chanakya neeti -8

chanakya neeti -8
चाणक्य -नीति -8
चाणक्य -नीति -८ केवल धन प्राप्ति की कामना अधम मनुष्य रखते है ,अधम केवल और केवल धन की कामना करते है , श्रेष्ठ जन केवल और केवल मान चाहते है किन्तु जो न अधम हो और न श्रेष्ठ वे धन और मान दोनों की कामना रखते है।
वृद्धवस्था मे अर्धांगिनी की मृत्यु हो जाना।
धन -सम्पति का हाथ से निकल जाना।
दूसरो पर आश्रित हो जाना।
अग्निहोत्र के बिना वेदों का अध्धयन व्यर्थ है , दान किये बिना यज्ञ आदि की कियाए व्यर्थ है। भाव के बिना कोई सिद्धि नहीं होती अर्थात प्रेम भाव ही सब सिद्धियों का मूल है।
मूर्ति चाहे धातु की हो ,पत्थर की हो अथवा लकड़ी की किन्तु भावना पवित्र होनी चाहिए । आप जिस भावना से ईश्वर का स्मरण करेगे , वैसे ही सिद्धि की प्राप्ति होगी।ईश्वर मूर्ति में नहीं मनुष्य की भावना में व्याप्त रहता है।
शांति के समान कोई अन्य तप नहीं ,संतोष से बढ़कर सुख नहीं ,इसके विपरीत तृष्णा से बढ़कर अन्य कोई व्याधि नहीं और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं।
गुण मनुष्य का भूषण ,शील मनुष्य का अलंकार है। कार्य सिद्धि से विद्या भूषित होती है और धन के सार्थक उपभोग से धन सुशोभित होता है।
मनुष्य कितना ही सुंदर क्यों न हो किन्तु उसका वह सौंदर्य व्यर्थ है यदि उसमे कोई गुण न हो। उस मनुष्य का कुल निंदनीय है जिसके आचरण में शीलता न हो। ऐसे मनुष्य की विद्या भी व्यर्थ है जिससे कार्य सिद्धि न हो और वह धन भी व्यर्थ है ,जिस धन का सार्थक उपभोग न हो।
भूमिगत जल ,पतिव्रता स्त्री ,कल्याण करने वाला शासक तथा संतोषी ब्राह्मण पवित्र होता है।
जैसे असंतोषी ब्राह्मण निंदित होता है वैसे ही संतोषी शासक ,लज्जाहीन स्त्री निंदनीय है।
उस मनुष्य का उच्च कुल में जन्म लेना भी व्यर्थ है जो उच्च कुल में जन्म लेकर भी विद्या हीन है ,इसके विपरीत वह मनुष्य निम्न कुल में जन्म लेकर भी देव-तुल्य पूजनीय है जो निम्न कुल में जन्म लेकर विद्या गुण से परिपूर्ण है।सुंदर ,तरुण और उच्च कुल में उत्पन्न पुरुष वैसे ही शोभा रहित होता है जैसे बिना गंध वाला पलाश का फूल।
विद्या गुण से युक्त मनुष्य सर्वत्र प्रशंसा पाता है ,सम्मान पाता है ,धन-धन्य प्राप्त करता है। विद्या द्वारा प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति संभव है
माँस भक्षण करनेवाला ,मदिरा पान करने वाला ,मूर्ख और अज्ञानी इस धरती पर भार स्वरुप है। धरती इनके भार से व्यथित रहती है।
धन -सम्पति का हाथ से निकल जाना।
दूसरो पर आश्रित हो जाना।
जैसे असंतोषी ब्राह्मण निंदित होता है वैसे ही संतोषी शासक ,लज्जाहीन स्त्री निंदनीय है।







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