geeta adhyay saar-16

geeta adhyay saar-16
जय श्री कृष्णा
१६वा अध्याय :–
पन्द्रहवे अघ्याय में भगवान् ने संसार वृक्ष का वर्णन ,संसार जीव और परमात्मा का वर्णन ,जीवात्मा के स्वरुप तथा उसे जानने के उपाय व् क्षर -अक्षर का वर्णन किया था
सोलहवें अध्याय को दैव सुर सम्पद विभाग योग कहा गया है
इस अध्याय में कुल २४ श्लोक है
इस अध्याय में भगवान् ने दैवी सम्पदा वालों और आसुरी मनुष्यों के लक्षण बतलाते हुए आसुरी सम्पति वाले मनुष्यों के दुराचरण ,मनोरथ ,दुर्भाव ,दुर्गति का वर्णन किया है तथा शास्त्र विधि के अनुसार कर्म करने की प्रेरणा दी है।
सोलहवे अध्याय के प्रारम्भ मे भगवान ने देवी सम्पदा प्राप्त मनुष्य के छब्बीस लक्षण बतलाये है, वे लक्षण है – अभय , अंत: करण की शुद्धि , ज्ञान योग मे दृढ़ स्थिति , दान , इन्द्रियों का दमन , यज्ञ , स्वाध्याय , तप , सरलता , अहिंसा , सत्य , क्रोध का आभाव , त्याग , शांति , निंदा न करना , दया , विषयों के प्रति अनासक्ति , कोमलता , अकर्तव्य के प्रति लज्जा , चपलता का अभाव , तेज , क्षमा , धैर्य , शरीर की शुद्धि ,किसी से बैर न होना , अहंकार रहित ये सभी मोक्ष देने वाले है।
दम्भ , क्रोध ,घमंड , अभिमान , कठोर वाणी और अज्ञान – ये आसुरी समक्ष प्राप्त मनुष्य के लक्षण है। यह सभी लक्षण बंधन है। इस लोक मे दो जाति के मनुष्य है – देवी और आसुरी।
आसुरी स्वभाव वाला मनुष्य यह नहीं जनता की क्या करना उचित होगा और क्या करना अनुचित। ऐसे आसुरी स्वभाव वाले वाले मनुष्यो मे बाह्य एवम आंतरिक शुद्धि , सदाचार और सत्यभाषण का गुण नहीं होता। आसुरी स्वभाव वाले लोग संसार को असत्य मानते है।
ऐसे आसुरी स्वभाव वाले लोग संसार की सृष्टि के सम्बन्ध मे यह मानते है कि यह सृष्टि आश्रय रहित , ईश्वर रहित और स्त्री – पुरुष के कामुक संयोग से उत्पन हुई है। इस प्रकार के मिथ्या एवम नास्तिक दृष्टि -कोण से इनकी बुद्धि मलिन रहती है।
ऐसे मंद बुद्धि युक्त , घोर पाप कर्म करने वाले अपकारी मनुष्यो का जन्म जगत का नाश करने के लिए ही होता है। ऐसे मनुष्य दम्भ ,मान और मद मे चूर होकर पूर्ण न होने वाली कामना का आश्रय लेकर , मिथ्या सिद्धान्तों और अपवित्र आचरण धारण कर संसार मे रहते है।
ऐसे लोग विषयभोग को ही अपना परम लक्ष्य मानते है और नाना चिंताओं से ग्रसित रहते है। आसक्ति के बंधन मे बंधे ,काम, क्रोध, के वशीभूत होकर विषय भोगो के लिए अनीतिपूर्वक धन का संचय करते है। जितना धन है उससे ज्यादा पाने की चेष्टा करते है। मैंने इसको मार दिया , उसको भी मार दूँगा।
सर्वसमर्थ ऐश्वर्य को भोगने वाला सिद्ध , बलवान और सुखी मैं ही हूँ , मेरे सामान अन्य कोई नहीं , इस प्रकार इस प्रकार के अज्ञान से मोहित रहते है। इस प्रकार के लक्षण वाले मनुष्य नरक को प्राप्त होते है। इस प्रकार के आचरण वाले मनुष्य के द्वारा किया गया यज्ञ दिखावा मात्र होता है। इस प्रकार के आसुरी लक्षण वाले मनुष्य परब्रह्म परमात्मा से भी द्वेष रखते है।
ऐसे आसुरी लक्षण वालों को मैं आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। ऐसे आसुरी लक्षण वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर बार -बार -आसुरी योनि को प्राप्त कर घोर नरक भोगते है। काम ,क्रोध ,और लोभ नरक की ओर ले जानेवाले है। काम ,क्रोध ,और लोभ का त्याग कर परब्रह्म को प्राप्त किया जा सकता है ।
शास्त्र विधि को छोड़कर मनमाना करनेवाले मनुष्य को न पूर्णत्व की सिद्धि प्राप्त होती है ,न सुख प्राप्त प्राप्त होता है ;और न परमधाम की प्राप्ति होती है। मनुष्य को शास्त्रोक्त विधान के अनुसार ही कर्तव्य पालन करना चाहिए क्योकि शास्त्र ही कर्तव्य -अकर्तव्य का निर्धारण करते है ।
सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
सतरहवाँ अध्याय अगले अंक में प्रकाश्य
गीता अध्याय के संक्षिप्त और सार गर्भित रूप में प्रस्तुत करने के मेरे प्रयास यदि आपको अच्छे लगे हो तो अपने स्वजनों ,मित्रों और स्वजनों के साथ अवश्य SHARE करें
जय श्री कृष्णा …… राधे -राधे







No Comments