अभिनव मनुष्य
अभिनव मनुष्य
1
है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार,
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार।
भोग-लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम,
बह रही असहाय नर की भावना निष्काम
भीष्म हों अथवा युधिष्ठिर, या कि हों भगवान,
बुद्ध हों कि अशोक, गाँधी हों कि ईस महान
भावार्थ- कवि कहते हैं कि संसार में हर युग में अनेक महात्माओं ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने अमृतरूपी उपदेशों से दुनिया को शान्ति का पाठ पढ़ाने प्रयास किया , लेकिन आज तक विश्व में शान्ति स्थापित नहीं हुई । आज भी कुप्रवृत्तियां हर व्यक्ति में हैं। मनुष्य ईर्ष्या, द्वेष, कपट, छल और घृणा की आग में हर समय जलता रहता है। महान आत्माओं के वचन भी मनुष्य के हृदय में राग-द्वेष और भोग-लिप्सा की भड़कती आग को शांत नहीं कर सकें ।समय-समय पर अहिंसा का मार्ग प्रशस्त करने वाले गौतम बुद्ध, सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर, दृढ़ निश्चयी भीष्म, अशोक, महात्मा गाँधी और प्रभु ईसा मसीह जैसे महापुरुषों ने जन्म लेकर संसार को सुपथ की ओर ले जाना चाहते थे ।
2
सिर झुका सबको, सभी को श्रेष्ठ निज से मान,
मात्र वाचिक ही उन्हें देता हुआ सम्मान,
दग्ध कर पर को, स्वयं भी भोगता दुख-दाह,
जा रहा मानव चला अब भी पुरानी राह।
भावार्थ- यद्यपि मनुष्य ने इनके उपदेशों को श्रद्धा से स्वीकार किया और उनकी श्रेष्ठता को भी माना; उन्होंने वाचनिक प्रदर्शन किया, लेकिन व्याव्यवहारिक जीवन व्यवहार में नहीं अपनाया । यही कारण है कि आजभी वह अपने सुख केलिए दूसरों का शोषण करके दूसरों को दुःख दे रहा है। लोग दूसरों को दुःख में डालकर खुद भी दुःख की आग में जल रहे हैं। वह आज भी सिर्फ बातों में ही नवीन मनुष्य है, लेकिन उसकी क्रियाएँ आदि युगीन मानव की तरह हैं।
3
आज की दुनिया विचित्र, नवीन;
प्रकृति पर सर्वत्र है विजयी पुरुष आसीन।
हैं बँधे नर के करों में वारि, विद्युत, भाप,
हुक्म पर चढ़ता-उतरता है पवन का ताप।
हैं नहीं बाकी कहीं व्यवधान,
लाँघ सकता नर सरित, गिरि, सिन्धु एक समान।
भावार्थ- कवि दिनकर ने कहा कि आज की दुनिया नवीन है, लेकिन बहुत अजीब है। वैज्ञानिक खोजों से आज मनुष्य ने प्रकृति को हराया है। आज मनुष्य ने जल, बिजली, दूरी, वातावरण का ताप और बहुत कुछ पर अपना नियंत्रण जमा लिया है।मानव ने प्रकृति पर पूरी तरह से नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, इसलिए हवा में मौजद ताप भी उसकी अनमति से ही बदलता है। अब उसके सामने कोई ऐसी चुनौती या क्षेत्र नहीं है।आज मनुष्य हर क्षेत्र में इतना अधिक विकसित और सक्षम हो गया है कि वह समान रूप से नदी, पर्वत, सागर पार कर सकता है। उसके लिए कोई भी काम अब मुश्किल नहीं है। हाल ही में मनुष्य भौतिक रूप से बहुत प्रगति कर चुका है और प्रकृति पर पूरी तरह नियंत्रण कर चुका है, लेकिन दुर्भाग्य से उसके पास विवेक नहीं है।
4
शीश पर आदेश कर अवधार्य,
प्रकृति के बस तत्त्व करते हैं मनुज के कार्य।
मानते हैं हुक्म मानव का महा वरुणेश,
और करता शब्दगुण अम्बर वहन सन्देश।
भावार्थ- कवि दिनकर कहते है कि आज का आदमी उतनी ही शक्तिशाली हो गया है कि प्रकृति के सभी तत्त्व भयभीत होकर उसके निर्देशों का पालन करते हैं। मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार सब कुछ संचालित कर रहा है । कभी जल देवता लोगों की जल की आवश्यकताओं को पूरा करते थे किन्तु आज मनुष्य स्वयं जल देवता बनकर जहां जल की जरूरत है, वहाँ जल उपलब्ध करा देता है; जहाँ जल का अत्यधिक भंडार है, वहाँ नदियों पर बाँध बनाकर जल शक्ति को अपने नियंत्रण में कर लिया है हैं। यहाँ तक कि उसने स्वेच्छा से जल बरसाना भी सीख लिया है। सन्देशों को रेडियो यंत्रों द्वारा निर्धारित स्थानों पर भेजने की कला भी अभिनव मनुष्य ने सीख ली है।
5
नव्य नर की मुष्टि में विकराल,
हैं सिमटते जा रहे प्रत्येक क्षण दिक्काल
यह मनुज, जिसका गगन में जा रहा है यान,
काँपते जिसके करों को देखकर परमाणु।
भावार्थ- आज के अभिनव मनुष्य में की मुट्ठी में दासों दिशाएँ समाती जा रही हैं। आज का अभिनव मनुष्य पक्षी की तरह आकाश में स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहा है, वहीँ वह इस विशाल समुद्र लांघ रहा है। कल्पनाशील मनुष्य की शक्ति इतनी बड़ी है कि परम शक्तिशाली परमाणु भी अभिनव मनुष्य से भयभीत होकर थर-थर काँपने लगता है।
6
खोलकर खुल अपना हृदयगिरि, सिन्धु, भू, आकाश,
हैं सुना जिसको चुके निज गुह्यतम इतिहास।
खुल गए परदे, रहा अब क्या यहाँ अज्ञेय?
