Hindi Hindustani
12th BIHAR

bihar board class 12 ,hindi book solution,prageet aur samaj,naamvar singh, प्रगीत और समाज,नामवर सिंह

September 24, 2022
Spread the love

bihar board class 12 ,hindi book solution,prageet aur samaj,naamvar singh,

\"\"

प्रगीत और समाज,नामवर सिंह

प्रगीत और समाज,नामवर सिंह

पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1.आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श प्रबंध काव्य  थे. प्रबंध  काव्य में एक कथा का सूत्र विभिन्न छंदों के माध्यम से जुड़ा होता है। प्रबन्ध काव्य में कोई कथा निबद्ध रहती है।प्रबंधकाव्य में मानव चरित्र का पूर्ण समावेश होता  है। प्रबंध काव्य  में घटनाओं की सम्बद्ध श्रृंखला और क्रम से व्यवस्थित होता है .जिसमे भावों का रसात्मक  अनुभव करानेवाले प्रसंग जुड़े होते हैं।

प्रबन्ध काव्य उद्देश्यात्मक  होता है।प्रबंधकाव्य की कथा प्राय: यथार्थ जीवन पर आधारित होती है इससे कल्पना के स्थान पर यथार्थ का स्वाभाविक चित्रण होता है। ‘सूरसागर’ के गीतिकाव्य होने के कारण शुक्लजी  को यह  परिसीमित लगा । आधुनिक कविता से उन्हें शिकायत थी कि ‘कला कला के लिए’ की पुकार के कारण यूरोप में प्रगीत मुक्तकों का ही चलन अधिक देखकर यहाँ भी उसी का जमाना यह बताकर कहा जाने लगा कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ जिनमें कुछ दतिवृत भी मिला रहता हो।प्रगीत मुक्तकों के  चलन से शुक्लजी  व्यथित हुए थे ,प्रबंध काव्य के लिए कहा जाने लगा था कि प्रबंध काव्य के आकार में बड़ा होने औए पाठक के पास समय कम होने के कारण प्रबंध काव्य भविष्य में अपनी महत्ता खो देंगे .किन्तु जैसे ही जय शंकर प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्र-समर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, प्रलय की छाया तथा कामायनी और निरालाजी कृत  राम की शक्तिपूजा तथा तुलसीदास के आख्यानक काव्य को स्वीकारोक्ति मिली  तो शुक्लजी संतोष हुआ ।शुक्ल जी का मानना था कि प्रबंध काव्य में सृजनकार को विस्तृत वर्णन करने की स्वतंत्रता मिलाती है .इसी  कारण  शुक्लजी  को काव्यों में प्रबंधकाव्य प्रिय लगता है।

प्रश्न 2.‘कला-कला के लिए’ सिद्धान्त क्या है?

कला-कला के लिए\’ सिद्धान्त का अर्थ है कि कला  का उद्देश्य पाठकों अथवा श्रोताओं में कलात्मकता का भाव उत्पन्न करना । कला से  रस एवं माधुर्य की अनुभूति होती है, इसी विशेषता के कारण  प्रगीत मुक्तकों की रचना के  प्रचलन को प्रोत्साहन मिला । प्रगीत समर्थक  तर्क देते  है कि  पाठकों के पास अब काव्य प्रबंध और काव्य खंड जैसी   लंबी रचनाएं पढ़ने का समय नहीं है  ।आज-कल पाठकों की रूचि में बदलाव देखा गया है .पाठक की  रूचि ऐसी रचनाओ को पढ़ने में बढ़ने लगी जिसमे निजी अनुभूतियों का प्रतिबिम्ब हो और उसका विशिष्ट व्यक्तित्व प्रकट होता हो . प्रगीत- पद्धति में स्वानुभूति की विवृति ही प्रमुख होती है। प्रगीत काव्य में कवि प्रबंध के अनेक व्यवधानों को न्यूनतम करके केवल अनुभूति के स्पर्श से रसाभिव्यक्ति की ओर प्रवृत्त होता है। प्रगीत काव्य आत्म-प्रधान रचना है जिसमें कवि की मनोभावना ही अभिव्यंजित होती है।

प्रश्न 3.प्रगीत को आप किस रूप परिभाषित करेंगे? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है?

