inspirational & motivational quotes


छोटा सा दीपक पूरे अंधकार को तो नही मिटा सकता किन्तु अपने आस-पास के अँधेरे को अपनी क्षमतानुसार थोड़ी दूर तक ज़रूर धकेल देता है। मनुष्य को भी चाहिए की निठल्ले बैठे रहने की अपेक्षा थोड़ी बहुत कोशिश ज़रूर कतरा रहे ,सारे दुःख तो दूर नहीं होंगे लेकिन दुखों का बोझ पहले से कुछ कम ज़रूर हो जायेगा।
काम करने और सोचने में वही अंतर है जो चलने और बैठे रहने में है 
वह धन किस काम का जो मन की शांति खोकर ,अपनों से दूर होकर और ,आत्मा के विरुध्द अर्जित किया हो
मनुष्य बाहरी अनेक बातें तो जानना चाहता है, किन्तु यह जानने का प्रयास नहीं करता कि वह स्वयं क्या है ?
इतिहास हार कर बैठ जाने वालों से नहीं ,विफल हो जाने के बाद फिर से प्रयत्न करनेवालों से बनता है
भविष्य की चिंता और भूतकाल का शोक मनुष्य से उसके वर्तमान का सुख भी छीन लेता है। कहा भी है –
चिंता ज्वाला शरीर को बन दावा लगि जाए
प्रकट धुआँ दिखे नहीं , उर अंतर धुन्धुआए
गलती होना स्वाभाविक है ,क्योकि गलती मनुष्य से ही होती है किन्तु गलती स्वीकार कर उसे सुधार लेनेवाला बुध्दिमान है ,खुद की गलती को दूसरों पर थोपकर स्वयं को निर्दोष साबित करनेवाला मूर्ख है
बाहर से निर्दोष कहलाने की कोशिश करने की अपेक्षा ,मन से निर्दोष बने रहने की कोशिश कहीं ज्यादा अच्छी है
महत्वाकांक्षी के लिए प्रसिध्दि खारे जल की तरह है ,जितना ही वह पीता है ,उसकी पिपासा उतनी ही बढाती जाती है
आलस्य से छोटे से छोटा काम भी कठिन जान पड़ता है किन्तु उत्साह से असंभव कार्य भी आसान हो जाते है।
यदि मनुष्य चिंतन ,चरित्र और व्यवहार बदल ले ,तो सद्विचार स्वत :आने लगते है 
कठिनाइयों का समाधान बाहर खोजने की बजाय अपने भीतर खोजे
जिसे तुम पाना चाहते थे किन्तु पा न सके ,तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम उसे चाहते ही नहीं थे
पशु न बोलने से कष्ट पता है और मनुष्य बोलने से
प्रतिशोध की भावना मनुष्य को मलिन ,दूषित और दुराचारी बना डालती है
कल को आज से बेहतर कैसे बनाये ?इसका एक ही उपाय है -दृष्टिकोण बदल दीजिये।
किसी ने क्या खूब कहा है -सोच बदल दिजिए,सितारे बदल जायेगे
नज़र बदल दीजिये ,नज़ारे बदल जायेगे
कश्तियाँ बदलने की ज़रुरत नहीं
दिशा बदल दीजिये ,किनारे बदल जायेगे
मूर्खों का समय व्यर्थ की बातों ,सोने में और आलस्य में जाता है। जबकि बुध्दिमानों का समय सत्कर्म और सद्ज्ञान में व्यतीत होता है
धैर्य का फल ऊपर से कड़वा होता है और भीतर से मीठा
खुशियां बाहर से नहीं भीतर से तय होती है
बर्फ और तूफ़ान फूलों को नष्ट कर सकते है ,बीज को नहीं
धन -दौलत तो अकूत कमाई जा सकती है किन्तु पेट अकेला उसे पचा नहीं सकता
निष्ठुरता निर्जीव का लक्षण है ,यदि मनुष्य भी संवेदना शून्य हो जाये तो तो निर्जीव और मनुष्य का अंतर ही समाप्त हो जायेगा
भावना रहित मनुष्य का ह्रदय चट्टान की तरह निष्ठुर हो जाता है
वास्तविक स्वरुप की जानकारी न होने पर मनुष्य ना सोचने वाली बातें सोचने लगता है और न करने योग्य कार्य करने लगता है
समस्त कार्यों का मूल -विचार है। मस्तिष्क में जिस तरह के विचार लाएंगे है ,उसी प्रकार के कार्य होने लगते है
निष्ठा से परिपूर्ण पुरुषार्थ में अद्भुत शक्ति है
संवेदनाओं में करुणा का समावेश कर लेने पर ह्रदय में उदारता स्वत :उत्पन्न हो जाती है





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