12 cbse/hindi/Antra /Chapter -9 /ghananand ke kavitta/ghananand/ Question Answer
ghananand ke kavitta Class 12 question answer is an important chapter from CBSE Hindi Antra Chapter 8written by ghananand
ghananand ke kavitta-ghananand-summary
Chapter -9 /ghananand ke kavittaमें संकलित ghananand द्वारा रचित दोनों कवित्त प्रेम और विरह की कोमल भावनाओं का अत्यंत संवेदनशील और हृदयस्पर्शी चित्र प्रस्तुत करते हैं। इन कवित्तों के माध्यम से कवि ghananad ने अपने अंतर्मन की पीड़ा, प्रेम की गहराई और प्रिय के प्रति अटूट समर्पण को अत्यंत सजीव रूप में अभिव्यक्त किया है। पाठक इन रचनाओं को पढ़ते हुए सहज ही कवि ghananad की मानसिक अवस्था और भावनात्मक संघर्ष से जुड़ जाता है।
Chapter -9 /ghananand ke kavitta के प्रथम कवित्त में कवि ghananad अपनी प्रेयसी सुजान को संबोधित करते हुए अपने हृदय में उठ रही तीव्र व्याकुलता को व्यक्त करता है। प्रिय से बिछुड़ने के कारण उसका मन अत्यंत अशांत और बेचैन हो गया है। उसका प्रेम केवल भावनात्मक आकर्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्ण समर्पण और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक है। वह अपनी प्रेयसी के एक दर्शन मात्र के लिए तड़प रहा है। उसके लिए प्रिय का मुख-दर्शन ही जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन गया है।
कवि ghananad का मानना है कि उसके प्राण उसी आशा के सहारे टिके हुए हैं कि एक दिन उसकी प्रेयसी उसे अवश्य दर्शन देगी। यही आशा उसके जीवन को गति प्रदान करती है और उसे जीवित रहने की शक्ति देती है। यदि यह आशा समाप्त हो जाए, तो मानो उसका अस्तित्व ही व्यर्थ हो जाए। इस प्रकार प्रथम कवित्त में प्रेम की तीव्रता, विरह की पीड़ा और प्रिय-दर्शन की उत्कट लालसा को अत्यंत मार्मिक और प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
Chapter -9 /ghananand ke kavittaके द्वितीय कवित्त में कवि ghananad अपनी प्रेयसी से पुनः मिलने की विनम्र और करुण प्रार्थना करता है। वह अत्यंत नम्रता के साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए आशा प्रकट करता है कि कभी न कभी उसकी पीड़ाभरी पुकार उसके प्रिय तक अवश्य पहुँचेगी। उसे विश्वास है कि एक दिन उसकी प्रेयसी अपने मन की कठोरता और संकोच को त्यागकर उससे मिलने के लिए स्वयं आगे आएगी।
इस कवित्त में कवि ghananad की आशा, प्रतीक्षा और आत्मसंयम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह निराश नहीं होता, बल्कि धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करता रहता है। उसके प्रेम में धैर्य, विश्वास और समर्पण की भावना प्रमुख है। विरह की वेदना उसे भीतर से व्यथित अवश्य करती है, परंतु वह अपनी आशा को कभी टूटने नहीं देता।
इस प्रकार ghananad के दोनों कवित्त प्रेम की सच्चाई, विरह की गहराई और प्रेमी की भावनात्मक दृढ़ता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं। इन रचनाओं में केवल व्यक्तिगत पीड़ा का चित्रण नहीं है, बल्कि मानवीय प्रेम की उस उच्च अवस्था का भी वर्णन है, जहाँ प्रेम त्याग, धैर्य और पूर्ण समर्पण का रूप धारण कर लेता है। यही विशेषता घनानंद के कवित्तों को भावपूर्ण, जीवंत और कालजयी बनाती है।
ghananand ke kavitta/ghananand/ Chapter -9 / Question Answer
प्रश्न 1.