उत्तर- प्रगीत काव्य में कवि प्रबंध के व्यवधानों को न्यूनतम करके केवल अनुभूति के स्पर्श से रसाभिव्यक्ति की ओर प्रवृत्त होता है। प्रगीत काव्य आत्म-प्रधान रचना है जिसमें कवि की मनोभावना ही अभिव्यंजित होती है। प्रगीत- पद्धति में स्वानुभूति की विवृति ही प्रमुख होती है।

प्रगीत के भी निश्चित तत्व  होते हैं, प्रगीत के छ: मुख्य तत्व निर्धारित किये हैं- संगीतात्मकता, आत्माभिव्यक्ति, रागात्मक अनुभूति का समत्व, जीवन के एक अंश का चित्रण, भावाभिव्यंजना, संक्षिप्तता।प्रगीत के तत्वों का सम्यक् निर्वाह प्रगीतकार की कसौटी है। ऐसा नहीं पर वह रचनाकार   प्रगीत की दृष्टि से सफल नहीं माना जा सकता।प्रगीत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति  हैं, इसके बारे में अब यह भी कहा जाने लगा है कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, इन्हें पढ़ने तथा सुनने की किसी को फुर्सत  नहीं है।

प्रश्न 4.वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अन्तर है?

उत्तर- वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताएँ प्राय: लम्बी होती हैं, उनमें जीवन की किसी समस्या अथवा घटना का विस्तृत चित्रण रहता है। यह वस्तुनिष्ठ होती है, समाज निरपेक्ष होती है। आत्मपरक प्रगीत व्यक्तिनिष्ट होते हैं। गजानन मानव मुक्तिबोध का काव्य मूलतः आत्मपरक है। उनकी रचना विन्यास से कहीं वह पूर्णतः नाट्यधर्मी है, कहीं नाटकीय एकालाप हैं, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत। यद्यपि आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश्य ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं किन्तु  नाट्यधर्मी एवं आत्मपरक प्रगीत एकरूप न होकर भिन्न हैं।

प्रश्न 5.हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है सोदाहरण स्पष्ट करें।

उत्तर-प्रगीत कविताएँ सीधे-सीधे सामाजिक न होकर अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण   प्रगीत श्रेणी में रखी जाती हैं। गीतिकाव्य गीतशैली का नव रूप  है। प्रगीत सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं समझी जाती हैं क्योंकि प्रगीत  नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं।परन्तु प्रसाद की शेरसिंह का शस्त्रसमर्पण, पेथोला की प्रतिध्वनि, ‘प्रलय की छाया’ तथा ‘कामायनी’ और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ तुलसीदास जैसे आख्यानक काव्य इस मिथक को तोड़ते हुए प्रगीतों की अलग कोटि विकसित करते हैं। आगे मुक्तिबोध, नागार्जुन, समशेर बहादुर सिंह के प्रगीत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। नई कविता समाज निरपेक्ष थी किन्तु इसकी  सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। नई कविता में जीवन यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता है। प्रगीतों में मिथकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है।  प्रगीत के  इतिहास को समकालीन कवियों का इतिहास कहा जा सकता  हैं।

