international day of innocent children of aggression
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International Day of Innocent Children Victims of Aggression

June 3, 2022
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International Day of Innocent Children Victims of Aggression -4 june

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देश और दुनिया में कई सारे ऐसे मुद्दे है जिसके दुष्प्रभावों से दुनिया भर के बच्चें,बूढें ,जवान ,स्त्री ,पुरुष असहाय होकर उस त्रासदी की पीड़ा भोग रहे है किन्तु मानवता के हितों के लिए कार्य करनेवाली राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का ध्यान उनकी ओर नहीं जा रहा .ध्यान दिया जायेगा लेकिन जब कोई बड़ी दुर्घटना होगी ,राष्ट्रीय –अंतर्राष्ट्रीय समाचार-पत्रों और टेलीविजनपर चर्चा होगी .तब सबका ध्यान इस ओर जायेगा  .तब सबकी आँखें खुलेगी  .घटना पर खेद जताया जायेगा  …शोक मनाया जायेगा  .सहनुभूति और  आक्रोश का सामूहिक स्वर फूटेगा  –इसे  मानवता को शर्मसार करने वाली दुखद घटना बताया जायेगा  .

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आग लगने पर विचार होता है कि एक कुआं खोदा जाना चाहिए ,ताकि ऐसी घटना होने पर उस आग को बुझाया जा सकें .कुआ खोदा जाता है और राष्ट्रीय –अंतर्राष्ट्रीय मंच से घोषणा की जाती है कि हमने कुआ खोद दिया है .हम कोशिश करेंगे कि  भविष्य में  ऐसे  भीषण अग्नि कांड की पुनरावृति नहीं हो पाए और दुर्भाग्य से ऐसी दुर्घटना घटित होती है तो हमने जो कुआ खोदा उसके पानी से उस आग को बुझा दिया जायेंगा और जिसके कारण यह दुर्घटना हुई है ,उसे दोषी मानते हुए उसके विरूद्ध कार्रवाही की जाएँगी .

अब प्रश्न उठता है कि क्या कोई भी बड़ी दुर्घटना आकस्मिक होती है ?

नहीं ,होनेवाली हर दुर्घटना प्रारंभ में छोटी ही होती है किन्तु तब उसे गंभीरता से नहीं लिया जाता .उसे चिंगारी समझकर नज़र अंदाज़ कर दिया जाता .

आग जब घर में लगती है तब किसी का ध्यान नहीं जाता लेकिन जब आग ऊँचे पहाड़ी जंगल में लगती है ,तब सबका ध्यान  आकर्षित होता है .

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जब भी किसी देश में युद्ध होता है या आतंकी घटनाएं होती है या फिर सशस्त्र संघर्ष होता है ,उस देश के बच्चें  शारिरिक ,मानसिक और भावनात्मक त्रासदी भोगते है .वह बच्चा जिसे  धर्म ,जाति भाषा का बोध नहीं होता ,वही बच्चा धर्म ,जाति ,भाषा की लड़ाई का शिकार होता है .कुछ बच्चें  बेक़सूर मारे जाते है ,कुछ बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जाता है .कुछ बच्चें अनाथ हो जाते है ,कुछ के खिलौनें छीन जाते है और कुछ बच्चों से उनकी किताबें .

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4 जून साल 1982  इजराइल द्वारा   लेबनान इजरायली सेना द्वारा  फलस्तीनी और लेबनानी निर्दोष  बच्चों के साथ क्रूरता की  गई।19 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र की एक आपातकालीन महासभा हुई जिसमे बच्चों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उनके अधिकार और सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 4 जून को  इंटरनेशनल डे ऑफ इनोसेंट चिल्ड्रन विक्टिम्स ऑफ अग्रेशन (International Day of Innocent Children Victims of Aggression) अंतराष्ट्रीय दिवस घोषित किया गया  है .इजराइली हमलों में बड़ी संख्या में निर्दोष लेबनानी और फिलिस्तीनी बच्चे या तो मारे गए  और  घायल हुए कई बच्चें बेघर हो गए.

