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12cbse-antara-2- ‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद

January 12, 2026
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2- ‘कार्नेलिया का गीत’ जयशंकर प्रसाद

कार्नेलिया का गीत -सप्रसंग व्याख्या

1

अरुण ! यह मधुमय देश हमारा।

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।

छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुम कुम सारा ॥

लघु सुरधनु-से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँढ किए, समझ नीड़, निज प्यारा।

 (i) व्याख्या –

प्रसंग :प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक की *‘कार्नेलिया का गीत’* शीर्षक कविता से लिया गया है, जिसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। यह गीत उनके सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक *‘चंद्रगुप्त’* का एक महत्वपूर्ण अंश है। यूनान के सम्राट सिकंदर महान के उत्तराधिकारी सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया भारत-भूमि के सौंदर्य, गरिमा और सांस्कृतिक वैभव को देखकर अभिभूत हो जाती है। भारत की अनुपम प्राकृतिक शोभा और जीवनदायिनी संस्कृति उसके हृदय को इस प्रकार स्पर्श करती है कि उसके मुख से सहज ही यह प्रशस्ति-गीत फूट पड़ता है। इस गीत में भारत की प्राकृतिक छटा और सांस्कृतिक महानता का भावपूर्ण चित्रण किया गया है।

व्याख्या -कार्नेलिया भारतवर्ष की महिमा का वर्णन करते हुए कहती है कि यह देश अरुणिमा से आलोकित, प्रेम और माधुर्य से ओत-प्रोत है। यहाँ की धरती में ऐसा अपनापन और करुणा है कि पूर्णतः अपरिचित व्यक्ति को भी आश्रय और सुरक्षा प्राप्त होती है। भारत की प्रकृति में एक सहज आत्मीयता व्याप्त है।

वह आगे कहती है कि कमल के रसयुक्त पराग-कोशों पर वृक्षों की ऊँची चोटियों से उतरती सूर्य-किरणें इस प्रकार प्रतीत होती हैं मानो प्रकाश स्वयं नृत्य कर रहा हो। प्रातःकालीन सूर्य के उदय के साथ ही चारों ओर प्रकाश फैल जाता है, जिससे वृक्षों की कोमल शाखाएँ लहलहाने लगती हैं और कमल पुष्प जीवन-रस से भर उठते हैं।

हरे-भरे वृक्षों पर पड़ती सूर्य-किरणें ऐसी जान पड़ती हैं जैसे समस्त धरती पर मंगलमय कुमकुम बिखरा हुआ हो, जिससे जीवन और चेतना का संचार हो रहा हो। संपूर्ण प्रकृति सजीव, जाग्रत और आनंदमय प्रतीत होती है। इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगे पंखों वाले पक्षी शीतल पवन के सहारे उड़ते हुए इस भूमि को अपना प्रिय नीड़ समझते हैं। वे इसी दिशा में मुख किए, मंद-मंद बहती ठंडी हवा में उड़ते रहते हैं। इस प्रकार भारत की प्रकृति न केवल सुंदर है, बल्कि जीवन, प्रेम और आत्मीयता से परिपूर्ण भी है।

विशेष –

* भारत की प्रकृति को असीम सौंदर्य और जीवनदायिनी शक्ति का स्रोत बताया गया है।

* कविता में माधुर्य भाव एवं सौंदर्य चेतना प्रमुख है।

* कवि की राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक गौरव की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।

* ‘लघु सुरधनु-से’ में उपमा अलंकार का प्रयोग है।

* संपूर्ण गीत संगीतात्मकता से परिपूर्ण है; प्रत्येक पद से स्वर-लहरियाँ प्रवाहित होती प्रतीत होती हैं।

* गीत में प्रतीकात्मकता और लाक्षणिकता का सुंदर प्रयोग हुआ है।

 (ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न**

**प्रश्न 1.** ‘कार्नेलिया का गीत’ किस नाटक से लिया गया है?

(क) स्कंदगुप्त

(ख) कामायनी

(ग) चंद्रगुप्त

(घ) ध्रुवस्वामिनी

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 2.** कार्नेलिया भारत-भूमि से क्यों मुग्ध हो जाती है?

