पुरूरवा- उर्वशी , रामधारीसिंह ‘दिनकर’
1.
कौन है अंकुश, इसे मैं भी नहीं पहचानता हूँ।
पर, सरोवर के किनारे कण्ठ में जो जल रही है,
उस तृषा, उस वेदना को जानता हूँ।
सिन्धु-सा उद्दाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है?
गूंजता जिस शक्ति का सर्वत्र जयजयकार,
उस अटल संकल्प का सम्बल कहाँ है?
यह शिला-सा वक्ष, ये चट्टान-सी मेरी भुजाएँ,
सूर्य के आलोक से दीपित, समुन्नत भाल,
मेरे प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है।
भावार्थ-: पुरूरवा अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए उर्वशी से कहते हैं कि मैं इस प्रतिबन्ध से अनजान हूँ, जो मुझे बार-बार रोकना चाहता है, लेकिन मैं इस तालाब के तट पर मेरे गले में जल रही पीड़ा और प्यास का पूरा अनुभव करता हूँ। मेरी वह असीम शक्ति, जो समुद्र के समान है, इस समय कहाँ चली गई? मैंने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को चारों ओर सराहा गया उस अडिग संकल्प का साथ मुझसे क्यों छूट गया?
पुरूरवा आगे कहते हैं कि मेरी छाती पत्थर और मेरी बाहे पत्थर की तरह दृढ़ है, चट्टान की तरह मजबूत हैं। सूर्य के प्रकाश के समान आभायुक्त रहने वाला मेरा मस्तक उन्नत है, मेरे मन की गहराई का पता लगाना मुश्किल है। मेरे जो बहुत गहरे प्राणों में समुद्र की तरह हर समय ऊँची-ऊँची लहरें उठती रहती हैं।
2.
सामने टिकते नहीं वनराज, पर्वत डोलते हैं,
काँपता है कुण्डली मारे समय का व्याल,
मेरी बाँह में मारुत, गरुड़ गजराज का बल है।
मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अन्ध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यन्दन चलाता हूँ।
भावार्थ- पुरूरवा उर्वशी से कहता है कि मेरी भुजाओं में इतनी ताकत है कि वन के राजा सिंह तक मेरा सामना नहीं कर सकता। मेरे सामने समयरूपी सर्प काँपता रहता है और पहाड़ मुझसे भय खाते हैं। मेरी गुजाओं में पवन, गरुड़ और हाथी सब का बल हैं।
पुरूरवा ने कहता है कि मेरा बल मानवता का परिचायक है और मैं मृत्युलोक में जीत का शंखनाद हूँ, समय को प्रकाशित करने वाला सूर्य हूँ, अन्धकार को मिटाने वाली ज्वालामुखी हूँ, मैं निर्बाध गति से कहीं भी जा सकता हूँ, मैं बादलों के मस्तक पर भी रथ हांक सकता हूँ।
3.
पर, न जानें बात क्या है!
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिला कर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता,
शक्ति के रहते हए निरुपाय हो जाता।।
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से,
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से।
भावार्थ: पुरूरवा उर्वशी से कहते हैं कि वे अब तक इस रहस्य का पता नहीं लगा सके कि जो महावीर रणभूमि में इन्द्र के वज्र का सामना करने से पीछे नहीं हटता है और शेर के साथ बाहें मिलाकर खेल सकता है, अर्थात् शेर और इन्द्र को भी परास्त कर सकता है, वह फूल-सी कोमल नारी के सामने क्यों विवश हो जाता है? वह इतना शक्तिशाली होने के बावजूद भी एक स्त्री के सामने असहाय क्यों हो जाता है? सचमुच आश्चर्यजनक है कि एक वीर पुरुष, जो पूरी दुनिया को अपनी वीरता से मुग्ध कर देता है , एक सुंदर स्त्री के नेत्ररूपी बाणों से आसानी से घायल हो जाता है। पुरुषों का अपना सर्वस्व खो देना और सुन्दरी की जरा-सी मुस्कान पर मुग्ध हो जाना क्या आश्चर्य की बात नहीं है?
उर्वशी -रामधारीसिंह ‘दिनकर’
1.
पर, क्या बोलूँ? क्या कहूँ?
भ्रान्ति यह देह-भाव।
मैं मनोदेश की वायु व्यग्र, व्याकुल, चंचल;
अवचेत प्राण की प्रभा, चेतना के जल में
मैं रूप-रंग-रस-गन्ध-पूर्ण साकार कमल।
भावार्थ: उर्वशी, पुरुरवा से अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं अपने मन की बात आपसे कैसे और क्या कहूँ? भावों के आवेश की वजह से उन सभी भावों और विचारों को व्यक्त करना असम्भव जा जान पड़ रहा है। शारीरिक बाह्य सौन्दर्य का अर्थ सिर्फ छल और दिखावा है । इसे पागलपन और उन्माद कहा जाना अतिश्योक्ति नहीं हो सकती । उर्वशी ने आगे कहा कि मैं सिर्फ काल्पनिक और मानसिक देश की उत्कण्ठा और बेचैनी से भरी पवन हूँ। मैं अवचेतन मन का प्रकाश हूँ और चेतना के जल में विकसित रसयुक्त सुगन्धित कमल का फूल हूँ।
2
मैं नहीं सिन्धु की सुताः।
तलातल-अतल-वितल-पाताल छोड़,
नील समुद्र को फोड़ शुभ्र, झलबल फेनांशकु में प्रदीप्त
नाचती ऊर्मियों के सिर पर
मैं नहीं महातल से निकली!