बच्चों के साथ होनेवाली ऐसी हिंसक ,क्रूर निर्मम घटनाएँ किसी एक देश में नहीं बल्कि पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में हो रही है .रूप कुछ भी ,देश कोई भी हो आक्रामकता के शिकार बच्चों की पीड़ा एक ही है .

बच्चें सिर्फ युद्ध या हिंसक घटनाओं से ही पीड़ित नहीं होते माता-पिता की अति महत्वाकांक्षा,सामाजिक,शिक्षा और आर्थिक व्यवस्था के भी शिकार होते है .

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ऐसे कई माता-पिता भी है जो बच्चे का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए अनुशासन के नाम पर इतने सख्त ,क्रूर और निर्दय हो जाते है कि सामान्य डांट-फटकार की सीमाओं को पार कर शारीरिक यातनाएं देने लगते है .

ऐसे माता-पिता के अधूरे कार्य को स्कूल सिस्टम पूरा कर देता है .जो बच्चा परीक्षाओं में अच्छा परफोर्म नहीं कर पाता ,उन्हें अध्यापक की प्रताड़ना सहनी पड़ती है .

बच्चा घर पर माता-पिता से डरता है और स्कूल में अध्यापक से .

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बच्चा अपनी पीड़ा किसी अन्य  के सामने व्यक्त नहीं कर पाता ,ऐसे बच्चे धीरे-धीरे aggressive अर्थात  विद्रोही बनते चले जाते और इनमे से कुछ तो अपराधिक कृत्यों की गिरफ्त में आ जाते है  .

ऐसे बच्चें अकेले रहना पसंद करने लगते है , किसी सृजनात्मक अथवा रचनात्मक  काम में रूचि नहीं दिखाते ,चेहरे पर या तो उदासी का भाव रहता है या क्रोधित नज़र आते है  ,स्वाभाव  से चिडचिडे हो जाते है ,भूख नहीं लगना, जिद्दी और अड़ियल हो जाते है , ऐसे बच्चों का कहीं भी मन नहीं लगता

यदि कोई बच्चा उक्त लक्षण वाला पाया जाता है तो उक्त स्थिति के लिए क्या बच्चे को दोषी ठहराया जायेगा ?

बच्चो को आक्रमकता से कैसे बचाए जा सके ,इसके लिए तीन स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता होती है

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यदि युद्ध अथवा आतंकी या सांप्रदायिक घटनाओ के कारण हजारों की संख्या निर्दोष बच्चें शिकार होते है तो इसकी ज़िम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय संगठन ,सरकारें और सामाजिक संगठन तय कर लेते है किन्तु प्रश्न उस बच्चे का उठता है जो अपने ही परिवार में माता-पिता की मानसिक और शारीरिक यंत्रणा झेल रहा है ? उस बच्चें की ज़िम्मेदारी कौन उठाएंगा ?

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जहाँ अपराध है ,वहां कानून भी है .किन्तु क्या अंतर्राष्ट्रीय संगठन और सामाजिक संगठन उन सुबकियों को सुन पा रहा है ….

जो बच्चें अनाथ है…बेघर है ….असहाय ,ऐसे बच्चों के प्रति ,दया,करूणा ,सहानुभूति ,उदारता प्रकट करने और आर्थिक सहायता देने वाले कई संगठन मिल जायेंगे लेकिन उन बच्चों के पास कौन जायेंगा जिनके माता-पिता है और आर्थिक रूप से संपन्न है …सभा –सोसाइटी में प्रबुद्ध समझे जाते है किन्तु स्वयं के अधूरे सपनों को अपनी संतान के माध्यम से पूरा करने के लिए बच्चों का बचपन छीन रहे है ?

यह पीड़ा –

पीड़ा यूक्रेन के बच्चों की भी है

और ….

माता-पिता के होते हुए भी कमरे  में बंद बच्चे की भी   

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