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12 cbse/hindi/antara/ Chapter 1- dev sena ka geet-jay shaker prasad( देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत-जय शंकर प्रसाद)

January 30, 2026
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12 cbse board परीक्षा में  hindi विषय के अंतर्गत hindi elective के लिए 12 cbse board  द्वारा निर्धारित hindi book  (antara) का अध्ययन करनेवाले शिक्षार्थियों !

12 cbse/hindi/antara/ Chapter 1- dev sena ka geetjay shaker prasad( देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीतजय शंकर प्रसाद) के काव्य खंड से पूछे जानेवाले प्रश्नों का संकलन ( कविता का मूल ,काव्यांश का भावार्थ ,काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न -(MCQ )आपकी परीक्षा तैयारी हेतु प्रस्तुत है .

इस भाग में 12 cbse/hindi/antara/ Chapter 1- dev sena ka geet-jay shaker prasad( देवसेना का गीत, कार्नेलिया का गीत-जय शंकर प्रसाद) केअंतर्गत कविता का मूल भाव ,व्याख्या तथा काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है .

काव्यांश को तीन भागों में बांटा गया है –(अ)(ब)(स),

अ -भाग में कविता का मूल भाव दिया गया है

ब -भाग में काव्यांश का भावार्थ -व्याख्या दी गई है .

स-भाग में काव्यांश से परीक्षोपयोगी संभावित बहु विकल्पीय प्रश्न (MCQ)दिए गए है

यहाँ पर काव्य खंड के chapter-1 dev sena ka geet (देवसेना का गीत )-jay shaker prasad (जय शंकर प्रसाद ) के  Question -Answer(प्रश्न-उत्तर ) इस प्रकार से तैयार किये गए है जो परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं  , तीनों भागो को ध्यानपूर्वक पढ़ लेने के पश्चात् आपकी सम्पूर्ण पाठ की तैयारी हो जाएगी.

कविता का प्रतिपाद्य  

‘देवसेना का गीत’ जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक *स्कंदगुप्त* से लिया गया है। इस कविता में देवसेना के जीवन की पीड़ा, त्याग और अंतर्मन के संघर्ष का मार्मिक चित्रण किया गया है। देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन थी, जिनका पूरा परिवार हूणों के आक्रमण में नष्ट हो गया। इस भीषण विपत्ति के बाद भी देवसेना जीवित रहकर राष्ट्र-सेवा में स्वयं को समर्पित कर देती है।

देवसेना स्कंदगुप्त से प्रेम करती है, पर स्कंदगुप्त का मन विजया की ओर आकर्षित रहता है। जीवन के अंतिम चरण में स्कंदगुप्त देवसेना से विवाह का प्रस्ताव रखता है, किंतु देवसेना उसे स्वीकार नहीं करती। वह अपने व्यक्तिगत सुख और कोमल भावनाओं का त्याग कर देती है। इसी त्याग और वेदना की अभिव्यक्ति उसके गीत ‘आह! वेदना मिली विदाई!’ में होती है।

अपने जीवन की संध्यावस्था में देवसेना अपने यौवन और प्रेम को भ्रमवश हुई भूल मानती है। बीते दिनों की नादानियों को याद कर उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो जीवन-यात्रा में थका हुआ पथिक स्वप्न में भी विरह का गीत सुन रहा हो। उसे लगता है कि उसने जीवन की सारी पूँजी लुटा दी है। निरंतर संघर्ष करते-करते वह इतनी करुणा और पीड़ा से भर गई है कि अब उसे सँभाल पाना कठिन हो गया है, इसलिए वह चाहती है कि संसार उससे यह करुणा वापस ले ले।

देवसेना का गीत -सप्रसंग व्याख्या

1 .

आहा! वेदना मिली विदाई!

मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे संध्या के श्रमकण,

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी-

नीरवता अनंत अँगड़ाई।

 (i) व्याख्या

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गए करुण गीत **‘आह! वेदना मिली विदाई!’** से उद्धृत हैं। इस गीत के माध्यम से देवसेना अपने जीवन की समस्त साधना, प्रेम और आत्मिक समर्पण को अपने प्रिय के चरणों में अर्पित कर देती है। वह अपने भावी जीवन के सुख, आशा और आकांक्षाओं से विरक्ति लेते हुए विदा का यह गीत गाती है, जिसमें त्याग, पीड़ा और आत्मबलिदान की गहन अनुभूति निहित है।

व्याख्या -देवसेना अपने हृदय में संचित वेदना को स्वर देती हुई कहती है कि उसका दुर्भाग्य कितना गहन है कि विदाई की इस घड़ी में भी उसे केवल पीड़ा ही प्राप्त हुई है। जीवन भर जिन कोमल भावनाओं को उसने कठिन साधना और संयम के साथ अपने हृदय में सँजोकर रखा, आज उन्हें भी वह भिक्षा-भाव से लुटा रही है। इस करुण विदाई के क्षण में संध्या भी मानो दिनभर के श्रम का बहाना बनाकर अश्रु बहा रही है। जुदाई की पीड़ा इतनी गहन है कि प्रकृति भी मानवीय भाव ग्रहण कर शोक में डूबी प्रतीत होती है।

इस यात्रा के समय चारों ओर एक गहन निस्तब्धता व्याप्त है। वातावरण में ऐसी रहस्यमयी शांति है जिसका कोई ओर-छोर दिखाई नहीं देता। ऐसा प्रतीत होता है मानो मौन स्वयं सजीव होकर अंगड़ाइयाँ ले रहा हो। इस प्रकार देवसेना की आंतरिक पीड़ा केवल व्यक्तिगत दुःख न रहकर संपूर्ण प्रकृति और परिवेश में व्याप्त हो जाती है, जिससे उसका त्याग और विरह और भी मार्मिक रूप में उभरकर सामने आता है।

विशेष-

* देवसेना के हृदय की वेदना अत्यंत सजीव और करुण रूप में अभिव्यक्त हुई है।

* भाषा तत्सम प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* उपमा, अनुप्रास एवं मानवीकरण अलंकारों का प्रभावी प्रयोग हुआ है।

* छायावादी काव्य की **विरह, निराशा और आत्मिक पीड़ा** का सशक्त चित्रण मिलता है।

(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** देवसेना के गीत का मूल भाव क्या है?

(क) विजय और उत्सव

(ख) प्रेम-प्राप्ति की आकांक्षा

(ग) त्याग, वेदना और विदाई

(घ) संघर्ष और प्रतिशोध

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** देवसेना किन भावनाओं से विदा ले रही है?

(क) क्रोध और प्रतिहिंसा से

(ख) सुख, आशा और आकांक्षाओं से

(ग) साहस और पराक्रम से

(घ) वैभव और ऐश्वर्य से

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 3.** संध्या को अश्रु बहाती हुई दिखाना किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) मानवीकरण

(घ) अनुप्रास

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** वातावरण में व्याप्त ‘खामोशी’ किस भाव को अभिव्यक्त करती है?

(क) उल्लास

(ख) भय

(ग) गहन शांति और विरह

(घ) उत्सुकता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में किस काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं?

(क) वीरगाथा काल

(ख) रीतिकाल

(ग) छायावाद

(घ) आधुनिकतावाद

**सही उत्तर :** (ग)

 (i) व्याख्या –काव्य भाग – “ब”

2

 श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,

गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनीदी श्रुति में किसने-

यह विछाग की तान उठाई।

लगी सतुष्ण दीठ थी सबकी,

रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह! बावली,

तूने खो दी सकल कमाई।

 (i) व्याख्या –

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाए गए करुण गीत **‘आह! वेदना मिली विदाई!’** से ली गई हैं। इस गीत के माध्यम से देवसेना अपने जीवन की साधना का समस्त फल अपने प्रिय के चरणों में अर्पित कर देती है और भावी जीवन के सुख, आशा तथा आकांक्षाओं से विरक्ति ग्रहण करते हुए अपनी अंतःपीड़ा को स्वर देती है।

व्याख्या -देवसेना अपने हृदय की गहन और तीव्र वेदना को शब्दों में ढालते हुए कहती है कि जीवन के स्वप्न भले ही थककर चूर हो गए हों, किंतु मोह की मधुरता अभी भी समाप्त नहीं हुई है। उसकी आसक्ति अब तक शिथिल नहीं पड़ी है। विदाई की इस बेला में भी कहीं किसी अनजाने पथिक ने ऊँघती-सी, अलसाई हुई वाणी में घने वन-प्रदेश में वृक्षों की छाया तले मधुर विदाई-गीत गा दिया है, जो उसके हृदय को और अधिक व्याकुल कर देता है।