प्रश्न 6.आधुनिक प्रगीत-काव्य किन अर्थों में भक्ति काव्य से भिन्न एवं गुप्तजी के आदि के प्रबंध काव्य से विशिष्ट है? क्या आप आलोचक से सहमत हैं? उत्तर-आधुनिक प्रगीत काव्य में भी प्रबंध काव्य की भाँति जीवन के सारे चित्र खींचे जाते हैं। मुक्तिबोध, प्रसाद, निराला, नागार्जुन शमशेर की लम्बी कविताएँ क्रमशः ब्रह्मराक्षस, पेथोला की प्रतिध्वनि, शेर सिंह का आत्मसमर्पण, तुलसीदास, राम की शक्तिपूजा, अकाल और उसके बाद इत्यादि की कविताएँ उदाहरण हैं। इन कविताओं की खास बात यह है कि मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है और यही बात इनमें कही गयी है। प्रबंधकाव्य की तरह इनमें भी नाटकीयता का समावेश है। साथ ही सामाजिक संघर्ष के बदले आत्मसंघर्ष मुखरित है। परन्तु निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’, तुलसीदास में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष का मिश्रित रूप है।आधुनिक युग के प्रगीत काव्यों की मुख्य भाव-भूमि राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष है जो गुप्त के काव्यों में दिखलाई पड़ती है। इनमें भक्तिकाव्य से भिन्न इस रोमांटिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिवाद है, जहाँ ‘समाज’ के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमांटिक गीतों में भक्तिकाव्य जैसी तन्मयता नहीं है किन्तु आत्मयता और ऐन्द्रियता कहीं अधिक है। गुप्त का प्रबन्ध काव्य सीधे-सीधे राष्ट्रीय विचारों को रखता है और रोमांटिक प्रगीत उस युग की चेतना को अपनी असामाजिकता में ही अधिक गहराई से वाणी दे रहे थे। इसलिए विशिष्ट है। आलोचक ने जो उदाहरण निराला आदि कवियों की कविताओं को प्रगीत के जो रूप में दिये हैं उदाहरण इनमें सच्चे अर्थों में सामाजिकता छिपी है। अतः लेखक के विचार में सामाजिक संघर्ष के साथ आत्मसंघर्ष भी मायने रखता है। अतः प्रगीत काव्य भक्ति काव्य से अधिक सूक्ष्म रूप में वाणी देता है।।

प्रश्न 7.“कविता जो कुछ कह रही है उसे सिर्फ वही समझ सकता है जो इसके एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन सकता है।” इस कथन का आशय स्पष्ट करें। साथ ही किसी उपयुक्त उदाहरण से अपने उत्तर की पुष्टि करें।

उत्तर-आलोचक की दृष्टि में प्रगीत वैसा काव्य है जिसमें व्यक्ति का एकाकीपन झलके अथवा समाज के विरुद्ध व्यक्ति या समाज से कटा हुआ हो। प्रगीतात्मकता का अर्थ है एकांत संगीत अथवा अकेले कंठ की पुकार। प्रगीत की यह धारणा इतनी बद्धमूल हो गयी है कि आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक है।परन्तु थियोडोर एडोनों ने कहा है कि व्यक्ति अकेला है यह ठीक है परन्तु उसका आत्मसंघर्ष अकेला नहीं है। उसका आत्मसंघर्ष समाज में प्रतिफलित होता है। यही कारण है कि बच्चन जैसे कवि सरल सपाट निराशा से अलग करते हुए एक गहरी सामाजिक सच्चाई को “जक संघर्ष के सारण इनमें सच्चे अरण निराला आदि व्यक्त करता है। कवि अपने अकेलेपन में समाज के बारे में सोचता है। नई प्रक्रिया द्वारा उसका निर्माण करना चाहता है। यहाँ व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है।

व्यक्तिवाद उतना आश्वस्त नहीं रहा बल्कि स्वयं व्यक्ति के अन्दर भी अंतरूसंघर्ष पैदा हुआ। विद्रोह का स्थान आत्मविडंबना ने ले लिया। यहाँ समाज के उस दबाव को महसूस किया जा सकता है जिसमें अकेले होने की विडंबना के साथ उसका अन्तर्द्वन्द्व उसे सामाजिकता की प्रेरणा देता है और कवि प्रगतिवादी हो जाता है। परिणाम अन्दर से निकलकर बाहर जनता के पास जाना।।

प्रश्न 8.मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता क्यों है? आलोचक के इस विषय में क्या निष्कर्ष है?

