bihar board class 12 ,hindi book solution,mera hansate hue mera akelapan bachapan,

हँसते हुए मेरा अकेलापन,मलयज
11।हँसते हुए मेरा अकेलापन । मलयज
प्रश्न 1।डायरी क्या है?
उत्तर- डायरी गद्य साहित्य की विधाओं में से एक है ,इसमें लेखक का आत्म साक्षात्कार अभिव्यक्त होता है। जिसमे लेखक अपने आपसे सम्प्रेषण की स्थिति में होता है। डायरी लेखन लेखक के द्वारा लिखा गया व्यक्तिगत अभुभवों, सोच और भावनाओं को लेखित रूप में अंकित करके बनाया गया एक संग्रह है। । डायरी भावों मानसिक उद्वेगों,अनुभूति विचारों को अभिव्यक्त करने के साथ –साथ लेखक के व्यक्तित्व को भी उदघाटित करती है।
प्रश्न 2। डायरी का लिखा जाना क्यों मुश्किल है?
उत्तर- डायरी लिखने में अपने भाव के अनुसार शब्द नहीं मिल पाते हैं। यदि शब्दों का भंडार है भी तो उन शब्दों के लायक के भाव ही न होते हैं। डायरी में मुक्ताकाश भी होता है, तो सूक्ष्मता भी। शब्दार्थ और भावार्थ के आंशिक मेल के कारण डायरी का लिखा जाना मुश्किल है। डायरी में शब्दों और अर्थों के बीच तटस्थता कम रहती है।वैसे भी मानव स्वभाव है कि स्वयं की अच्छाई को तो मनुष्य बढ़-चढ़कर प्रस्तुत कर सकता है किन्तु स्वयं की बुराइयों को सार्वजनिक रूप से स्वीकारना साहसिक कार्य होता है ।
प्रश्न 3।किस तारीख की डायरी आपको सबसे प्रभावी लगी और क्यों?
उत्तर-10 मई ,1978 को लेखक ने जिस यथार्थ को अनुभव किया और उस अनुभव की जो शब्दाभिव्यक्ति है जिसमे लेखक ने इस जीवन सत्य से साक्षात्कार करवाया है कि मनुष्य यथार्थ को जीता भी है, और इसका रचयिता भी वह स्वयं ही है ,सर्वाधिक प्रभावित करता है ।लेखक यह भी बतलाते है कि रचा हुआ यथार्थ भोगे हुए यथार्थ से बिल्कुल भिन्न है। हालांकि दोनों में एक तारतम्य भी है। संसार से जुड़ाव के बिना मानवीयता ही अपूर्ण है,लेखक ने संसार से जुड़ाव को रचनात्मक कर्म भी कहा हैं, रचे हुए यथार्थों का स्वतंत्र हो जानेवाली बात ह्रदय को प्रभावित कराती है ।
प्रश्न 4।डायरी के इन अंशों में मलयज की गहरी संवेदना घुली हुई है। इसे प्रमाणित करें।
उत्तर-मलयज जी एक संवेदनशील लेखक है ,उनकी संवेदना भावो,विचारों में ही ही नहीं बल्कि शब्दों में भी अनुभव की जा सकती है ।मलयज जी की डायरी पढ़ते हुए खेत की मेड़ पर बैठी कौवों की कतार को देखना हो या फिर अकेलापन। नेगी परिवार की मेहमानबाजी की बात हो या फिर स्कूल के दो अध्यापकों से परिचय सब कुछ आसपास घटित होता हुआ सा जान पड़ता है । अपने द्वारा रचे गए यथार्थ की बात हो या फिर भोगे गए दिन की बात कहना ,मलयज जी अपनी छवि अंकित कर देते है । डायरी लेखन में प्रयुक्त चयनित शब्द हों या फिर सुरक्षा की भावना को प्रकट करना उनकी संवेदनशीलता का परिचय देती है।सेब बेचनेवाली लड़की की आतुरता को मलयज जी आँखें ही पढ़ पाती है । आम आदमी के मन में डर और जिजीविषा की भावनात्मक शाब्दिक अभिव्यक्ति मलयजजी की पहचान का स्मरण करा देती है ।
