chanakya neeti in hindi -9

chanakya neeti in hindi -9
चाणक्य -नीति -9
चाणक्य -नीति -९
मुक्ति की कामना रखने वाले को विषय – वासनाएँ विष के समान त्याग देनी चाहिए तथा सहनशीलता , सरलता , दया , पवित्रता और सच्चाई को अमृत के समान ग्रहण कर लेना चाहिए।

नराधम मनुष्य एक दूसरे पर दोषारोपण कर ह्रदय को आघात पहुँचाने वाले संभाषण करते है , वे वैसे ही नष्ट हो जाते है जैसे बाबी में फँसें साँप अपने प्राण गवा देते है।
सृष्टि के रचयिता ने यदि स्वर्ण को गंध , गन्ने को फल , चन्दन को पुष्प प्रदान नही किये उसी तरह विद्वजन को धन सम्पन्न और राजा को दीर्घायु प्रदान नही की तो निश्चित रूप से परमात्मा का कुछ न कुछ हेतु अवश्य रहा होगा अर्थात परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई पूर्ण नही।

जैसे औषधियों में गुरच गिलोय , सुखो में भोजन ,इन्द्रियों मे नेत्र श्रेठ है , वैसे शरीरांगों में मस्तिष्क श्रेष्ठ है।
आकाश जहाँ न जाना संभव है और न किसी से संवाद सम्भव है। फिर भी जिन विद्धजनो ने धरती पर रहकर भी आकाशीय नक्षत्रो का ज्ञान दिया, वे निःसंदेह हमारे सम्मान और प्रशंसा के अधिकारी है।
शिक्षार्थी , सेवक , पथिक , भूख से व्यथित ,भयातुर , भंडारी और द्धारपाल तह सातो सोये हुए हो तो इन्हें जगा देना अर्थात सावचेत कर देना श्रेयस्कर है ,किन्तु सर्प , नृप , शकूर , बालक , श्वान और मूर्ख इन सातो के नींद से नहीं जगाना चाहिए।


जैसे विषहीन सर्प के डसने का कोई प्रभाव नहीं होता ,वैसे ही धन प्राप्ति के लोभ से वेदों का अध्ययन करने और अधर्मी से भोजन प्राप्त करनेवाले ब्राह्मण के पूजा -अनुष्ठान का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
ऐसे व्यक्ति के रुष्ट होने की चिंता नहीं करनी चाहिए ,जिसके क्रुद्ध होने पर ना हानि हो और ना प्रसन्न होने पर आर्थिक लाभ हो ,जो ना दंड देने का सामर्थ्य रखता हो और ना किसी प्रकार का अनुग्रह कर सकने की योग्यता रखता हो।
जीवन जिसका पुनः प्राप्त होना दुर्लभ है। बुद्धिमान इस जीवन का सार्थक भोग करते है किन्तु मूर्ख व्यर्थ के कार्यों में अपना जीवन व्यतीत कर देते है। बुद्धिमान प्रातः काल धर्म ग्रन्थ पढने में व्यतीत करते है तो मूर्ख जुआ खेलने में ,बुद्धिमान सत्साहित्य का अध्ययन करते है तो ,मूर्ख स्त्री प्रसंग में ,बुद्धिमान रात्रि में भी अपने दिन -भर की क्रिया -कलापों का आत्म -विश्लेषण करते है ,मूर्ख दूसरों को छलने की योजना बनाने जैसे निंदनीय कृत्य में समय व्यतीत करते है। 
शक्तिहीन होकर भी मनुष्य को कभी दूसरे के सामने स्वयं को शक्तिहीन के रूप में प्रकट नहीं करना चाहिए ,बल्कि शक्ति शाली होने का दिखावा अवश्य करना चाहिए ,लोग कुछ तो भय रखेंगे ,ठीक वैसे ही जैसे सर्प विषहीन हो लेकिन जब फन फैलाता है तो लोग भयभीत अवश्य होते है।
अपने हाथों से गुंथी माला ,अपने हाथ से घिसा चन्दन ,अपने हाथ से लिखा स्त्रोत ,ये वे गुण है जिनके द्वारा मनुष्य इंद्र की सम्पदा पाने में भी समर्थ हो जाता है। कहा भी गया है -अपना हाथ -जगन्नाथ।
गन्ना ,तिल ,शूद्र ,कांता ,स्वर्ण , पृथ्वी ,चन्दन ,दही ,और पान इनका मर्दन गुणवर्द्धक होता है।
दरिद्रता भी सुशोभित हो सकती है यदि मनुष्य अपना धैर्य न त्यागे ,साधारण वस्त्र भी सुंदर लग सकता है यदि वह स्वच्छ हो ,साधारण भोजन भी स्वादिष्ठ लग सकता है ,यदि वह गर्म हो ,इसी तरह साधारण सी लगने वाली स्त्री भी सुंदर
लग सकती है यदि वह गुणवती और सुशील हो। 







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