geeta adhyay saar-18(2)

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इस अध्याय में कुल ७८ श्लोक है।
इस अध्याय को मोक्ष – संन्यास योग कहा गया है
इस अध्याय में संन्यास किसे कहते है ?
संन्यास कैसा हो ?
सन्यासी का आचरण व भाव कैसा हो ?
संन्यास का साधन एवं फल क्या होता है ?
त्याग क्या है ?
त्याग का साधन एवं फल क्या होता है ?
त्यागी कैसा हो ?
त्यागी का आचरण व भाव कैसा हो ?
भगवान् ने उपर्युक्त प्रश्नों का विस्तार से वर्णन किया है
श्री मदभगवत गीता का यह सार अठारहवाँ अध्याय है। इस अध्याय मे भगवान् ने पृथक से कोई नवीन तथ्य उद्घाटित नहीं किया अपितु पूर्वोत्तर कथन का ही उपसंहार किया है। सामान्य अर्थो में इस अध्याय को समस्त ज्ञान का निष्कर्ष अथवा उपसंहार माना जा सकता है।

भगवान् गुणों के आधार पर बुद्धि के तीन गुणों का वर्णन करते हुए कहते है कि वह बुद्धि सात्विक है जो प्रवृति -निवृति ,कर्तव्य -अकर्तव्य ,भय -अभय ,और मुक्ति व बंधन को यथार्थ रूप से जानती है और जो इन सब को ठीक से ना जानती हो ,वह बुद्धि – राजसिक बुद्धि है। जो बुद्धि सात्विक गुणों से बिल्कुक विपरीत हो ,वह बुद्धि तामसिक बुद्धि है।
इसी भांति संकल्प के भी तीन भेद होते है –
उस संकल्प को सात्विक जानना चाहिए जिस संकल्प में परमात्मा को जानने के लिए ध्येय से मन ,प्राण ,और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण किया जाता है। जिस संकल्प के द्वारा धर्म ,अर्थ ,और आसक्ति को धारण किया जाता है ,वह संकल्प राजसिक संकल्प होता है।
तामसिक संकल्प वह है। ,जिसमे मनुष्य किसी धारणा के अधीन होकर भय , चिंतित , दुःख और निंद्रा का त्याग नही करता है। संकल्प के तीन प्रकारों के बाद भगवन सात्विक, राजसिक और तामसिक के बारे मैं समझते है की आध्यात्मिक साधना से दुखो का अंत होकर जिस सुख की प्राप्ति होती है , वह सात्विक सुख है। इन्द्रियों के भोग से उत्पन्न सुख राजसिक सुख है। निंद्रा और आलस्य से प्राप्त सुख तामसिक सुख कहलाता है । प्रकृति के इन तीन गुणों से कोई भी मुक्त नहीं रह सकता।
आगे भगवान् चरों वर्णों के विभाजन के बारे में बतलाते है कि शम ,दम ,तप .शौच ,सहिष्णुता ,सत्यवादिता ,ज्ञान ,विवेक ,और आस्तिकता ये सब ब्राह्मण के कर्म है। शौर्य ,तेज़ ,दृढ-संकल्प ,दक्षता ,दान ,शासन ,और युद्ध से विमुख ना होना ,ये सब क्षत्रिय के कर्म है। कृषि ,व्यापर वैश्य का कर्म है और सेवा शुद्र का कर्म है।
मनुष्य अपने अपने कर्म पालन द्वारा परब्रह्म पूजन कर सिद्धि को प्राप्त होता है।
कोई कर्म दोष रहित नहीं है किन्तु आसक्ति और कामना रहित होकर अर्थात सकाम कर्म का त्याग कर मनुष्य कर्म बंधन से मुक्त होकर नैष्कर्म्य सिद्धि प्राप्त करता है।
आगे भगवान् कहते है कि विशुद्ध बुद्धि से युक्त ,दृढ़ता से आत्मसंयम कर शब्दादि वैराग्य प्राप्त कर लेता है। विषयों का त्याग कर ,राग द्वेष व ममत्व भाव से रहित होकर ,एकांतवास में सात्विक भोजन ,वाणी कर्मेन्दिर्यों व मन को वश में कर लेता है ,स्वयं को परब्रह्म के ध्यान में लीं कर लेता है ,बल ,दर्प ,काम ,क्रोध ,और स्वामित्व का त्याग कर देता है ,ऐसा साधक परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। ऐसा साधक समस्त प्रकार के शोक और इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। परब्रह्म परमात्मा ही सभी प्राणियों के अन्तःकरण में स्तिथ होकर अपनी माया से संचालित करते है।
भगवान् कहते है कि मैं अर्थात परब्रह्म ,पराभक्ति से ही जाना जा सकता हूँ। मुझे तत्व ज्ञान से जान लेने के पश्चात साधक मुझ में प्रवेश कर मत्स्वरूप बन जाता है। भगवान् अर्जुन से ऐसा ही करने और बनने के लिए कहते हुए सावधान करते है कि समस्त पुण्य वर्गों का परित्याग कर मेरी शरण को प्राप्त हो , मेरा ही भजन- पूजन करो ,नमस्कार करो ,मुझमे मन लगाओ ,मैं तुम्हे समस्त कर्म बंधन से मुक्त कर दूँगा। अंत में भगवान श्री कृष्ण गीता और गीता ज्ञान के सम्बन्ध में कहते है कि तप ,भक्ति तथा श्रद्धा रहित मनुष्य को गीता का ज्ञान नहीं दिया जाना चाहिए तथा जो इस गीता ज्ञान का उपयुक्त मनुष्यो मे प्रसार करेगा , वह अत्यंत प्रिय होगा। जो कोई इस अर्जुन -कृष्ण संवाद का अध्यन करेगा ,उसके द्धारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा और जो आलोचना न कर श्रद्धा से सुनेगा पापो से मुक्त हो जाएगा।
जब कृष्ण अर्जुन से दिए गए ज्ञान के प्रभाव के बारे में पूछते कहते है तो अर्जुन कहते है कि इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति से मेरा संशय दूर हो गया है।
कृष्ण -अर्जुन संवाद का वर्णन कर रहे संजय कहते है कि भगवान श्री कृष्ण और इस कल्याणकारी और अदभुत संवाद का और श्री कृष्ण का अदभुत रूप का स्मरण मुझे हर्षित कर रहा है। जहाँ भी श्री शस्त्रधारी कृष्ण और धर्म व रक्षारूपी अर्जुन होंगे , वहाँ श्री विजय विभूति और नीति का वास होगा।
हरि ॐ तत्सत , हरि ॐ तत्सत , हरि ॐ तत्सत
१८ वां अध्याय सम्पूर्ण
आत्मिक – निवेदन -अध्याय १ से १७ के लिए पूर्व प्रकाशित पोस्ट पढ़े।
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जय श्री कृष्ण ….. राधे-राधे
ॐ शांति शांति शांति






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