(क) राजनीतिक शक्ति के कारण

(ख) सैन्य वैभव के कारण

(ग) प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा के कारण

(घ) व्यापारिक समृद्धि के कारण

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** ‘लघु सुरधनु-से’ किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) रूपक

(ख) उपमा

(ग) अनुप्रास

(घ) उत्प्रेक्षा

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 4.** ‘अरुणोदय’ का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

(क) युद्ध की शुरुआत

(ख) प्रकृति का सौंदर्य

(ग) ज्ञान और चेतना का प्रकाश

(घ) समय की गति

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** पक्षियों का भारत की ओर उड़ना किस तथ्य का संकेत देता है?

(क) प्राकृतिक परिवर्तन का

(ख) पश्चिमी देशों के लोगों के भारत आगमन का

(ग) ऋतु परिवर्तन का

(घ) कृषि समृद्धि का

**सही उत्तर :** (ख)

व्याख्या –

प्रसंग :प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता *‘कार्नेलिया का गीत’* से उद्धृत हैं, जो उनके प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक *‘चंद्रगुप्त’* का एक गीतात्मक अंश है। इस गीत के माध्यम से कार्नेलिया भारतवर्ष की महानता, मानवीय संवेदना और प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर उसकी महिमा का भावपूर्ण गुणगान करती है।

**व्याख्या -इन पंक्तियों में कार्नेलिया भारत की प्राकृतिक शोभा और मानवीय गुणों की प्रशंसा करते हुए कहती है कि यहाँ के लोगों की आँखों में वर्षा ऋतु के बादलों की भाँति करुणा का जल भरा रहता है। इसका आशय यह है कि भारतवर्ष के जन-जन के हृदय में परस्पर प्रेम, सहानुभूति और करुणा की भावना सहज रूप से विद्यमान रहती है।

वह आगे कहती है कि इस देश में असीम आकाश में प्रवाहित होने वाली वायु-तरंगें मानो अपना किनारा पाकर शांत हो जाती हैं और चारों ओर शीतल, सुखद समीर बहती रहती है। यहाँ का वातावरण स्वाभाविक रूप से शांति और सौम्यता से परिपूर्ण है।

प्रातःकाल का दृश्य और भी मनोहारी है। रातभर जागते रहने के कारण तारे जब अलसाए हुए से ऊँघने लगते हैं, तब उषा रूपी सुंदरी स्वर्णिम घट लेकर प्रकट होती है और उसे जन-जीवन पर उँडेल देती है। तात्पर्य यह है कि उषा देवी सूर्यरूपी स्वर्ण-घट से प्रकाश, सुख, सौंदर्य और नवीन उत्साह का संचार करती है। इस प्रकार संपूर्ण प्रकृति जीवन, चेतना और आनंद से भर उठती है।

विशेष –

* भारतवर्ष के प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय करुणा का प्रभावशाली चित्रण हुआ है।

* उषा और तारों का मानवीकरण कर प्रकृति को सजीव रूप प्रदान किया गया है।

* ‘हेम-कुंभ’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।

* भाषा सहज, सरल, प्रवाहपूर्ण तथा नाटकीय प्रभाव से युक्त है।

(ii) व्याख्या पर आधारित बहु-विकल्पीय प्रश्न-

**प्रश्न 1.** कार्नेलिया के अनुसार भारतवासियों की आँखों में किस भाव का जल भरा रहता है?

(क) भय

(ख) करुणा और स्नेह

(ग) क्रोध

(घ) आश्चर्य

**सही उत्तर :** (ख)

**प्रश्न 2.** ‘वायु-तरंगों का किनारा पाकर टकराना’ किस भाव का संकेत देता है?

(क) अशांति

(ख) संघर्ष

(ग) शांति और संतुलन

(घ) भय

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 3.** उषा को ‘स्वर्ण-घट’ लेकर सुख उड़ेलती हुई दिखाना किस अलंकार का उदाहरण है?

(क) उपमा

(ख) मानवीकरण

(ग) रूपक

(घ) उत्प्रेक्षा

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 4.** तारों का ऊँघना किस प्राकृतिक स्थिति का संकेत करता है?

(क) रात्रि का गहन अंधकार

(ख) संध्या समय

(ग) प्रभात का आगमन

(घ) वर्षा ऋतु

**सही उत्तर :** (ग)

**प्रश्न 5.** इस काव्यांश का मूल प्रतिपाद्य क्या है?

(क) भारत की राजनीतिक शक्ति

(ख) भारत का सैन्य वैभव

(ग) भारत का प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय संवेदना

(घ) भारत की आर्थिक समृद्धि

**सही उत्तर :** (ग)

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