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geeta adhyay saar-13 in hindi

July 16, 2016
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श्री हरि 

 

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बारहवें अध्याय में सगुण -निर्गुण, अव्यक्त अक्षर की उपासना, परब्रह्म प्राप्ति के उपाय का वर्णन हुआ था 

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तेरहवां अध्याय 

इस तेरहवें अध्याय में कुल ३४ श्लोक है 

इस अध्याय को क्षेत्र -क्षेत्रज्ञ  विभाग योग कहा गया है 

इस  अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ प्रकृति पुरूष 
देहाभिमान  बाधा  को दूर करने के उपाय का वर्णन हुआ है 

 

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Hindi Hindustaniभगवान् कहते है कि  यह देह क्षेत्र है और जो इस क्षेत्र को जान लेता है वह क्षेत्रज्ञ है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का 

ज्ञान तत्व ज्ञान है। इस अध्याय में आदि प्रकृति ,महा तत्व ,अहंकार तत्व ,पांच महाभूत ,दस इन्द्रियां 

पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ,मन,इच्छा ,द्वेष ,सुख-दुःख ,स्थूल शरीर  चेतना ,धैर्य सहित क्षेत्र का वर्णन हुआ है।

ज्ञान -अज्ञान क्या है ?इस सम्बन्ध में भगवान् कहते हैं  मान और दिखावे का ना होना ,अहिंसा ,क्षमा 

सरलता ,गुरु-सेवा ,बाह्य -आतंरिक शुद्धि ,मन पर नियंत्रण ,स्थिरता ,ऐन्द्रिक विषयों के प्रति अनासक्ति   

अहंकार का ना होना ,जन्म -मृत्यु ,वृद्धावस्था ,रोग में दुःख रूप ,दोषों को बार -बार देखना  आसक्ति रहित 

होना ,रक्त -सम्बन्धियों के प्रति ममता ना होना , प्रिय-अप्रिय में सम रहना ,परमब्रह्म में अनन्य भाव की 

भक्ति ,एकांत निवास,सांसारिकता के प्रति अरुचि ,अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति प्रयत्न में रत रहना, तत्व –

ज्ञान द्वारा सर्वत्र परमात्मा को देखना ,यह सब ज्ञान है और इसके विपरीत होना अज्ञान है।

आगे  भगवान श्री  कृष्ण परमात्मा  के बारे  मे  बताते हुए  कहते  है कि  परब्रह्म   परमात्मा  मैं  सत  

अर्थात  अक्षर-अविनाशी है और न ही असत अर्थात  क्षर या  नाश्वान  है अर्थात  इन दोनों से पर अक्षरातीत 

है। परब्रह्म सर्व-व्यापी है। उसके हाथ -पैर ,नेत्र सर ,मुख , कान , सर्वत्र है। वह प्राकृत इंद्रियों के बिना भी 

सूक्ष्म इंद्रियों द्वारा सभी विषयों को अनुभव करता है। सारे जगत का पालन-कर्ता होकर भीआसक्ति रहित 

है। प्रकृति के गुणों से रहित होकर भी (जीव रूप धारण कर )गुणों का भोक्ता है। समस्त चर -अचर के बाह्य 

व अंतर में भी परब्रह्म ही व्याप्त है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म होने के कारण मानवीय इंद्रियों द्वारा देखा या जाना 

नहीं जा सकता। वह दूर होकर भी समीप है। एक होकर भी अनेक है। सभी भूतों को उत्पन्न करने ,पोषण

करने और संहार करनेवाला भी परब्रह्म परमात्मा ही है। 

वही परब्रह्म अंधकार से पर समस्त ज्योतियों का स्त्रोत है। वही ज्ञान और ज्ञान का विषय है। परब्रह्म 

परमात्मा सबके अंतःकरण में व्याप्त है। तारतम्य विद्या द्वारा उसे जाना जा सकता है। इन तत्वों को 

जानकार भक्त परब्रह्म परमात्मा के स्वरुप को प्राप्त करता है। 

प्रकृति और पुरूष दोनों अनादि है। विभूतियाँ ,गुण ,शरीर  ,इन्द्रियां ,प्रकृति से ही उत्पन्न होती है। चेतन 

शक्ति के द्वारा मनुष्य सुख -दुःख अनुभव करता है।  प्रकृति के साथ मिलकरही मनुष्य प्रकृति को  भोक्ता 

है और प्रकृति के  संयोग के कारण  ही मनुष्य जीव बनकर  अच्छी और बुरी योनियों में जन्म लेता है। यह 

परम पुरूष ही अथार्त आत्मा ही जीवरूप से इस देह  में साक्षी सम्मति देनेवाला। पालन-कर्ता भोक्ता 

,महेश्वर ,परमात्मा आदि कहलाता है। 

जो मनुष्य यथार्थ रूप से गुणों सहित प्रकृति को जान लेता है ,वह कर्तव्य  कर्म करते हुए भी पुनर्जन्म को

प्राप्त नहीं होता कोई भी ध्यान के अभ्यास ,सांख्य योग अथवा कर्मयोग के द्वारा शुद्ध मन और बुद्धि से

अपने ह्रदय में ईश दर्शन कर सकता  है किन्तु जो लोग ध्यान ,सांख्य और कर्मयोग को नहीं जानते और

शास्त्र व महापुरूषों के मतानुसार करते है ,ऐसे मनुष्य श्रद्धा नौका द्वारा संसार सागर को पार कर  जाते है। 

जो मनुष्य परब्रह्म को ही समस्त नश्वर प्राणियों में संभव से देखता है ,वही ईश  दर्शन कर पाता है क्योकि 

ईश  दर्शन पाकर वह हिंसा नहीं करेगा और परमगति को प्राप्त करेगा। 

वह मनुष्य ज्ञानी है जो सभी कर्मों को प्रकृति के गुणों द्वारा किया जाता  देखता है और स्वयं को अकर्ता 

मानता है। जब मनुष्य  समस्त प्राणियों और उनके विभिन्न विचारों को परब्रह्म परमात्मा से उत्पन्न 

समझने लगेगा ,वह परब्रह्म परमात्मा को पा लेंगा। 

ब्रह्म के लक्षण बतलाते हुए भगवांकहते है कि  परब्रह्म परमात्मा देह में वास करते हुए भी न कुछ करता है 

और न देह  से लिप्त होता है अथार्त  वह देह के विकारों से दूषित नहीं होता क्योकि परब्रह्म परमात्मा 

अनादि और विकार रहित होता है। परब्रह्म परमात्मा से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कोचेतना प्राप्त होती है। 

इस अध्याय के अंत में भगवान् निष्कर्ष रूप में एक बार पुनः कहते है कि  जो मनुष्य तत्व ज्ञान द्वारा क्षेत्र 

और क्षेत्रज्ञ के भेद व प्रकृति को जांन लेते है परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते है औेर  वे मनुष्य भी परब्रह्म 

परमात्मा को प्राप्त कर लेते है जो प्रकृति के विकारों से छूटने का उपाय जान लेते  है। 


तेरहवां अध्याय सम्पूर्ण हुआ 

चौहदवां अध्याय अगले अंक में प्रकाश्य 

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जय श्री कृष्णा  …… राधे-राधे 

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