किन्तु नर को चाहिए नित विघ्न कुछ दुर्जेय;
सोचने को और करने को नया संघर्ष;
नव्य जय का क्षेत्र, पाने को नया उत्कर्ष।
भावार्थ: कवि दिनकर कहते है कि वर्तमान युग के अभिनव मनुष्य ने अपने ज्ञान, शोधशीलता और साहसिक कार्यों से पर्वतों, सागरों, पृथ्वी और आकाश का गुप्त रहस्य जानकर उसका इतिहास भी बता दिया है । आज प्रकृति के सभी रहस्यों से पर्दा हट चुका है । इसके बाद भी अभिनव मनुष्य ऐसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उत्सुक हो रहा है जो असंभव से जान पड़ते है । वह अपने लिए ऐसे कठिन और कठिन रास्ते तथा बाधाओं को प्रस्तुत करता रहता है, जिन पर कठिनाई से ही सफलता मिल सकती है। वह विचार और व्यवहार की दृष्टि से बार-बार नए तरीकों से संघर्ष करने के लिए तत्पर रहता है और लगातार नवीन जीत हासिल करने के लिए निरंतर निरंतर आगे बढ़ रहा है।
7
पर, धरा सुपरीक्षिता, विश्लिष्ट स्वादविहीन,
यह पढ़ी पोथी न दे सकती प्रवेग नवीन।
एक लघु हस्तामलक यह भूमि-मण्डल गोल,
मानवों ने पढ़ लिए सब पृष्ठ जिसके खोल।
भावार्थ- कवि दिनकर कहते हैं कि मनुष्य की प्रवृत्ति प्रारंभ से ही कुछ नया खोजने की रही है। इसके लिए अभिनव मनुष्य ने पूरी धरती का निरीक्षण और अध्ययन किया । अब पृथ्वी पर ऐसा कोई स्थान नहीं है जिसे मनुष्य नहीं जानता । वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो आज दुनिया में कोई भी वस्तु या पदार्थ नवीन मनुष्यों को आकर्षित नहीं करता है। उसने पृथ्वी के सभी रहस्यों का पता लगा लिया है। अब अभिनव मनुष्य के लिए पृथ्वी को समझना बहुत आसान हो गया है, जैसे एक छोटा सा गोल आँवला हथेली पर रखना। मानव ने पृथ्वी की पुस्तक के एक एक पृष्ठ को कंठस्थ लिया है।
8
किन्तु, नर-प्रज्ञा सदा गतिशालिनी, उद्दाम,
ले नहीं सकती कहीं रुक एक पल विश्राम।
यह परीक्षित भूमि, यह पोथी पठित, प्राचीन,
सोचने को दे उसे अब बात कौन नवीन?