कवि ने ‘चाहत चलन ये सँदेसो ले सुजान को’ क्यों कहा है ?
उत्तर :
कवि की प्रेयसी का नाम सुजान है, जिससे वह गहन प्रेम करता है। वह उससे मिलना चाहता है, किंतु सुजान उससे मिलने को तैयार नहीं है। कवि द्वारा भेजे गए संदेश वह ग्रहण तो कर लेती है, परंतु उनका कोई उत्तर नहीं देती। इस उपेक्षा के कारण कवि की दशा अत्यंत दयनीय हो गई है। वह स्वयं को मरणासन्न अनुभव करता है और उसे लगता है कि उसके प्राण कभी भी निकल सकते हैं। वह सुजान तक यह संदेश पहुँचाना चाहता है कि उसके दर्शन की अभिलाषा में ही उसके प्राण अब तक अटके हुए हैं; अतः वह एक बार आकर उसे दर्शन दे, ताकि उसका जीवन बच सके।
प्रश्न 2.
कवि मौन होकर प्रेमिका के कौन-से प्रण पालन को देखना चाहता है ?
उत्तर :
प्रेयसी के न मिलने से कवि अत्यंत व्याकुल है। वह उसके वचनों और संकेतों को जान-बूझकर अनसुना कर देती है। अब कवि ने यह निश्चय किया है कि वह मुख से मौन रहेगा और हृदय से ही उसे पुकारेगा। वह देखना चाहता है कि उसकी यह खामोशी और अंतःकरण की पुकार उसकी प्रेयसी पर क्या प्रभाव डालती है। वह यह भी जानना चाहता है कि सुजान कब तक उससे न बोलने की अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रह पाएगी। कवि को दृढ़ विश्वास है कि अंततः उसके हृदय की सच्ची पुकार उसे बोलने के लिए विवश कर देगी।
प्रश्न 3.
कवि ने किस प्रकार की पुकार से ‘कान खोलिहै’ की बात कही है ?
उत्तर :
कवि बार-बार अपनी प्रेयसी को पुकार-पुकारकर थक चुका है, किंतु उसे कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता। सुजान उसकी बातों को सुनकर भी अनसुना कर देती है। अब कवि ने निश्चय कर लिया है कि वह बाह्य रूप से पूर्णतः मौन रहेगा, किंतु उसका हृदय निरंतर उसे पुकारता रहेगा। उसे यह अटूट विश्वास है कि एक दिन उसकी निष्कपट और सच्ची हृदय-पुकार अवश्य ही सुजान के कानों तक पहुँचेगी और वह उसके प्रेम की वेदना को समझने के लिए विवश हो जाएगी।
प्रश्न 4.
घनानंद की रचनाओं की भाषिक विशेषताओं को अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर :
घनानंद का भाषा पर अद्भुत और सशक्त अधिकार था। उनकी रचनाओं में ब्रजभाषा की प्रधानता है, जिसमें कोमलकांत पदावली तथा भावों के अनुरूप सटीक शब्द-चयन सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी—सभी प्रकार के शब्दों का अवसरानुकूल प्रयोग किया है, जैसे—लोचन, पोष, दोष, छबीले, पयान, आरसी आदि। यथास्थान सूक्तियों, मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी उनकी भाषा को प्रभावशाली बनाता है।
घनानंद की काव्य-भाषा में लाक्षणिकता, ध्वन्यात्मकता और चित्रात्मकता का सुंदर समन्वय मिलता है। उनके काव्य में विरह का विशेष आग्रह होने के कारण उनकी शब्दावली माधुर्य-गुण से परिपूर्ण हो गई है। शब्दालंकारों का चमत्कार उनकी रचनाओं में सर्वत्र दिखाई देता है। कवित्त, सवैया और धनाक्षरी जैसे छंदों में रचित होने के कारण उनकी रचनाएँ अत्यंत गेय और भावप्रवण बन पड़ी हैं।
प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कीजिए –
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दैं दैं सनमान को।
उत्तर- पुनरुक्तिप्रकाश और वक्रोक्ति
(ख) कूक भरी मूकता बुलाय आप बोलि है।
उत्तर- विरोधाभास और अनुप्रास
(ग) अब न घिरत घन आनँद निदान को।
उत्तर- अनुप्रास और श्लेष।
प्रश्न 6.