प्रश्न 5।व्याख्या करें
(क) व्यक्ति यथार्थ को जीता ही नहीं, यथार्थ को रचता भी है।
(ख) इस संसार से संपृक्ति एक रचनात्मक कर्म है इस कर्म के बिना मानवीयता अधूरी है।
उत्तर-
(क) प्रस्तुत पंक्ति मलयज लिखित ‘हँसते हुए मेरा अकेलापन’ शीर्षक डायरी से ली गई है। प्रस्तत पंक्तियों में समर्थ लेखक मलयज के 10 मई 1978 की डायरी की है।
जीवमात्र को जीने के लिए हमेशा संघर्ष करना पड़ता है। वह इन संघर्षों को जीता है। यदि संघर्ष ना रहे तो जीवन का कोई मोल ही न हो। मनुष्य इन यथार्थों के सहारे जीवन जीता है। वह इन यथार्थ का भोग भी करता है और भोग करने के दौरान इनकी सर्जना भी कर देता है। संघर्ष संघर्ष को जन्म देती है। कहा गया है गति ही जीवन है और जड़ता मृत्यु। इस प्रकार व्यक्ति यथार्थ को जीता है।
भोगा हुआ यथार्थ दिया हुआ यथार्थ है। हर एक अपने यथार्थ की सर्जना करता है और उसका एक हिस्सा दूसरे को दे देता है। इस तरह यह क्रम चलता रहता है। इसलिए यथार्थ की रचना सामाजिक सत्य की सृष्टि के लिए एक नैतिक कर्म है।।
(ख) प्रस्तुत पंक्ति मलयज लिखित ‘हँसते हुए मेरा अकेलापन’ शीर्षक डायरी से ली गई है। प्रस्तुत पंक्ति के समर्थ लेखक मलयज के अनुसार मानव का संसार से जुड़ा होना निहायत जरूरी है।
मानव संसार के अमानों का उपभोग करता है और उसकी सर्जना भी करता है। मानव अपने संसार का निर्माता स्वयं है। वह ही अपने संसार को जीता है और भोगता है। संसार में संक्ति ना होने पर कोई कर्म ही ना करे। कर्म करना जीवमात्र के अस्तित्व के लिए बहुत ही आवश्यक है। उसके होने की शर्त संसार को भोगने की प्रवृति ही है। भोगने की इच्छा कर्म का प्रधान कारक है। इस तरह संसार से संपृक्ति होने पर जीवमात्र रचनातमक कर्म की ओर उत्सुक होता है। इस कर्म के बिना मानवीयता अधूरी है क्योंकि इसके बिना उसका अस्तित्व ही संशयपूर्ण है।
प्रश्न 6।‘धरती का क्षण’ से क्या आशय है?
उत्तर- धरती का क्षण’ से आशय है –रचना का जड़ हो जाना ।रचनाकार जब कुछ लिखने बैठता है तब भावों और विचारों का आवेग उमड़ने लगता है ,भाव अथवा विचार को मूर्त रूप देने के लिए शब्दों की आवश्यकता पड़ती है ,तब शब्द और अर्थ के बीच का अनुपात असंतुलित हो जाता है । शब्द अर्थ में और अर्थ शब्द में परिवर्तित होने लगते है , एक को पकड़ने में दूसरा छोतंर लगता हैं । शब्द और अर्थ जब साथ नहीं होते तो वह आकाश होता है जिसमें रचनाएँ अलग-अलग फूल की तरह खिली हुई नज़र आती है ,किन्तु जब शब्द और अर्थ साथ होते है तो वह धरती का क्षण होता है और उसमें रचनाएँ जड़ पा लेती हैं । सच तो यह है कि काव्य में शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरे के पूरक-अनुपूरक होते हैं।
प्रश्न 7।रचे हुए यथार्थ और भोगे हुए यथार्थ में क्या संबंध है?
