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राम नवमी ,राम जन्म अवतार
राम नवमी …या यूँ कहे कि आज राम जन्म उत्सव है …पौराणिक मान्यता के अनुसार चैत्र मास की नवमी के दिन ही भगवान श्री राम का जन्म हुआ था।भगवान श्री राम को भगवानश्री विष्णु का अवतार माने या महापुरुष ? इस बात को लेकर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग मान्यता है।
हम दोनों सन्दर्भों में समन्वित बात करेंगे।
युगों व्यतीत हो जाने के उपरांत भी भगवान श्री राम का जीवन चरित आज भी प्रासंगिक है ..प्रेरणा है ,उनके जीवन चरित …. उनके जीवन मूल्य अद्यतन ज्यों के त्यों बने हुए है। भगवान श्री राम ,जो मर्यादा पुरषोत्तम कहलाते है ,जो स्वाभाव से सौम्य और शांत है ,उन्ही श्री राम ने अपने हाथों में धनुष -बाण धारण किये हुए है ,जो इस बात का प्रतीक है कि जब कोई हमारी मर्यादा को हमारी कायरता या कमज़ोरी समझे तो ,उसे हुँकार भरकर और हथियार उठाकर यह भी दिखला दे कि मर्यादा का पालन करने का अर्थ कायरता नहीं होती। जब सोने की बनी बालियाँ भी कान कटाने लगे , तो उसे भी उतार दिया जाता है। इसी तरह आवश्यकता पड़ने पर हथियार उठाना हिंसा या निर्दयता नहीं बल्कि अत्याचार से मुक्त होने और होने देने का विकल्प है।

जो दया के पात्र है उनके प्रति दया रखो ,मित्र के प्रति मित्रता का भाव रखोकिन्तु शत्रु के प्रति शत्रुता का व्यवहार भी धर्म पालन की ही अनुपालना है .
भगवान श्री राम के स्वरुप को यदि दैविक एवं पौराणिक सन्दर्भ से पृथक रखकर राज पुत्र के रूप मे भी अवलोकित किया जाय तब भी भगवान श्री राम अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से श्रद्धेय और पूजनीय बन जाते है। भगवान श्री राम का समग्र जीवन प्रमाणित करता है कि जैसे सोना तपकर कुंदन बनता है ,वैसे ही जीवन कष्टों और संघर्षों से निखरता है। मानव देह में देवत्व के समस्त गुण जन्म से से ही विदयमान होते है ,गुण रावण में भी थे ,अंतर सिर्फ इस बात का है कि किसने अपने गुण का प्रयोग किस हेतु किया ?देहधारी रावण भी और देहधारी राम भी थे ,फिर ऐसा क्या था कि रावण घृणा का और राम श्रद्धा का प्रतीक बन गए। यदि हम सामान्य मनुष्य भी अपनी अन्तर्निहित शक्तियों को अथवा गुणों को पहचान कर परमार्थ में लगा दे तो साधारण मानव भी देवता बन सकता है। भगवान श्री राम का जीवन चरित इसका प्रमाण है।
मनुष्य एक होकर भी उसके दायित्व भिन्न -भिन्न होते है ,उन दायित्वों का निर्वाह धर्म और नीति के अनुसार किया जाना चाहिए ,श्री राम यही आदर्श हमारे सम्मुख रखते है है। एक पुत्र के रूप में .. एक भाई के रूप में .. एक राजा के रूप में .. एक स्वामी के रूप में … एक मित्र के रूप में … अपने हर रूप में एक आदर्श प्रस्तुत करते है।
भगवान श्री राम ने सामाजिक ऐश्वर्य का त्याग कर सामाजिक, पारिवारिकऔर राजनितिक मर्यादाओं का पालन करते हुए जन ,सत्ता और धर्म की रक्षा का दायित्व पूरा किया मर्यादित रूप से । मर्यादा का पालन करने और पुरूषों में उत्तम होने के कारण भगवान श्री राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहा जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब रावण अपने कठोर तप से प्राप्त शक्तियों का दुरुपयोग करने लगा था। जब सभी देवता ,ब्राह्मण ,ऋषि रावण के अत्याचार से त्रस्त हो गए ,कुबेर अनुज वेदज्ञ होकर भी राक्षस हो गया ,राक्षसी शक्तियां शक्तिशाली होकर धर्म का नाश करने लगी ,यज्ञ नष्ट किये जाने लगे ,पूजा स्थल नष्ट किये जाने लगे ,ऋषि-मुनियों के तपोवन जलाये जाने लगे ,स्वयं इंद्र राक्षसों से पराजित हो गए ,तब समस्त ऋषि,मुनियों ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की ,तो भगवान विष्णु ने नर रूप में भू- लोक पर अवतरित होकर पापियों को नष्ट करने का आश्वासन देकर अयोध्या में राजा दशरथ की भार्या कौशल्या के गर्भ से राम के रूप में जन्म लिया ,ऐसा माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी इसका उल्लेख हुआ है ,पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात् छह ऋतुएँ व्यतीत होने पर बारहवें मास चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में कौसल्या माता ने राम को जन्म दिया।
इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के पुत्र थे -रघु और रघु के पुत्र थे दशरथ। राजा दशरथ को वैभव पूर्ण राज्य का सुख तो प्राप्त हुआ किन्तु वृध्दावस्था की दहलीज पर आ खड़े होने तक ३-३ रानियां होने के उपरांत भी संतान का सुख प्राप्त न था। संतानाभाव कि चिंता और दुःख को उन्होंने अपने धर्म गुरु वसिष्ठ ,वामदेव ,जाबालि ,कात्यायन और गौतम के समक्ष प्रकट किया। तब गुरु वसिष्ठ ने संतान प्राप्ति हेतु तात्कालिक प्रकांड सिध्द , वेदज्ञ ,कर्मकांडी और तपस्वी ऋषि ऋष्य श्रृंग द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करने का सुझाव दिया।
राजा दशरथ स्वयं अंगदेश गए और अपनी चिंता -व् दुःख बतलाते हुए पुत्रेष्टि यज्ञ करने का आग्रह किया ,जिसे ऋष्य श्रृंग ने स्वीकार कर लिया।
राजा दशरथ ने सरयू नदी के तट पर भव्य यज्ञ का आयोजन किया ,वेद मन्त्रों के साथ शास्त्रोक्त अनुष्ठान प्रारम्भ हुआ ,यज्ञ आहुति के पश्चात् ऋष्य श्रृंग ऋषि ने राजा दशरथ को यज्ञावशेष चरु देते हुए कहा कि इस यज्ञ प्रसाद को ग्रहण करने के उपरांत सभी रानियां गर्भ धारण करेंगी। राजा दशरथ ने ने अंत:पुर पहुंचकर ऋष्य श्रृंग द्वारा प्रदत्त चारु में से आधा रानी कौशल्या को ,शेष आधे में से आधा कैकेयी को और शेष के दो भाग कर सुमित्रा को दे दिया।
यज्ञ का प्रयोजन फलीभूत हुआ। ऋष्य श्रृंग के कथनानुसार चैत्र मास की शुक्ल नवमी को राजा दशरथ के घर
भगवान श्री राम ने माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया। इसीलिए चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को राम जन्म उत्सव के रूप में राम नवमी मनाई जाती है।






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