकर सुंदर हंसिनियों की तरह  गंगा  में धीमी-धीमी तैरने लगीं ।

4

निश्चल जल के शुचि दर्पण पर बिम्बित हो रजत पुलिन निर्भर

दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर!

कालाकांकर का राजभवन सोया लज में निश्चिन्त, प्रमन ।

पलकों पर वैभव-स्वप्न सघन!

भावार्थ- सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि  गंगा का निश्चल, शांत जल दर्पण के समान सुंदर है। चाँदनी में नहाया रेतीला तट उस स्वच्छ जलरूपी दर्पण में दोगुने आकार में दिखाई देता है। गंगा जल में शोभित कालाकाँकर के राजभवन का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।कालाकाँकर के राजभवन का प्रतिबिम्ब ऐसा दिखाई देता है जैसे यह राजभवन गंगा जल की शय्या पर निश्चिन्त होकर सो रहा है, और उसकी झुकी पलकों और शांत मन में वैभवपूर्ण सपने तैर रहे हैं।

5

 नौका से उठतीं जल-हिलोर, .

हिल पड़ते नभ के ओर-छोर!

विस्फारित नयनों से निश्चल कुछ खोज रहे चल तारक दल

ज्योतित कर नभ का अन्तस्तल;

जिनके लघु दीपों को चंचल, अंचल की ओट किए अविरल

फिरती लहरें लुक-छिप पल-पल!

भावार्थ- सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि नौका चलने से जल में तरंगें उठती हैं, जिससे इस छोर से उस छोर तक जल में प्रतिबिंबित आकाश इस छोर से उस छोर तक हिलता हुआ प्रतीत होता है।जल में पड़ती तारों की परछाई को देखकर लगता है कि तारों का दल प्रकाश फैलाकर अपनी आँखें फाड़-फाड़ कर कुछ खोज रहा है।गंगा की लहरें भी बार-बार छोटे-छोटे तारे की तरह चमकते हुए दीपकों को अपने आँचल में छिपाकर हर समय लुकती-छिपती रहती हैं।

6

पैरती परी-सी जल में कल,

रुपहरे कचों में हो ओझल!

लहरों के घूघट से झुक-झुक, दशमी का शशि निज तिर्यक मुख

दिखलाता मुग्धा-सा रुक-रुक!

भावार्थ- सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि  शुक्र तारे की झिलमिलाती परछाई जल में  सुंदर परी की तरह तैरती हुई दिखाई देती है। कवि को  श्वेत जल-तरंगों में उस  परछाई के ओझल होने का दृश्य ऐसा  जन पड़ता है जैसे चाँदी के चमकीले केशों में वह परी छिप गयी हो ।

दशमी का चाँद कभी लहरों की चंचलता में छिप जाता है, तो कभी साकार हो जाता है। कवि को लगता है कि नायिका अपने ही रूप से मुग्ध होकर अपने  चहरे को कभी चूँघट में छिपा लेती है, तो कभी उसे बाहर निकाल लेती है।

7

 जब पहुँची चपला बीच धार

छिप गया चाँदनी का कगार!

दो बाँहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर

आलिंगन करने को अधीर!

भावार्थ -सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि  उनकी नाव जब गंगा की बीच धार में पहुँचती है, तो चन्द्रमा की चाँदनी में चमकते हुए रेतीले तट दिखाई नहीं देते । कवि को गंगा तट के दोनों किनारे ऐसे लगते हैं, जैसे वे अपनी दोनों बाँहें फैला कर कृशकाय गंगा  कोमल शरीर को आलिंगन में  बाँध लेना चाहते हैं।

8

अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भ्रू-रेखा-सी अराल,

अपलक नभ, नील-नयन विशाल,

माँ के उर पर शिशु-सा, समीप, सोया धारा में एक द्वीप,

उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,

वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक?

 छाया को कोकी का विलोक!

