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geeta adhyay saar-17

August 30, 2016
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सत्रहवाँ  अध्याय 

 
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श्री हरि 


सत्रहवाँ  अध्याय 


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पिछले अध्याय में दैवी तथा आसुरी गुण ,ज्ञानी और अज्ञानी मनुष्य ,नरक के तीन द्वार( काम-क्रोध-लोभ )और शास्त्रीय विधान का पालन करने का वर्णन किया था 




इस अध्याय में कुल २८ श्लोक है 

इस अध्याय को श्रद्धा त्रय विभाग योग कहा गया है 

इस अध्याय में भगवान् ने आस्था ,भोजन ,यज्ञ ,तप  तथा ब्रह्म  के तीन-तीन प्रकारों का  वर्णन किया है 

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इस अध्याय में जब  अर्जुन  भगवान् से  शास्त्र विधि छोड़कर श्रद्धापूर्वक पूजा करने वालों के सम्बन्ध में प्रश्न करते है ,तब भगवान् कहते है कि  मनुष्य की श्रद्धा तीन तरह की होती है-सात्विक  ,राजसिक  ,और तामसिक।
मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वाभाव और संस्कार के अनुरूप होती है। यदि मनुष्य श्रद्धा पूर्वक अपने अभीष्ट लक्ष्य का चिंतन करता रहे तो वह जैसा चाहे वैसा बन सकता है।

सात्विक मनुष्य देवी-देवता का ,राजस मनुष्य यक्ष  व राक्षस का  और तामस मनुष्य भूत-प्रेतों की पूजा करते है। उस मनुष्य को आसुरी स्वभाववाला  अविवेकी समझा जाना चाहिए ,जो शास्त्र विधि के विपरीत दम्भ और अभिमान से युक्त  ,कामना और आसक्ति से प्रेरित ,देह में स्तिथ पंचभूत और अन्तःकरण में वास करनेवाले परमात्मा को कष्ट देकर तप करते है।
आगे  भगवान    बतलाते  है की  भोजन , यज्ञ  , तप   और  दान  भी तीन-तीन  प्रकार  के  होते है।  भोजन  के संबंध में   भगवान्    कहते है  कि  सात्विक  व्यक्ति  को आयु , बुद्धि , बल ,स्वास्थ ,सुख  और प्रसन्ता  बढ़ाने वाले   रसयुक्त  , चिकने  तथा  शरीर को शक्ति  देने वाले आहार प्रिय  होते है।  राजसिक  मनुष्य  को कड़वे ,खट्टे ,नमकीन ,तीखे  ,गरम ,रूखे दहकार  जैसे  दुःख, चिंता और  रोग  को उत्पन्न   करने वाले आहार प्रिय  होते है।  तामसिक मनुष्य  को अधपका  ,रसरहित , दुर्गन्ध युक्त  ,बासी ,जूठा ,मॉस ,मदिरा  जैसे आहार पसंद आते है।
आहार के भेद केपश्चात   यज्ञ  के भेद बतलाते  हुए भगवान् कहते है कि  बिना फल  की कामना  से विधि पूर्वक  यह सोचकर किया जाता है ,यज्ञ करना मेरा  कर्तव्य है। ऐसा  यज्ञ सात्विक  यज्ञ होता है।  फल की इच्छा   और  दिखावे  के लिए किया गया यज्ञ राजसिक  होता है।
और जो यज्ञ शास्त्र  विधि के विपरीत अन्नदान  ,मन्त्र ,दक्षिणा  दिये  बिना किया गया यज्ञ तामसिक होता है। तप  के संबंध में  भगवान्   बतलाते है कि    देवी- देवता, पुरोहित ,गुरु और  ज्ञानीजनों      का पूजन , पवित्रता , सदाचार , ब्रह्मचर्य  और अहिंसा  यह शारीरिक  तप  है।
ऐसी वाणी  जिसका उपयोग   शास्त्रो  को  पढ़ने  मे  हो , सत्य  ,मृदु ,हितकारक  हो , इससे वाणी  का तप  कहते है।  मन  की प्रसन्नता सरलता ,चित्त की स्थिरता ,मन का नियंत्रण और शुद्ध विचार मानसकि तप  है। मन ,वाणी और शरीर का तप  सात्विक ,दूसरों से मान -सम्मान पाने और पूजा करवाने के प्रयोजन से किया गया तप  राजसिक ,तथा मूढ़ता पूर्वक हठ  से अपने शरीर को कष्ट देकर या दूसरों को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया तप  तामसिक होता है।
कर्तव्य भाव से जो दान देश ,काल ,औए पात्र के अनुसार बिना प्रतिफल की कामना से दिया जाय ,वह दान सात्विक होता है और जो दान फल प्राप्ति ,प्रत्युपकार की कामना से  या श्रद्धा से ना दिया जाये ,ऐसा दान राजसिक होता है।
तामसिक दान वह होता है जो देश ,काल ,और पात्र का विचार किए बिना अनादर  या तिरस्कार करके दिया जाता है।
ब्रह्म को भी तीन नामों से जाना जाता है -ओम ,तत ,और सत।
ब्रह्म के द्वारा ही सृष्टि के आदि मे वेदों ,ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई ,इसलिए यज्ञ ,दान ,तप आदि वैदिक क्रियाओं का प्रारम्भ ओंकार के उच्चारण द्वारा किया जाता है।
फल की इच्छा   रखने वालों के द्वारा यज्ञ ,तप दान की क्रियाएं तत का उच्चारण करके की जाती है।
यज्ञ ,तप  ,और दान में श्रद्धा तथा परमात्मा के लिए किये जानेवाले  निष्काम कर्म और परमात्मा के अच्छे भाव ,शुभ कर्म और परमात्मा के अस्तित्व के लिए सत का प्रयोग किया जाता है।
लोक -परलोक में कोई प्रयोजन ना हो,जिसमे श्रद्धा ना हो ,ऐसे यज्ञ ,दान और तप को असत कहते है।

 

सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ 

अट्ठारहवां  अध्याय अगले अंक में प्रकाश्य 

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