यह लघुग्रह भूमिमण्डल, व्योम यह संकीर्ण,
चाहिए नर को नया कुछ और जग विस्तीर्ण।
भावार्थ- कवि दिनकर जी प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कहना चाहते हैं कि मानव बुद्धि निरंतर तीव्रगति से बदल रही है। वह एक क्षण भी नहीं रुक सकता, उसकी बुद्धि कभी नहीं थकती। इस धरती की पुस्तक को मनुष्य ने अच्छी तरह पढ़ लिया है और अब उसके पास इससे जुड़े कुछ भी प्रश्न शेष नहीं है। वह सब कुछ जानता है और समझता है। उसके विचारों में अब कोई नया रहस्य जानना शेष नहीं है; सभी बातें पुरानी हो गई हैं।अभिनव मनुष्य केलिए अब यह विशाल आकाश छोटा हो गया है। आज का अभिनव मनुष्य अपने कार्यक्षेत्र का और अधिक व्यापक विस्तार करने के लिए कोई नया क्षेत्र चाहता है , वह नए और विस्तृत विश्व को जानना चाहता है। वह नित नए नवीन संसार की खोज में लगा रहता है।
9
यह मनुज, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरम्य प्रकाश,
कुछ छिपा सकते न जिससे भूमि या आकाश।
यह मनुज, जिसकी शिखा उद्दाम,
कर रहे जिसको चराचर भक्तियुक्त प्रणाम।
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार,
ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार।
‘व्योम से पाताल तक सब कुछ इसे है ज्ञेय’,
भावार्थ- कवि दिनकर का कहना है कि मनुष्य सृष्टि की सबसे सुंदर कृति है। अब यह पूरी तरह से विज्ञान से परिचित है। आकाश से पाताल तक कोई रहस्य शेष नहीं है, जो इसने जान न लिया हो। यह अनमोल ज्ञान का भंडार है। चर हो या अचर सभी इसकी शक्ति के समक्ष नत मस्तक होते हैं। मानव सृष्टि का श्रृंगार है। विज्ञान और ज्ञान का बहुत अकूत भंडार है।
10
पर न यह परिचय मनुज का, यह न उसका श्रेय।
श्रेय उसका बुद्धि पर चौतन्य उर की जीतरू
श्रेय मानव की असीमित मानवों से प्रीत।
एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान
तोड़ दे जो, बस, वही ज्ञानी, वही विद्वान्,
और मानव भी वही।
भावार्थ- कवि दिनकर कहते है कि अभिनव मनुष्य का विज्ञान पर नियंत्रण होने के बावजूद, यह मनुष्य का वास्तविक परिचय नहीं है और इसमें कोई महानता भी नहीं है। मनुष्य का वास्तविक परिचय और महानता अपनी बुद्धि की दासता से मुक्त होकर, बुद्धि पर हृदय का अधिकार करने में है , प्रेम से ह्रदय पर शासन करने में है । दिनकरजी ने कहा कि वही मनुष्य जो लोगों के बीच बढ़ती हुई दूरी को कम कर सकता है, वह ज्ञानी या विद्वान है। वास्तव में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो स्वयं को एकाकी नहीं है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड को अपना परिवार समझता है। आज, मनुष्य ने वैज्ञानिक रूप से बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन पारस्परिक प्रेम कम हो रहा है। कवि की इच्छा है कि मनुष्य की आत्मा उसकी बुद्धि पर शासन करे। वास्तव में, ज्ञानी वही है, जो मनुष्य -मनुष्य के बीच खड़ी दीवारों को गिरा कर पारस्परिक सौहार्द का भाव भरे ।
11
सावधान, मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार,
तो इसे दे फेंक, तजकर मोह, स्मृति के पार।
हो चुका है सिद्ध, है तू शिशु अभी अज्ञान;
फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान।
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।
भावार्थ- कवि दिनकर जी कहते हैं कि प्रकृति से लड़ने के लिए मानव ने विज्ञान के माध्यम से कई ऐसे नए उपकरण बनाए हैं,जिससे वह प्रकृति पर नियंत्रण रख सके। हाल के वैज्ञानिक उपकरणों और खोजों ने प्रकृति को नियंत्रित करने की इच्छा से वातावरण को बर्बाद के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है । विज्ञान के दुरुपयोग से मानव के कल्याणकारी साधनों का विनाश हो सकता है। दिनकर जी ने नवीन मानव को सावधान करते हुए कहा कि हे मानव! विज्ञान की तीक्ष्ण तलवार से खेलना छोड़ दो। इसमे मानव जाति का हित नहीं है। अगर विज्ञान एक तीक्ष्ण हथियार है, तो इस मोह को त्याग देना ही समझदारी है। अभिनव मनुष्य की इन तमाम उपलब्धियों के उपरांत भी, अभी भी मनुष्य को इस विज्ञान की तलवार पर नियंत्रण पाना मुश्किल है। मनुष्य अभी एक नवजात शिशु है। उसे फूल और काँटे में फर्क नहीं पता। वह अबोध और अज्ञानी है। विज्ञान तलवार की तीक्ष्ण धार से खुद को घायल कर सकता है। अभिनव मनुष्य को इससे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि अभिनव मनुष्य की छोटी-सी लापरवाही भी अखिल मानव जाति के विनाश का कारण बन सकती है।



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