‘उत्तर-अपने अनुभव या अनुभूति को दूसरे के साथ बांटना भोगा हुआ यथार्थ है । प्रत्येक मनुष्य अपना यथार्थ रचता है और उस रचे हुए यथार्थ को दूसरों को देता है। यह रचा हुआ संसार वही होता है जिसे उसने जिया और भोग है । रचने और भोगने में एक द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध है। रचना और भोगना एक दूसरे के पूरक –अनुपूरक है ।एक दूसरे से पोषित होते है ।दोनों के मध्य बनाने –मिटने का क्रम चलता रहता है ।
प्रश्न 8।लेखक के अनुसार सुरक्षा कहाँ है? वह डायरी को किस रूप में देखना चाहता है?
उत्तर-पाठ के सन्दर्भ में सुरक्षा का अर्थ भौतिक रूप से किसी खतरे से बचने से नहीं है ,बल्कि साहित्यकार का अपने दायित्व से बचने अर्थ के सम्बन्ध में है डायरी लेखन के माध्यम से यदि कोई रचनाकार यह समझ ले कि यथार्थ को प्रकट कर वह अपने दायित्व से मुक्त हो गया है ,अब वह सुरक्षित है ।यदि कोई साहित्यकार ऐसा मनाता है तो उसका ऐसा मानना गलत है ।ऐसा करना एक प्रकार का पलायन है, कायरता है , वास्तविकता से मुँह मोड़ना है ।डायरी लिखकर अप्रिय बात को छुपाना एक छद्म आवरण है ,जिसे सत्य का प्रकाश का कभी अनावृत कर सकता है ।सुरक्षा पलायन करने में नहीं बल्कि चुनौतियों का सामना करने में है ।जीभ काटकर खट्टे स्वादों से बचने को समझदारी नहीं कहा जा सकता ।
प्रश्न 9।डायरी के इन अंशों से लेखक के जिस ‘मूड’ का अनुभव आपको होता है, उसका परिचय अपने शब्दों में दीजिए।
उत्तर- हँसते हुए मेरा अकेलापन इस डायरी में लेखक की कई अलग-अलग छवियाँ और रंग प्रतिबिंबित हुए है ।मलयज जी द्वारा यह कहना कि पेड़ों की हरियाली के बीच अधसुखे पेड़ों का कटना बाहर निकलने पर सफेद रंग के कुहासे का सामना करना, ये सारी बातें स्पष्ट करती हैं कि एक कलाकार के लिये यह निहायत जरूरी है कि उसमें आग हो ‘और खुद ठंढा’ हो ,प्रकृति के प्रति उनके आत्मिक जुडाव का संकेत देता है ।
फसल उगते – बढ़ते , फलते – पकते तथा बाद में फसल की कटाई की चर्चा करते हुए मलयज जी बचपन, युवावस्था, बुढ़ापा के अकेलेपन को जोड़कर कुछ देर के लिए चित्रकार बन जाते है । मलयज जी जीवन की यथार्थ अनुभूति का अनुभव करने का कोई अवसर नहीं चूकना चाहते ।उनका मानना है कि रचा हुआ यथार्थ, भोगे हुए यथार्थ से अलग है ।कहीं- कहीं पर मलयज जी दार्शनिक भावों की अभिव्यंजना करते हुए पथ प्रदर्शक बन जाते है । मलयज जी कहते हैं कि संसार में जुड़ाव एक रचनात्मक कर्म है। रचना और भोग एक-दूसरे के पूरक हैं। उनके अनुसार मन का भय ही भयानक होता है। भयभीत मनुष्य अपने कर्तव्य पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। निर्भय होना ही मनुष्य की प्रगति है। डायरी लेखन के सम्बन्ध में विचार व्यक्त करते हुए मलयज जी कहते है कि डायरी लेखन मेरे लिये एक दहकता हुआ जंगल है, एक तटस्थ घोंसला नहीं। डायरी मेरे कर्म की साक्षी हो, मेरे संघर्ष की प्रवक्ता हो यही मेरी सुरक्षा है।अपनी विचाराभिव्यक्ति द्वारा मलयज जी ने अपने व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों को प्रकट किया है ।
प्रश्न 10।अर्थ स्पष्ट करें-एक कलाकार के लिये निहायत जरूरी है कि उसमें ‘आग’ हो-और खुद ठंढा हो।
उत्तर- उक्त कथन के माध्यम से मलयज जी एक रचनाकार की विशेषता को रेखांकित करते है और बतलाते है कि एक रचनाकार में ‘आग’ हो किन्तु खुद ठंढा होना चाहिए ।अर्थात विसंगति और विषमताओं के प्रति रचनाकार में आक्रोश हो ,विद्रोह हो लेकिन शांत भाव से विचार या चिंतन कर यह भी बताये कि उसका निस्तारण कैसे किया ।
प्रश्न 11।चित्रकारी की किताब में लेखक ने कौन सा रंग सिद्धान्त पढ़ा था?