वह आगे कहती है कि उसकी साधना के जिस फल पर न जाने कितनी लालायित दृष्टियाँ टिकी हुई थीं, उसे वह लंबे समय से सबकी कुटिल इच्छाओं से बचाती चली आ रही थी। किंतु इतने संघर्ष और संयम के बावजूद उसकी आशा पूर्ण नहीं हो सकी। अंततः जीवन में जो कुछ उसने तप, त्याग और साधना से अर्जित किया था, वह सब उसके हाथों से छिन गया। इस प्रकार उसका संपूर्ण जीवन एक असफल साधना और अधूरी कामना का प्रतीक बनकर रह गया है।

विशेष –

* देवसेना अपने जीवन में अर्जित प्रत्येक मूल्य को खो चुकी नारी के रूप में चित्रित हुई है।

* अतीत की स्मृतियाँ भी उसके लिए सुखद न होकर पीड़ादायक बन गई हैं।

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* छायावादी काव्य की **निराशा, करुणा और आत्मिक पीड़ा** का मार्मिक चित्रण मिलता है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** देवसेना के अनुसार स्वप्नों के थक जाने के बाद भी क्या शेष रह गया है?

(क) विरक्ति

(ख) मोह की मधुरता

(ग) क्रोध

(घ) उदासीनता

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 2.** घने वन-प्रदेश में गाया गया विदाई-गीत किस भाव को तीव्र करता है?

(क) उल्लास

(ख) आशा

(ग) करुणा और विरह

(घ) वीरता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** देवसेना अपनी साधना के फल को किससे बचाती रही?

(क) प्रकृति की बाधाओं से

(ख) शत्रुओं के आक्रमण से

(ग) लोगों की कुटिल इच्छाओं से

(घ) समय की गति से

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** ‘मैंने जीवन में जो कुछ भी कमाया था, वह सब खो दिया’ — इस कथन से कौन-सा भाव प्रकट होता है?

(क) संतोष

(ख) आत्मगौरव

(ग) पूर्ण निराशा

(घ) विद्रोह

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में प्रमुख रूप से किस काव्यधारा की विशेषता दिखाई देती है?

(क) रीतिकालीन शृंगार

(ख) वीरगाथात्मक चेतना

(ग) छायावादी दुखवाद

(घ) प्रगतिवादी यथार्थ

**सही उत्तर :** (ग)

 (i) व्याख्या

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित **‘देवसेना का गीत’** से उद्धृत हैं। यह गीत कवि के ऐतिहासिक नाटक *‘स्कंदगुप्त’* के पाँचवें अंक के छठे दृश्य में देवसेना द्वारा गाया गया है। इस गीत में देवसेना के हृदय में संचित समस्त वेदना, निराशा और आत्मसंघर्ष अत्यंत करुण रूप में अभिव्यक्त हो उठते हैं। यह गीत उसके टूटे हुए स्वप्नों और असफल साधना की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

**व्याख्या -देवसेना अपने अंतःकरण की गहन व्यथा को स्वर देते हुए कहती है कि अब उसके जीवन में विनाश के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रह गया है। उसका जीवन मानो प्रलय की छाया में आ गया है और जीवन-रूपी रथ के साथ प्रलय स्वयं सहयात्री बनकर चल रहा है। इसके बावजूद वह अपने दुर्बल और थके हुए चरणों से उसके साथ प्रतिस्पर्धा करती हुई आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है। यह उसके अदम्य आत्मबल और अंतःसंघर्ष का परिचायक है।

आगे वह इस निष्ठुर संसार को संबोधित करते हुए कहती है कि अब उसके हृदय से करुण रागिनी नहीं, बल्कि हाहाकार फूट पड़ा है। संसार ने उसे जो कुछ सौंपा था—सुख, आशा, विश्वास—उसे अब वह संभाल पाने में असमर्थ है। इसलिए वह संसार से निवेदन करती है कि अपनी वह अमानत उससे वापस ले ले। इन्हीं भारों के कारण वह अपने मन की लज्जा की रक्षा भी न कर सकी और सबके समक्ष उसे खो बैठी। इस प्रकार देवसेना का यह विलाप उसके जीवन की पूर्ण विफलता, आत्मग्लानि और गहन निराशा का प्रतीक बन जाता है।

विशेष –

* भाषा तत्सम-प्रधान, भावगर्भित एवं लाक्षणिक है।

* रूपक, अनुप्रास एवं पुनरुक्ति-प्रकाश अलंकारों का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

* छायावादी काव्य की **निराशा, आत्मसंघर्ष और करुणा** का सजीव चित्रण मिलता है।

* गीत में गेयता और भावात्मक प्रवाह स्पष्ट रूप से विद्यमान है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** देवसेना के अनुसार उसके जीवन में अब क्या शेष रह गया है?

