chanakya -neeti -7

chanakya -neeti -7
चाणक्य -नीति -7
➽➽मनुष्य को चाहिए कि अपनी आर्थिक ,मानसिक परेशानी ,पत्नी की प्रवृति तथा किसी व्यक्ति द्वारा किये गए अपमान को दूसरे के सामने प्रकट ना करें। इन बातों को दूसरों के सामने प्रकट करने पर लोग मुँह पर तो सहानुभूति करगे किन्तु पीठ पीछे उपहास उड़ायेंगे।
➽➽कुछ बातों में मनुष्य का संकोच ना करना ही श्रेयस्कर होता है ,जैसे अन्न -धन के व्यापार में ,किसी विद्या को सीखने में ,भोजन के मामले में ,और लोक व्यवहार में। इस स्वाभाव के लोग कभी कष्ट नहीं पाते बल्कि सुखी रहते है।
➽➽आत्म -संतोष और मन को शांत रखने से सुख प्राप्त होता है। ,ऐसा सुख अधिक की अपेक्षा रखने वाले को कभी प्राप्त नहीं होता। थोड़ा है ,थोड़े की ज़रुरत है, ऐसी लालसा रखने वाले कभी सुखी नहीं रह सकते। जब आये संतोष धन ,सब धन धूल समान ,ऐसा संतोषी सदा सुखी रहता है।
➽➽कुछ मामलों में मनुष्य को संतोषी बना रहना चाहिए ,जैसे -स्वयं की पत्नी जैसी है ,अच्छी है। समय पर जैसा भोजन मिल जाये ,अच्छा है ,जितना धन है ,पर्याप्त है ,किन्तु कुछ मामलों में मनुष्य को थोड़े में संतुष्ट नहीं होना चाहिए ,जैसे -जितना अध्ययन करो ,कम है ,जितना तप किया ,दान किया ,कम है ,ऐसा सोचना चाहिए।
➽➽गाड़ी से पांच ,घोड़े से दस ,हाथी से हज़ार हाथ दूर रहने में ही भलाई है किन्तु दुष्ट अथवा दुर्जन से बचने के लिए उस स्थान को भी छोड़ देना चाहिए जिस स्थान पर दुष्ट अथवा दुर्जन रहते है।
➽➽हाथी को अंकुश से ,घोड़े को पीठ सहला कर ,सिंग वाले पशुओं को लाठी से वश में किया जा सकता है किन्तु दुष्ट अथवा दुर्जन को इनमे से किसी तरह वश में नहीं किया जा सकता ,उन्हें तो तलवार से मारकर ही नष्ट किया जा सकता है।
➽➽ब्राह्मण भोजन से ,मयूर मेघ गर्जन से ,और सज्जन दूसरों को सुखी देखकर प्रसन्न होते है किन्तु दुर्जन अथवा दुष्ट स्वभाव वाले दूसरों को विपत्ति में देखकर या कष्ट देकर प्रसन्न होते है।
➽➽अपने से अधिक शक्तिशाली को अनुकूल व्यवहार से ,अपने से कमज़ोर को प्रतिकूल व्यवहार से वश में करें किन्तु अपने समान बलशाली को विनय अथवा बल में से जो भी उपयुक्त हो उस प्रयोग से वश में करना
चाहिए।
➽➽राजा का बल उसकी भुजाओं में ,ब्राह्मण का बल उसके ज्ञान में तथा स्त्रियों का बल उसकी सुन्दरता ,तरुणता और मधुरता में होता है।
➽➽मनुष्य को अत्यधिक सीधा-सरल भी नहीं होना चाहिए। चतुर लोग सीधे-सरल लोगों को आसानी से ठग लेने या धोखा देने में सफल हो जाते है। जैसे जंगल के सीधे खड़े पेड़ को कोई भी काट देता है किन्तु टेढे -मेढ़े पेड़ खड़े रहते है।
➽➽मनुष्य को हंस की तरह स्वार्थी भी नहीं होना चाहिए। हंस सरोवर में तब तक वास करते है ,जब तक सरोवर में जल रहता है किन्तु सरोवर का जल सूखने पर हंस उस सरोवर को छोड़कर अन्यत्र चले जाते है। मनुष्य को ऐसा नहीं करना चाहिए ,जिसने मुसीबत में हमारा साथ दिया ,उस पर यदि विपत्ति आ जाये तो उसका साथ छोड़ना कृतघ्नता होगी।
➽➽नदी का जल बहते रहने से स्वच्छ बना रहता है ,इसी भांति धन का भी अनावश्यक संचय करने की अपेक्षा यथोचित तरीके से निरंतर काम में लेते रहना चाहिए ,इसी में धन की वास्तविक सार्थकता है किन्तु कंजूसी प्रवृति के कारण आवश्यकता के स्थान पर भी खर्च ना करना अथवा धन होते हुए भी कष्ट भोगना ,मूर्खता है।
यदि किसी मनुष्य में दान की प्रवृति है ,मृदुभाषी है ,ईश्वर के प्रति श्रद्धा ,आस्था ,विश्वास और समर्पण का भाव है ,ब्राह्मण के प्रति आदर भाव हो ,तो समझना चाहिए कि वह स्वर्ग से धरती पर आया है ,इसके विपरीत जो मनुष्य कटु वाणी का प्रयोग करता है, क्रुद्ध स्वभाव वाला हो ,बंधु -बांधव और मित्रों के प्रति द्वेष भाव रखता हो ,नीच कुल या दुर्जन की सेवा करता हो ,तो समझना चाहिए कि वह नर्क से धरती पर आया है।
➽➽यदि कोई शेर की गुफा में जाये तो हो सकता है उसे गज -मुक्ता मिल जाये किन्तु यदि वह गीदड़ की गुफा में जाए तो उसे मृत बछड़े की पूंछ या गधे की खाल ही मिलेगी।
➽➽विद्या के अभाव में मनुष्य की स्तिथि कुत्ते की पूँछ के समान है जिससे वह ना तो मच्छर उडा सकता है और अपने गुप्तांगों को छुपा सकता है।
➽➽जिसकी वाणी में पवित्रता हो ,मन जिसका पवित्र हो ,जिसमें संयम हो ,दया भाव हो ,धन को परमार्थ में लगाता हो ,ऐसा मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है।
➽➽जैसे फूलों में सुगंध ,तिल में तैल ,लकड़ी में आग ,दूध में घी और गन्ने में मिठास व्याप्त रहती है इसी भांति सभी प्राणियों की देह में ईश्वर का वास होता है।






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