उत्तर-चित्रकारी की किताब में लेखक ने यह रंग सिद्धांत पढ़ा था कि शोख और भड़कीले रंग संवेदनाओं को बड़ी तेजी से उभारते हैं, उन्हें बड़ी तेजी से चरम बिन्दु की ओर ले जाते हैं और उतनी ही तेजी से उन्हें ढाल की ओर खींचते हैं।
प्रश्न 12। 11जून 78 की डायरी से शब्द और अर्थ के संबंध पर क्या प्रकाश पड़ता है? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर-शब्द और अर्थ रचना के आधार हैं। यदि शब्द-अलग हों उनके भाव कुछ और तो यह चमत्कार रचनाकार की विद्वता और पांडित्य को तो प्रदर्शित केर देगा किन्तु जन- सामान्य रचना के मर्म का भाव बोध नहीं कर पायेगा । डायरी लेखक अपना यथार्थ प्रकट करता है, इसलिए शब्दों और अर्थों में तटस्थता कम रहती है, यही कारण है कि डायरी लेखन को कठिन विधा माना जाता है। यदि अर्थ शब्द के साथ चलते हैं ,तो रचना जन सामान्य की बन जाती है । यदि अर्थ और शब्द साथ-साथ नहीं चलते हैं तो रचना एक उन्मुक्त आकाश की भाँति हो जाती हैं, जिसमें पाठक उसे अपनी परिकल्पनाओं के अनुसार अर्थ ग्रहण करता और समझता है।
प्रश्न 13।रचना और दस्तावेज में क्या फर्क है? लेखक दस्तावेज को रचना के लिए कैसे जरूरी बताता है?
उत्तर- दस्तावेज किसी भी रचना का कच्चा माल है। दस्तावेज के आधार पर रचना का जन्म होता है। घटनाएँ, स्थितियां-परिस्थितियां, जीवनानुभव दस्तावेज के घटक भी हैं और रचना के कारकभी । बिना दस्तावेज के रचना का कोई सरोकार नहीं, कोई मोल नहीं । रचना के लिए दस्तावेज निहायत जरूरी है।
रचना सोच को एक क्षितिज प्रदान करती हैं। रचना एक माध्यम हैं, परिस्थितियों से जूझने का। परिस्थितियों, घटनाएँ या अनुभव दस्तावेज होती हैं, परिष्कृत मस्तिष्क ही इसे पाता है लेकिन जब यहीरचनाकार की कलम से रचना का रूप ले लेता है, तब यह जन के लिए हो जाता है।
प्रश्न 14।लेखक अपने किस डर की बात करता है? इस डर की खासियत क्या है? अपने शब्दों में लायरी में दो तरह के डर का प्रयजनों को खोने का
उत्तर- लेखक ने डायरी में दो तरह के डर की बात कही है-पहला डर है आर्थिक और दूसरा डर है सामाजिक प्रतिष्ठा का ।
मलयज जी कहा है कि मेरा मन अपने प्रियजनों के बीमार हो जाने की बात सोचकर भय से काँप उठता है। इलाज की व्यवस्था का डर उसे भयानक तनाव में ला देता है। दूसरे डर में लेखक ने समाज में बढ़ते अपराधों का जिक्र किया है। मलयज जी कहते है कि यदि कोई प्रियजन संभावित घड़ी तक नहीं हैं, तो मन अनजानी, अप्रिय आशंकाओं से घिर उठता है। इस डर की खासियत यह है कि मन की कमजोरी इस डर का कारक है। मन की कमजोरी ही सामाजिक और आर्थिक अपराधों की जड़ है।







No Comments