भावार्थ- सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि दूर क्षितिज पर कतारबद्ध वृक्षों को देखते हुए ऐसा लगता है, मानो वे नीले आकाश की विशाल भौंहें हैं और धरती को एकटक देख रहे हैं। कवि आगे कहते हैं कि वहाँ पास ही एक द्वीप है जो लहरों को उलट रहा है। कवि को गंगा की धारा के मध्य स्थित उस द्वीप को देखकर लगता है कि कोई छोटा-सा बालक अपनी माता की छाती से लगाकर सो रहा है। कवि  गंगा नदी के ऊपर एक पक्षी को उड़ते देखकर सोचने लगता है कि कहीं यह वह चकवा तो नहीं है, जो जल में अपनी ही छाया को चकवी समझ कर उसे पाने की इच्छा से आकाश में उड़ता जा रहा है और अपने दुःख को दूर करने के लिए आकाश में उड़ता जा रहा है।

9

पतवार घुमा, अब प्रतनु भार

नौका घूमी विपरीत धार।

डाँड़ों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन-स्फार।

बिखराती जल में तार-हार!

चाँदी के साँपों-सी रलमल नाचती रश्मियाँ जल में चल

रेखाओं-सी खिंच तरल-सरल!

भावार्थ  –  सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि उनकी नाव जब गहरे पानी में धारा के मध्य जा पहँची , उसका भार अत्यधिक कम हो गया,  तब कवि ने पतवारों को घूमाकर नाव को धारा से विपरीत दिशा में मोड़ दिया। पतवार चलने से जल में झाग बन गए। इस दृश्य को देखते हुए लगता है कि पतवार अपने हाथों से तारों की माला तोड़-तोड़कर हथेलियों को फैलाकर उनमें झाग रुपी  मोतियों को भरकर जल में बिखेर रहा  हो । पतवारों  के चलने से  नदी के शांत जल में उठने वाली लहरें चाँदी के साँपों की तरह आगे की ओर रेंगती हुई  प्रतीत  हो रही थी । चन्द्रमा की किरणें लहरों पर पड़कर ऐसी लगती है जैसे बहते हुए जल में अनगिनत सीधी रेखाएँ खींच गई  हों।

10

लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल

फैले फूले जल में फेनिल;

अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले-ले सहज थाह।

हम बढ़े घाट को सहोत्साह!

भावार्थ – सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि गंगा की  लहरों पर  एक ही चन्द्रमा सौ-सौ चन्द्रमा और एक-एक तारा सौ-सौ तारे बनकर झिलमिला रहे हैं। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे  गंगा के खेत में लहरों की लताएँ फल-फूल रही हैं। कवि किनारे की ओर  लौटते हुए  कहते हैं कि अब नदी की गहराई कम होने लगी है, और हम लग्गी से पानी की गहराई का अनुमान लगाते हुए घाट की ओर बढ़ रहे हैं।

11

 ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार

उर के आलोकित शत विचार।

इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,

शाश्वत है गति, शाश्वत संगम!

शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,

शाश्वत लघु लहरों का विलास!

भावार्थ -सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि जैसे-जैसे उनकी  नाव दूसरे किनारे की ओर बढ़ती जाती है,उनके मन में अनगिनत विचार उठने  लगते  हैं।जैसे जलकी धारा का प्रवाह निरंतर  बना बहती रहता है, जीवन  का प्रवाह   भी इसी तरह निरंतर बना  रहता है।जीवन, जलधारा की तरह निरंतर बहता  रहता है।जीवन का क्रम भी  धारा की तरह कभी नहीं टूटता।कवि पन्त का कहते  है कि यह आकाश , चन्द्रमा की चाँदनी और नदियों का जलप्रवाह  ,यें सब शाश्वत है।

12

हे जग-जीवन के कर्णधार! चिर जन्म-मरण के आरपार,

शाश्वत जीवन-नौका-विहार!

मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण,

करता मुझको अमरत्व दान!

भावार्थ-  सुमित्रा नंदन पन्त द्वारा रचित नौका-विहार के  इस पद्यांश में कवि कहते है कि संसार में जीवन रूपी नौका को चलाने वाला परमात्मा जन्म और मृत्यु जैसे शाश्वत कर्मों को बनाए रखता है, जो जीवन की गति को बनाए रखते हैं।जीवन की नौका निरंतर बहती रहती है। ।

 कवि  चिन्तनशील होकर कहते हैं कि मैं अपने अस्तित्व का, सत्ता का ज्ञान भूल गया था ,आज इस नौका विहार ने  सत्य का बोध करा दिया ।यह अनवरत प्रमाण जीवन की निरंतरता का प्रमाण है,   जीवन की शाश्वतता का जलधारा रूपी यह शाश्वत प्रमाण मुझे अमरत्व प्रदान करता है।

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