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) बहुत दिनान को अवधि आसपास परे/खरे अरबरनि भरे हैं उठि जान को।
उत्तर : अब जब यह बोध होने लगा है कि मृत्यु का क्षण समीप आ पहुँचा है, तो मन अत्यंत व्याकुल और विचलित हो उठता है। जीवन के समाप्त होने की आशंका हृदय को अस्थिर कर देती है और भीतर गहरी बेचैनी भर जाती है।
(ख) मौन हू सौं देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू/कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।
उत्तर : अब प्रेमी ने मौन धारण कर यह देखने का निश्चय किया है कि उसके हृदय की मूक पुकार सुनकर भी प्रेमिका कब तक न बोलने की अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रह पाती है। उसे दृढ़ विश्वास है कि उसके प्रेम से भरे हृदय की यह निःशब्द पुकार अंततः उसे स्वयं ही बोलने के लिए विवश कर देगी।
(ग) तब तौ छबि पीवत जीवत हे, अब सोचन लोचन जात जरे।
उत्तर : संयोग के दिनों में प्रेमी प्रेमिका के सौंदर्य का नेत्रों से पान करता हुआ आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता था। वे क्षण उल्लास और सुख से भरे हुए थे। किंतु अब वियोग की अवस्था में वही नेत्र विरह की अग्नि में जलते हुए पीड़ा सह रहे हैं। जो अनुभूतियाँ कभी सुखद थीं, वही वियोग के कारण दुःखद बन गई हैं। संयोग की मधुर स्मृतियाँ अब पीड़ा का कारण बन गई हैं।
(घ) सो घनआनँद जान अजान लौं दूक कियौ पर बाँचि न देख्यौ।
उत्तर : प्रेमी ने अपने हृदय की समस्त प्रेम-भावनाओं को उँडेलकर प्रेमिका के नाम एक पत्र लिखा था, किंतु प्रेमिका ने उसे पढ़ने के बजाय फाड़कर फेंक दिया। इससे प्रेमी के मन को गहरा आघात पहुँचा और उसकी वेदना और बढ़ गई।
(ङ) तब हार पहार से लागत हे, अब आनि कै बीच पहार परे।
उत्तर : संयोग के समय प्रेम-क्रीड़ा के क्षणों में प्रेमिका के गले का हार प्रेमी को पर्वत के समान विशाल और प्रभावशाली प्रतीत होता था, किंतु अब वियोग की स्थिति में प्रेमी और प्रेमिका के बीच वही वियोग पर्वत की भाँति अडिग होकर खड़ा हो गया है, जिसे पार कर पाना असंभव प्रतीत होता है।
प्रश्न 7.
संदर्भ संहित व्याख्या कीजिए –
(क) झूठी बतियानि की पत्यानि तें उदास हूवै, कै चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।
(ख) जान घनआनँद यों मोहिं तुम्हे पैज परी
(ग) तब तौ छबि पीवत जीवन हे विलात महा दुख दोष भेरे।
(घ) ऐसो हियौ हित पत्र पवित्र दूक कियौ पर बाँचि न देख्यौ।
उत्तर : उत्तर के लिए इस पाठ का सप्रसंग व्याख्या भाग देखिए।
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परीक्षोपयोगी अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न –
प्रश्न 1.