उत्तर-मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता इसलिए है कि उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता की संभावनाओं का पूरा-पूरा एहसास किसी को न था। नई कविता के अन्दर आत्मपरक कविताओं की एक ऐसी प्रबल प्रवृत्ति थी जो या तो समाज निरपेक्ष थी या फिर जिनकी सामाजिक अर्थवत्ता सीमित थी। इसलिए इन सीमित अर्थभूमिवाली कविताओं के आधार पर निर्मित एकांगी एवं अपर्याप्त काव्य सिद्धान्त के दायरे को तोड़कर एक व्यापक काव्य-सिद्धान्त की स्थापना के लिए मुक्तिबोध की कविताओं का समावेश ऐतिहासिक आवश्यकता थी किन्तु इनके बाद भी ऐसी अनेक आत्मपरक प्रगीतधर्मी छोटी कविताएँ बची रहती हैं जो अपनी सामाजिक अर्थवत्ता के कारण उस काव्य सिद्धान्त को व्यापक बनाने में समर्थ हैं। मुक्तिबोध की कविता रचना विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। नाटकीय रूप के बावजूद काव्यभूमि मुख्यतः प्रगीतधर्मी है। इसमें कोई शक नहीं कि उनका समूचा काव्य मूलतरू आत्मपरक है। रचना-विन्यास में कहीं पूर्णतः नाट्यधर्मिता है, कहीं नाटकीय एकालाप है, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत भी है। कवि स्वयं उसके बारे में लिखते हैं कि इसमें कथा केवल आभास है, नाटकीयता केवल मरीचिका है, वह विशुद्ध आत्मगत काव्य है। जहाँ नाटकीयता है वहाँ जीवन-यथार्थ भाव बनकर प्रस्तुत होता या बिंब या विचार बनकर।कहने की आवश्यकता नहीं कि ये आत्मपरक प्रगीत भी नाट्यधर्मी लम्बी कविताओं के सदृश ही यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। इस प्रकार उनकी कविताओं में निहित सामाजिक सार्थकता का बोध स्वभावतः संभावनाओं की तलाश करता है जिसके लिए मुक्तिबोध की कविताओं पर पुनर्विचार आवश्यक है।

प्रश्न 9. त्रिलोचन और नागार्जुन के प्रगीतों की विशेषताएँ क्या हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर-त्रिलोचन की कविताएँ कहने के लिए प्रगीत हैं लेकिन जीव-जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य संसार में मिलते हैं वे अन्यत्र दुर्लभ है। किन्तु इन भास्वर चित्रों को अंततः जीवंत बनानेवाला प्रगीत नायक का एक अनूठा व्यक्तित्व है जिसका स्पष्ट चित्र ‘उस जनपद का कवि हूँ। संग्रह के उन आत्मपरक सॉनेटों में मिलता है। इनमें आत्मचित्र वस्तुतः एक प्रगीत-नायक की निर्वैयक्तिक कल्प-सृष्टि है जिनसे नितांत वैयक्तिकता के बीच भी एक प्रतिनिधि चरित्र से परिचय की अनुभूति होती है।वहीं नागार्जुन की बहिर्मुखी आक्रामक काव्य-प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण भी आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार का एक झटके से छिन्न-भिन्न कर देती है फिर चाहे ‘वह तन गई रीढ़’ जैसे प्रेम और ममता की नितांत निजी अनुभूति हो, चाहे जेल के सीखंचों से सिर टिकाए चलने वाला अनुचिंतन और अनुताप नागार्जुन के काव्य-संसार के प्रगीत-नायक का निष्कवच फक्कड़ व्यक्तित्व उनके प्रगीतों को विशिष्ट रंग तो देता ही है, सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है।

कवि त्रिलोचन ‘वही त्रिलोचन है वह’ और नागार्जुन की ‘तन गई रीढ़’ कविता में अपनी वैयक्तिकता में विशिष्ट और सामाजिकता में सामान्य है। यहाँ कवि व्यक्तिवादी न होते हुए भी व्यक्ति-विशिष्ट के प्रति झुका हुआ है। अपने समाज से लड़ते हुए सामाजिक है। दुनियादारी न होते हुए भी इसी दुनिया का है। यह नया प्रगीत उनके नये व्यक्तित्व से ही संभव हो सका है। उनके व्यक्तित्व के साथ निश्चित सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है। इन कविताओं में कवि समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है और व्यक्तिवाद को जन्म देनेवाली औद्योगिक पूँजीवादी समाजव्यवस्था का पुरजोर विरोध करते हैं। कवि की मानसिक स्थिति बदल जाती है। व्यक्ति बनाम समाज जैसे सरल द्वन्द्व का स्थान समाज के अपने अंतर्विरोधों ने ले लिया है। स्वयं व्यक्ति के अंदर के अंतरूसंघर्ष को दिखलाते हैं।