(क) नवीन आशा

(ख) संघर्ष की विजय

(ग) प्रलय

(घ) संतोष

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** ‘जीवन-रूपी रथ पर प्रलय का साथ चलना’ किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) रूपक

(ग) अतिशयोक्ति

(घ) विरोधाभास

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 3.** देवसेना अपने दुर्बल पैरों से भी आगे बढ़ने का प्रयास क्यों करती है?

(क) संसार को चुनौती देने के लिए

(ख) अपने आत्मबल के कारण

(ग) विजय की आशा में

(घ) भय के कारण

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** ‘हृदय की करुण रागिनी का हाहाकार करना’ किस भाव को प्रकट करता है?

(क) उल्लास

(ख) क्रोध

(ग) गहन वेदना और निराशा

(घ) वीरता

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश में प्रमुख रूप से किस काव्यधारा की विशेषताएँ दिखाई देती हैं?

(क) रीतिकाल

(ख) वीरगाथा काल

(ग) छायावादी दुखवाद

(घ) प्रगतिवाद

**सही उत्तर :** (ग)

2- ‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद

 कविता का प्रतिपाद्य

‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक चंद्रगुप्त से लिया गया एक अत्यंत भावप्रवण और सौंदर्यपूर्ण गीत है। इस कविता के माध्यम से कवि ने भारत की प्राकृतिक समृद्धि, सांस्कृतिक उदात्तता और मानवीय करुणा को विदेशी दृष्टि से प्रस्तुत किया है। यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सैल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया जब भारत की भूमि का साक्षात्कार करती है, तो उसका हृदय इस देश के अनुपम सौंदर्य से अभिभूत हो उठता है और उसी आत्मिक अनुभूति से यह गीत उसके मुख से सहज रूप में प्रस्फुटित हो जाता है।

कार्नेलिया भारत को मधुरता से परिपूर्ण देश के रूप में देखती है, जहाँ प्रेम, राग और अपनत्व जीवन के मूल स्वर हैं। उसके अनुसार भारत वह पुण्यभूमि है जहाँ अपरिचित व्यक्ति भी अतिथि बनकर सम्मान और आश्रय प्राप्त करता है। यहाँ की प्रकृति सजीव और गतिशील प्रतीत होती है—वृक्षों की ऊँची शिखाएँ मानो नृत्यरत हों और कमल की स्वर्णिम पंखुड़ियों के समान कोमल पक्षी वृक्षों की सुंदर शाखाओं पर क्रीड़ा करते दिखाई देते हैं।

रंग-बिरंगे पंखों वाले पक्षी इंद्रधनुष की भाँति अपने पंख फैलाकर शीतल और मंद पवन के सहारे उड़ते हुए इस देश को अपना स्थायी विश्राम-स्थल मान लेते हैं। इस देश की विशेषता केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के जन-मानस में करुणा, संवेदना और मानवता की भावना गहराई से व्याप्त है।

प्रातःकाल का दृश्य अत्यंत रमणीय है—जब रात्रि भर जागने के कारण तारे ऊँघने लगते हैं, तब उषा रूपी सुंदरी सूर्य रूपी स्वर्ण कलश से भारत की धरती पर सुख, प्रकाश और सौंदर्य की वर्षा करती प्रतीत होती है। इस प्रकार ‘कार्नेलिया का गीत’ भारत की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और मानवीय महिमा का भावनात्मक और काव्यात्मक चित्र प्रस्तुत करता है।

***

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** ‘कार्नेलिया का गीत’ किस नाटक से लिया गया है?

(क) स्कंदगुप्त

(ख) कामायनी

(ग) चंद्रगुप्त

(घ) ध्रुवस्वामिनी

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** कार्नेलिया भारत-भूमि से क्यों मुग्ध हो जाती है?

