inspirational thought in hindi

inspirational thought in hindi
inspirational thought in hindi-दैव दैव आलसी पुकारा
दुनिया में दो तरह के लोग होते है -एक आर्थिक रूप से सम्पन्न और दूसरे विपन्न।
जो सम्पन्नहै ,वे अपने परिश्रम के कारण है ,
जो विपन्न है ,वे अपने आलस्य के कारण विपन्न है
. सुख का अवसर हर मनुष्य के जीवन में आता है किन्तु आलसी उस अवसर को गवां देता है।
मनुष्य केजितने शत्रु है उनमे से एक शत्रु आलस्य भी है। जो मनुष्य आलस्य को आपने मित्र बना लेता है ,बाद में आलस्य अपने दूसरे मित्र दरिद्र को भी बुला लेता है। शेर भले ही शक्तिशाली हो, शिकार के लिए गुफा से बहार तो उसे भी आना पड़ता है।
आलसी आज के काम को कलपर छोड़ देता है। परिश्रमी अपने परिश्रम से अपने ऋण से मुक्त हो सकता है,किन्तु आलसी लोगों के पास जो कुछ होता है,वह भी चला जाता है। आलस्य ,भगवन के दिए हुए हाथ -पैरों का अपमान है। आलस्य एक रोग है और इसका इलाज़ है -काम ,काम और सिर्फ काम।
महान विचारक सुकरात ने कितना सटीक कहा है कि जो कुछ नहीं करता वह तो आलसी है ही किन्तु उसे भी आलसी ही समझना चाहिए जो अच्छा करने की काबिलियत तो रखता है ,लेकिन अपनी काबिलियत का इस्तेमाल नहीं करता। जैसे काई जमे पानी में परछाई नज़र नहीं आती ,वैसे ही आलसी को अपनी काबिलियत
नज़र नहीं आती। जो खुद अपना भला नहीं कर सकता ,उससे दूसरों की भलाई की उम्मीद कैसे की जा सकती
है ?दरिद्रता की जड़ आलस्य ही है। आलसी अपने जीवन का अमूल्य समय आलस्य में बिता देता है। काबिलियत रखनेवाला यदि आलस्य छोड़कर समय का समुचित उपयोग करे तो वह कितना सुखी हो सकता है।
कुछ लोग कहते है काम तो कर ही रहे है ,थोड़ा आराम भी तो चाहिए। बात तो सही है किन्तु आराम और आलस्य के बीच का अंतर भी समझे। आराम सिर्फ इतना करे कि काम में खर्च हुई ऊर्जा फिर से मिल मिल जाये
दरिद्रता की जड़ है -आलस्य। श्री ,ह्री ,धृति ,कीर्ति ,और भूति का वास तो दक्ष पुरुषार्थी में ही होता है आलसियों में नहीं । पुरुषार्थी सदा सुख पाते है और आलसी सदा दुःख। आलसियों को तो भगवन आगे चलकर कुछ दे भी दे तो आलसी उसका भी सुख नहीं भोग सकता। सुख प्राप्ति की अनिवार्य शर्त है आलस्य का त्याग। आलसी और अधिक सोने वाले को तो सिर्फ और सिर्फ दरिद्रता ही मिलेगी ,सफलता नहीं यह निश्चित है,क्योकि आलसी आलस्य में अपना पुरुषार्थ खो देता है । सफलता,उन्नति और सुख का उपभोग वही करेगा जो पुरुषार्थ करेगा ,आलसी तो भाग्य-भरोसे बैठकर सुख आने का इंतज़ार ही करता रहेगा।





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