घनानंद के काव्य में प्रेमानुभूति का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
घनानंद के काव्य में प्रेमानुभूति का चित्रण अत्यंत गहन, स्वाभाविक और आत्मानुभूतिजन्य है। उनके प्रेम का स्वरूप एकांतिक, निष्कपट और आजीवन समर्पित है। उनके काव्य में संयोग के क्षण मादकता, उल्लास और भावनात्मक तृप्ति से भरपूर हैं, जो सहृदय पाठक को भी आनंद-विभोर कर देते हैं।
घनानंद के प्रेम का लौकिक आधार ‘सुजान’ नामक नायिका है। लौकिक प्रेम में असफलता मिलने के पश्चात उन्होंने अपने प्रेम-भाव को भगवान श्रीकृष्ण में रूपांतरित कर दिया। उनके प्रेम में किसी प्रकार का छल, चातुर्य या स्वार्थ नहीं है। नायिका द्वारा उपेक्षित और ठगे जाने के बाद भी उन्होंने मृत्यु-पर्यंत मन-ही-मन उसी से प्रेम बनाए रखा, क्योंकि वे प्रेम में सयानापन को हेय मानते थे। उनका प्रेम स्वाभाविक, आत्मिक और पूर्णतः निष्कलंक है।
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प्रश्न 2.
घनानंद की भक्ति-भावना का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर :
घनानंद की भक्ति-भावना प्रेम से उद्भूत और सात्त्विक स्वरूप की है। लौकिक प्रेम में धोखा खाने के पश्चात उनका हृदय अलौकिक प्रेम की ओर उन्मुख हो गया। सुजान से विरक्त होकर वे वृंदावन में निवास करने लगे, जहाँ उनका प्रेम भक्तिरूप में परिणत हो गया।
यद्यपि उनके हृदय में ‘सुजान’ का नाम बना रहा, किंतु वही नाम धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के रूप में उनके भक्ति-आलंबन में परिवर्तित हो गया। उन्होंने सांसारिक संबंधों से विरक्ति ग्रहण कर एकमात्र कृष्णचंद्र को अपना सर्वस्व मान लिया। इस प्रकार लौकिक नायिका की प्रीति दिव्य आत्मा की प्रेम-डोरी में बँधकर शुद्ध भक्ति का रूप धारण कर लेती है।
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प्रश्न 3.
घनानंद के काव्य में विरह का क्या स्थान है?
उत्तर :
घनानंद के काव्य में विरह का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और केंद्रीय है। यद्यपि उनके काव्य में संयोग का हर्ष और आनंद भी विद्यमान है, परंतु विरह की तीव्रता और गहराई संयोग से कहीं अधिक प्रभावशाली है। वास्तव में घनानंद को विरह का कवि कहा जाए तो अनुचित न होगा।
सुजान का वियोग उनके लिए पीड़ा के साथ-साथ साधना का माध्यम बन गया। इसी विरह-वेदना ने उनके प्रेम को अमरता प्रदान की। उनके काव्य में विरह केवल शोक नहीं, बल्कि आत्मानुभूति की कसौटी है। उनके संयोग में भी वियोग की छाया विद्यमान रहती है। उनका प्रेम स्थूल न होकर सूक्ष्म, पवित्र और दिव्य है—जिसमें कामवासना नहीं, बल्कि आत्मिक तन्मयता है। यही विरहानुभूति उनके काव्य को विशिष्ट बनाती है।
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प्रश्न 4.
घनानंद के काव्य में प्रेममार्ग में आने वाली बाधाओं का चित्रण किस प्रकार किया गया है?
उत्तर :
घनानंद प्रेम के सच्चे साधक और अनन्य उपासक थे। उनके काव्य में प्रेममार्ग अत्यंत कठिन, कष्टसाध्य और त्यागपूर्ण रूप में प्रस्तुत हुआ है। वे प्रेम के लिए किसी भी प्रकार के दुःख, यातना और अपमान को सहने के लिए तैयार रहते हैं।
यदि प्रिय निर्दयी होकर उपेक्षा करता है, तब भी घनानंद उसके हृदय में दया जाग्रत करने की आशा नहीं छोड़ते। वे स्वयं को आशा की रस्सी से बाँधकर प्रेम-सागर में डूबने को तत्पर दिखाई देते हैं। विरह की अग्नि में जलना, असह्य यातनाएँ सहना, यहाँ तक कि प्राण-त्याग के लिए भी प्रस्तुत रहना—यह सब उनके प्रेम की गहराई और निष्ठा को प्रकट करता है।
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प्रश्न 5.