(क) राजनीतिक शक्ति के कारण

(ख) सैन्य वैभव के कारण

(ग) प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा के कारण

(घ) व्यापारिक समृद्धि के कारण

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** ‘लघु सुरधनु-से’ किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) रूपक

(ख) उपमा

(ग) अनुप्रास

(घ) उत्प्रेक्षा

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** ‘अरुणोदय’ का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

(क) युद्ध की शुरुआत

(ख) प्रकृति का सौंदर्य

(ग) ज्ञान और चेतना का प्रकाश

(घ) समय की गति

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** पक्षियों का भारत की ओर उड़ना किस तथ्य का संकेत देता है?

(क) प्राकृतिक परिवर्तन का

(ख) पश्चिमी देशों के लोगों के भारत आगमन का

(ग) ऋतु परिवर्तन का

(घ) कृषि समृद्धि का

**सही उत्तर :** (ख)

व्याख्या –

2.

 बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।

लहरें टकराती अनंत की-पाकर जहाँ किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती टुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा॥

 व्याख्या –

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता *‘कार्नेलिया का गीत’* से उद्धृत हैं, जो उनके प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक *‘चंद्रगुप्त’* का एक गीतात्मक अंश है। इस गीत के माध्यम से कार्नेलिया भारतवर्ष की महानता, मानवीय संवेदना और प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर उसकी महिमा का भावपूर्ण गुणगान करती है।

**व्याख्या -इन पंक्तियों में कार्नेलिया भारत की प्राकृतिक शोभा और मानवीय गुणों की प्रशंसा करते हुए कहती है कि यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की भाँति करुणा का जल भरा रहता है। इसका आशय यह है कि भारतवर्ष के जन-जन के हृदय में परस्पर प्रेम, सहानुभूति और करुणा की भावना सहज रूप से विद्यमान रहती है।

वह आगे कहती है कि इस देश में असीम आकाश में प्रवाहित होने वाली वायु-तरंगें मानो अपना किनारा पाकर शांत हो जाती हैं और चारों ओर शीतल, सुखद समीर बहती रहती है। यहाँ का वातावरण स्वाभाविक रूप से शांति और सौम्यता से परिपूर्ण है।

प्रातःकाल का दृश्य और भी मनोहारी है। रातभर जागते रहने के कारण तारे जब अलसाए हुए से ऊँघने लगते हैं, तब उषा रूपी सुंदरी स्वर्णिम घट लेकर प्रकट होती है और उसे जन-जीवन पर उँडेल देती है। तात्पर्य यह है कि उषा देवी सूर्यरूपी स्वर्ण-घट से प्रकाश, सुख, सौंदर्य और नवीन उत्साह का संचार करती है। इस प्रकार संपूर्ण प्रकृति जीवन, चेतना और आनंद से भर उठती है।

विशेष –

* भारतवर्ष के प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय करुणा का प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

* उषा और तारों का मानवीकरण कर प्रकृति को सजीव रूप प्रदान किया गया है।

* ‘हेम-कुंभ’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

* भाषा सहज, सरल, प्रवाहपूर्ण तथा नाटकीय प्रभाव से युक्त है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-MCQ

**प्रश्न 1.** कार्नेलिया के अनुसार भारतवासियों की आँखों में किस भाव का जल भरा रहता है?

(क) भय

(ख) करुणा और स्नेह

(ग) क्रोध

(घ) आश्चर्य

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 2.** ‘वायु-तरंगों का किनारा पाकर टकराना’ किस भाव का संकेत देता है?

(क) अशांति

(ख) संघर्ष

(ग) शांति और संतुलन

(घ) भय

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** उषा को ‘स्वर्ण-घट’ लेकर सुख उड़ेलती हुई दिखाना किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) मानवीकरण

(ग) रूपक

(घ) उत्प्रेक्षा

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** तारों का ऊँघना किस प्राकृतिक स्थिति का संकेत करता है?

(क) रात्रि का गहन अंधकार

(ख) संध्या समय

(ग) प्रभात का आगमन

(घ) वर्षा ऋतु

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश का मूल प्रतिपाद्य क्या है?

(क) भारत की राजनीतिक शक्ति

(ख) भारत का सैन्य वैभव

(ग) भारत का प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय संवेदना

(घ) भारत की आर्थिक समृद्धि

**सही उत्तर :** (ग)

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