soul-purity
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जो मनुष्य विवेकहीन बुद्धिवाला है,जिसका मन अस्थिर व चंचल है ,उसकी इंद्रिया उसके वश में नहीं होती ,जैसे दुष्ट घोड़े सारथी के वश में नहीं होते। परन्तु जो मनुष्य विवेकशील बुद्धिवाला होता है और जिसका मन सदा स्थिर होता है ,उसकी इन्दिरिया उसके वश में होती है ,जैसे उत्तम हगोदे सारथी के वश में होते है …कठोपनिषद से
जो मनुष्य विवेकहीन होता है ,जिसका मन वश में नहीं और जो अपवित्र रहता है ,वह कभी परम पद को नहीं पा सकता ,अपितु बार-बार जन्म -मरण रूपी संसार चक्र में भटकता रहता है ,परन्तु जो मनुष्य विवेकशील बुद्धि से युक्त है ,संयतचित्त और सदा पवित्र रहता है ,वह ही उस परम पद को पाता है ,जहाँ से पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता ।
यह चित्त कुछ अन्य वास्तु नहीं है ,आत्मा की अंतर चेतन शक्ति ,अपनी चेतनता को भूलकर पदार्थों के पीछे लगते हुए पदार्थकर बन गयी है -इसी का नाम मन है और कुछ नहीं। इस मन का कल्पना साम्राज्य बहुत बड़ा है। मन की सृष्टि का कभी अंत नहीं है।
श्रेय और प्रेय अर्थार्त हितकारी एवं सुखकारी -यह दोनों मार्ग मनुष्य के सम्मुख होते है। बुद्धिमान मनुष्य इन दोनों में जो अंतर है उसे ध्यान से देखते है ,उसकी परख करते है और सुख को छोड़ कर हितकारी का मार्ग स्वयं के लिए चुनते है ,जो अज्ञानी है वे हितकारी के स्थान पर सुखकारी का चुनाव करते है। अतः हमारे लिए हितकारी क्या होगा ,इसका चुनाव भली-भर्ती विचार करके विवेक द्वारा ही किया जाना चाहिए अन्यथा हम ऐसे क्षणिक सुखों में फंस जाते है जिसका परिणाम सुखद नहीं होता। अंतत जब हमारा श्रेय और प्रेय के अंतर को पूर्णतया समझ लेता है ,तब वह नकारात्मकताओं से युक्त होकर श्रेय के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है और जीवन के परम लक्ष्य को पा लेता है।




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