chanakya neeti-17

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चाणक्य नीति -१७

चाणक्य नीति -१७
वह वृद्धा जो नीचे झुकी हुई दिख पड़ रही है ,वह हम सब का भविष्य है। इस अवस्था को हम सभी को प्राप्त होना है। यह हम सब के लिए सचेत होने का संकेत है अर्थात जिसने अपनी यौवनावस्था का समय रहते सार्थक उपयोग नहीं किया ,वह बुढापे में अपनी यौवनावस्था को इसी तरह ढूढता रहेगा ,जो खो देने के बाद कभी प्राप्त नहीं होती।
मनुष्य का कोई एक गुण उसके अन्य सभी अवगुणों को गौण कर देता है ,जैसा कि केतकी जो साँपों से घिरी रहती है, फल रहित है ,कंटीली है ,टेढ़ी है , कीचड़ में उत्पन्न होती है ,सहज प्राप्त नहीं है ,इतने अवगुण होने पर भी वह अपनी सुगंध से सबको प्रिय बना लेती है।
साँप का विष उसके दांतों में होता है ,मक्खी का विष उसके सिर पर होता है , बिच्छू का विष उसकी पूँछ में होता है , किन्तु दुष्ट व्यक्ति के सभीअंगों में विष भरा होता है।

उपकार करनेवाले के प्रति प्रत्युपकार करना चाहिए किन्तु दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए ,ऐसा करना अनुचित भी नहीं है ,मारनेवाले को मारना अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

यदि मनुष्य लोभी हो तो अन्य पापकर्म न करे तो भी स्वतः हो जाएंगे ,यदि मनुष्य पर निन्दक हो तो अन्य पाप करने की आवश्यकता ही नही , यदि मन मे सत्य के प्रति दृढ़ता है तो उसे तप करने की आवश्यकता नही। यदि मन स्वच्छ है ,तो तीर्थ की आवश्यकता ही नही है।
यदि सज्जनता का गुण प्राप्त हो जाए , तो अन्य गुणों की आवश्यकता ही नही। यदि सत्कर्म का यश प्राप्त है, तो आभूषण से सुसज्जित होने की आवश्यकता ही कहाँ है ? विद्या प्राप्त को धन की आवश्यकता नही और यदि अपयश है ,तो मृत्यु नहीं भी हो तो भी वह मृत तुल्य ही है।

विवशता में किया जाने वाला अच्छा कार्य विशेषता नही बन सकता। शक्तिहीन सज्जनता दिखलाये ,वह विवशता है। विशेषता तब है, जब शक्ति संपन्न सज्जनता दिखलाये।
रुग्ण अवस्था में प्रभु स्मरण विशेषता नहीं , विवशता है। विशेषता तब है, जब सर्व -संपन्न होकर भी प्रभु स्मरण करें।
वृद्धा का पतिव्रता पालन विशेषता नहीं ,विवशता है। विशेषता तब है, जब परिपूर्ण यौवनावस्था में पतिव्रता का पालन करें।
अन्न -जल के समान दूसरा अन्य कोई दान नहीं ,द्वादशी के समान अन्य कोई तिथि नहीं ,गायत्री मन्त्र से बढ़कर अन्य कोई मन्त्र नहीं और माता से बढ़कर अन्य कोई देवता नहीं ।![]()
कुन्दरू बुद्धि क्षीण कराती है और वच बुद्धि का पोषण कराती है। स्त्री शक्ति का नाश करती है और दूध उस शक्ति को प्रबल बनाता है।
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उस पर ईश्वर की इससे बढ़कर और क्या कृपा हो सकती है, जिसे सुशील पत्नी और सुयोग्य सन्तान का सुख प्राप्त है।
धर्म पालन के अभाव में मनुष्य पशुतुल्य है ,अन्यथा भोजन ,निंद्रा ,भय ,मैथुन ,संतानोत्पति ये सब गुण तो पशुओं में भी होते है। धर्म पालन ही मनुष्य को पशुओं से भिन्न पहचान देता है।
यदि कोई धनी अपने धनोन्माद में किसी गुणी का तिरस्कार कर दे, तो ये गुणी की नहीं ,उसी की हानि है। पृथ्वी और काल अनन्त है ,गुणी व्यक्ति को यहां और अभी नहीं तो कहीं और किसी समय आदर मिल जायेगा किन्तु धनोन्मादी ने एक पुण्य प्राप्ति का एक स्वर्णिम अवसर गवाँ दिया ,समझो।

हाथ की शोभा दान से होती है कंगन से नहीं। देह शुद्धि चन्दन लेपन से नहीं, स्नान से होती है ,तृप्ति भोजन से नहीं, आत्म-सम्मान से होती है। मुक्ति छापा -तिलक से नहीं ,सत्य ज्ञान की प्राप्ति से होती है।
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जिन सज्जनों के ह्रदय में परमार्थ का भाव उत्पन्न हो गया हो ,ऐसे परमार्थी की हर विपत्ति नष्ट हो जाती है और धन -सम्पदा उसके कदमों में बिखरी रहती है।
जो दूर है , उसकी आराध्ना असंभव सी जान पड़ती है किन्तु तप अर्थात कठिन परिश्रम से उस अप्राप्य को भी प्राप्य बनाया जा सकता है।

पुस्तकों से केवल जानकारी प्राप्त होती है। वास्तविक ज्ञान तो केवल गुरु सामीप्य से ही प्राप्त हो सकती है। पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त मनुष्य वैसे ही सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता जैसे व्यभिचार से गर्भ धारण करनेवाली स्त्री।



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