घनानंद के काव्य में प्रकृति-चित्रण की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर :
घनानंद के काव्य में प्रकृति-चित्रण अत्यंत कोमल, भावप्रधान और संवेदनशील है। वे सच्चे प्रकृति-प्रेमी थे और वृंदावन तथा ब्रज-प्रदेश की प्रकृति के साथ उनका गहन साहचर्य रहा। उनके काव्य में प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि भावनाओं की संवाहिका बन जाती है।
उन्होंने प्रकृति के आलंबन रूप की अपेक्षा उद्दीपन रूप का अधिक प्रभावी चित्रण किया है। विरह की प्रधानता के कारण प्रकृति के तत्व—विशेषतः वायु—विरहिणी के दुःख को और तीव्र कर देते हैं। वे वायु से निवेदन करते हैं कि वह निर्मोही प्रिय के चरणों की धूल लाकर दे, जिससे उसे नेत्रों में लगाकर विरह-व्यथा कुछ शांत हो सके। इस प्रकार प्रकृति घनानंद के काव्य में मानवीय संवेदना से युक्त होकर जीवंत हो उठती है।
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प्रश्न 6.
घनानंद के काव्य में संयोग शृंगार की अपेक्षा वियोग शृंगार का अनूठा चित्रण हुआ है—स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
घनानंद प्रेम और शृंगार के कवि हैं, किंतु उनके काव्य में संयोग शृंगार की तुलना में वियोग शृंगार का चित्रण अधिक गहन, मार्मिक और प्रभावशाली रूप में हुआ है। संयोग शृंगार में जहाँ मधुरता और उल्लास है, वहीं वियोग शृंगार में अनुभूति की तीव्रता, भावों की गहराई और आत्मसंघर्ष की वेदना दिखाई देती है।
इसका मुख्य कारण यह है कि घनानंद का स्वयं का जीवन वियोग की अग्नि में तपता रहा। वे आजीवन विरह-वेदना से ग्रस्त रहे और उसी व्यक्तिगत अनुभूति ने उनके काव्य को प्रामाणिकता प्रदान की। इसलिए उनके वियोग-चित्रण में जो वक्रता, करुणा और संवेदनशीलता है, वह संयोग-वर्णन में अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। इसी कारण घनानंद के काव्य में वियोग शृंगार का चित्रण अनूठा और विशिष्ट माना जाता है।
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प्रश्न 7.
घनानंद ने संयोग और वियोग अवस्था में क्या अंतर बताया है?
उत्तर :
घनानंद ने संयोग और वियोग—दोनों अवस्थाओं के अंतर को अत्यंत मार्मिक ढंग से स्पष्ट किया है। उनके अनुसार संयोग की अवस्था में प्रेमी नेत्रों द्वारा प्रिय के सौंदर्य-रूपी अमृत का पान करता है और प्राण प्रेम से पुष्ट होकर आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।
इसके विपरीत वियोग अवस्था में वही नेत्र विरह-शोक की अग्नि में जलते रहते हैं और प्राण दुःख, पीड़ा तथा क्लेश से भरकर तड़पने लगते हैं। संयोग जीवन को सुखमय बनाता है, जबकि वियोग जीवन को कष्टमय और असह्य बना देता है। यही संयोग और वियोग का मूलभूत अंतर है।
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प्रश्न 8.
सुजान को लिखे गए ‘हितपत्र’ की विशेषता बताते हुए लिखिए कि उसने पत्र का क्या किया और क्यों?