प्रश्न 10.मितकथन में अतिकथन से अधिक शक्ति होती है। केदारनाथ सिंह की उद्धृत कविता से इस कथन की पुष्टि करें। दिगंत (भाग-1) में प्रस्तुत ‘हिमालय’ कविता के प्रसंग में भी इस कथन पर विचार करें।

उत्तर-हिन्दी के साहित्य के दौर में कविता में एक नया उभार पैदा होता है जिसमें कवि का अपना आत्मसंघर्ष तो है ही वह सामाजिक संभावनाओं की तलाश भी उसमें करता है। आज का कवि न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच करता है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अन्दर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर व्यवस्था को एक विराट पहाड़ बनाकर आँकने की हवस। वह बाहर से छोटी-से-छोटी, वस्तु घटना आदि पर नजर रखता है और कोशिश करता है कि उसे मुकम्मल अर्थ दिया जाए, छोटी-सी बात को बात में ही बहुत कुछ कह दिया जाय। वह अपने आत्मसंघर्ष की सामाजिक संघर्ष बनाने की चाहत है।इसका उदाहरण मुक्तिबोध की कविताएँ हैं। नई कविता का आत्मसंघर्ष उनके कवियों का आत्मसंघर्ष है जो बहिसंघर्ष का रूप ले लेता है। एक में प्रगीतात्मकता सीमित हुई नजर आती है तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित होते हैं। कवि कम ही शब्दों में बहुत कुछ कहता है, जो बात कम शब्द में कही जाती है वह गहरे अर्थ रखती है। कविता का अर्थ करने पर उसके कई स्तर धीरे-धीरे खुलते जाते हैं। केदारनाथ सिंह यहाँ कहना चाहते हैं कि सम्बन्धों में कभी खटास नहीं आनी चाहिए। उसमें हमेशा गर्माहट और उसकी सुन्दरता बनी रहनी चाहिए। ‘हाथ की तरह गर्म और सुन्दर में’ कवि बहुत सारे सपने संजोये हुए हैं और भविष्य की आकांक्षा को मजबूती बनाये रखना चाहता है।।इन थोड़े से शब्दों में कवि अधिक गहरी चोट करता है। अतः अधिक बोलने से अच्छा कम बोलना है क्योंकि वह ज्यादा प्रभावी होता है।

प्रश्न 11.हिन्दी की आधुनिक कविता की क्या विशेषताएँ आलोचक ने बताई हैं?

उत्तर-हिन्दी की आधुनिक कविता में नई प्रगीतात्मकता का उभार देखता है। वह देखता है आज के कवि को न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच है न बाहर के यथार्थ का सामना करने में हिचक। अंदर न तो किसी असंदिग्ध विश्वदृष्टि का मजबूत खूटा गाड़ने की जिद है और न बाहर की व्यवस्था को एक विराट पहाड़ के रूप में आँकने की हवस। बाहर छोटी-से-छोटी घटना स्थिति वस्तु आदि पर नजर है और कोशिश है उसे अर्थ देने की। इसी प्रकार बाहर की प्रतिक्रियास्वरूप अंदर उठनेवाली छोटी-से-छोटी लहर को भी पकड़कर उसे शब्दों में बांध लेने का उत्साह है। एक नए स्तर पर कवि व्यक्तित्व अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधने की कोशिश कर रहा है और इस प्रक्रिया में जो व्यक्तित्व बनता दिखाई दे रहा। है वह निश्चय ही नए ढंग की प्रगीतात्मकता के उभार का संकेत है।

No Comments

    Leave a Reply

    error: Content is protected !!
    error: Alert: Content is protected !!