उत्तर :
घनानंद द्वारा सुजान को लिखा गया ‘हितपत्र’ साधारण पत्र नहीं, बल्कि कवि के हृदय का संपूर्ण प्रेम-भाव था। उस पत्र में कवि ने अपने हृदय को ही पत्र के रूप में प्रस्तुत किया था—जो पूर्ण प्रेम, निष्ठा और पवित्र भावनाओं से युक्त था। उसमें किसी अन्य का कोई उल्लेख नहीं था, केवल सुजान के प्रति समर्पण और गुणगान था।
कवि ने अत्यंत परिश्रम और प्रेमपूर्वक यह पत्र लिखा था, किंतु सुजान ने उस पत्र को बिना पढ़े ही अज्ञानवश फाड़कर फेंक दिया। उसकी इस निष्ठुरता से कवि अत्यंत दुःखी हो गया। कवि को इस बात का गहरा संताप है कि जिस पत्र में उसका संपूर्ण हृदय समाया हुआ था, उसे समझने का प्रयास भी नहीं किया गया।
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प्रश्न 9.
घनानंद के काव्य में सौंदर्य-चित्रण पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर :
घनानंद के काव्य में सौंदर्य-चित्रण अत्यंत मनोहारी, सजीव और भावप्रवण है। उन्होंने अपनी प्राण-प्रिया ‘अलवेली सुजान’ के रूप-सौंदर्य को अत्यधिक माधुर्य के साथ प्रस्तुत किया है। उनके सौंदर्य-वर्णन में अंग-प्रत्यंग का अलग-अलग विश्लेषण कम और संपूर्ण व्यक्तित्व की रमणीयता अधिक दिखाई देती है।
सुजान का रूप, लावण्य, यौवन, कांति और अंग-दीप्ति घनानंद के काव्य में मानो साकार हो उठते हैं। उनके सौंदर्य-चित्रों में संश्लिष्टता, मादकता, अतिशयता और गहन भाव-प्रेषणीयता विद्यमान है। यही विशेषताएँ उनके सौंदर्य-चित्रण को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती हैं।
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प्रश्न 10.
प्रिय सुजान के बिना घनानंद की स्थिति का चित्रण कीजिए।
उत्तर :
प्रिय सुजान के बिना घनानंद की स्थिति अत्यंत दयनीय और करुण हो गई है। संयोग की अवस्था में वे प्रिय के सौंदर्य-रूपी सुधा का पान करते हुए आनंदपूर्वक जीवन जी रहे थे, किंतु वियोग में वही नेत्र विरह-शोक की अग्नि में जलने लगे हैं।
पहले प्रिय के प्रेम से पुष्ट प्राण अब दुःख और क्लेश से भरकर तड़प रहे हैं। सुख के सभी साधन नष्ट हो चुके हैं और अपने भी पराए-से प्रतीत होने लगे हैं। संयोग में जो छोटी-सी बाधा भी पहाड़ जैसी लगती थी, वियोग में वही वास्तविक पहाड़ बनकर दोनों के बीच खड़ा हो गया है। इस प्रकार संयोग की सुखद स्थितियाँ वियोग में दुखद बन गई हैं।
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प्रश्न 11.
प्रथम सवैये के आधार पर बताइए कि प्राण पहले कैसे पल रहे थे और अब क्यों दुखी हैं?
उत्तर :
प्रथम सवैये के अनुसार पहले संयोग की अवस्था थी, जब प्रेमी-प्रेमिका साथ-साथ रहते थे। वे एक-दूसरे के सौंदर्य का रसास्वादन करते हुए प्रेम से पोषित और संतुष्ट जीवन जी रहे थे। चारों ओर सुख और आनंद के साधन विद्यमान थे तथा प्रेम-क्रीड़ा में कोई बाधा नहीं थी।
अब वियोग की अवस्था आ गई है। प्रेमी-प्रेमिका बिछुड़ चुके हैं। इस वियोग में नेत्र शोकाग्नि में जल रहे हैं, सुख के सभी साधन नष्ट हो गए हैं और दोनों के बीच वियोग-रूपी पहाड़ आ खड़ा हुआ है। इस प्रकार संयोग की घड़ियाँ जहाँ सुखद थीं, वहीं वियोग के पल अत्यंत दुखद बन गए हैं।
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