भावार्थ -मैं समुद्र की लहरों के मस्तक पर नाचती ,पाताल के गर्त को तिरस्कृत करके समुद्र के नीले रंग को छोड़कर प्रकाशमय फेन के महीन रेशमी कपड़े पहनकर प्रकट होनेवाली ,समुन्द्र पुत्री लक्ष्मी नहीं हूँ । इस प्रकार उर्वशी स्वयं का परिचय देते हुए पुरूरवा को जिज्ञासु बना रही है ।
3.
मैं नहीं गगन की लता
तारकों में पुलकिता फूलती हुई,
मैं नहीं व्योमपुर की बाला,
विधु की तनया, चन्द्रिका-संग,
पूर्णिमा-सिन्धु की परमोज्ज्वल आभा-तरंग,
मैं नहीं किरण के तारों पर झूलती हुई भू पर उतरी।
भावार्थ : मैं आकाश में तारों के बीच फलने-फूलने वाली लता नहीं, मैं व्योमपुर की सुन्दरी नहीं, मैं चाँदनी के साथ पृथ्वी पर उतरी चन्द्रमा की पुत्री नहीं, मैं पूर्णिमा के चाँद की उज्ज्वल किरणों से आकर्षित समुद्र में उठी चंचल तरंग नहीं, मैं पृथ्वी पर उतरी चन्द्र की किरण नहीं। ऐसा कहने से उर्वशी का आशय यह है कि उर्वशी लौकिक है, जिसका उपभोग लौकिक मनुष्य भी कर सकता है ।
4.
मैं नाम-गोत्र से रहित पुष्प,
अम्बर में उड़ती हुई मुक्त आनन्द-शिखा
इतिवृत्त हीन,
सौन्दर्य-चेतना की तरंग;
सुर-नर-किन्नर-गन्धर्व नहीं,
प्रिय! मैं केवल अप्सरा
विश्वनर के अतृप्त इच्छा-सागर से समुद्भूत।
भावार्थ : उर्वशी कहती है कि मेरा कोई नाम या कुल नहीं है। मैं एक ऐसा पुष्प हूँ जिसे कोई नहीं जानता। मेरा कोई इतिहास नहीं है; मैं आकाश में उड़ती आनन्द की साक्षात् ज्वाला हूँ। मैं सौन्दर्य-चेतना की एक तरंग हूँ, मन को उद्वेलित करने वाली धारा हूँ । उसका सम्बन्ध न तो देवता से हैं. न मनुष्य , न किन्नर से और न ही गन्धर्व से। मैं सिर्फ एक अप्सरा हूँ, जिसका जन्म सांसारिक प्राणियों या ब्रह्म की इच्छाओं के सागर की अतृप्ति से हुआ है। मैं सांसारिक प्राणियों या ब्रह्म की इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैदा हुई हूँ। उर्वशी के कहने का आशय यह है कि वह सिर्फ लोगों की अतृप्त इच्छाओं को पूरा करने के लिए आई है।
5.
जन-जन के मन की मधुर वह्नि, प्रत्येक हृदय की उजियाली,
नारी की मैं कल्पना चरम नर के मन में बसने वाली।
विषधर के फण पर अमृतवर्ति;
उद्धत, अदम्य, बर्बर बल पर
रूपांकुश, क्षीण मृणाल-तार।
भावार्थ : उर्वशी अपने भावों को व्यक्त करते हुए कहती है कि मैं प्रत्येक व्यक्ति के मन में प्रज्वलित होने वाली ऐसी अग्नि हूँ, जो उनके मन और हृदय को खुशियों से भर देती है। मैं एक नारी की कल्पना बनकर मानव मन में रहती हूँ। मैं साँप के फन पर लगा तिलक हूँ। मैं अपने सौन्दर्य से शक्तिशाली, बलशाली तथा क्रूर से क्रूर मानव की शक्ति को कमल की नाल की तरह कमजोर कर देती हूँ; दूसरे शब्दों में, मैं व्यक्ति के शक्तिशाली, बलशाली तथा क्रूर रूप पर अपने रूप सौन्दर्य का अंकुश लगाती हूँ।
6
मेरे सम्मुख नत हो रहते गजराज मत्त;
केसरी, शरभ, शार्दूल भूल निज हिंस्र भाव
गृह-मृग समान निर्विष, अहिंस्र बनकर जीते।
‘मेरी भ्रू-स्मिति को देख चकित, विस्मित, विभोर
शूरमा निमिष खोले अवाक् रह जाते हैं;
श्लथ हो जाता स्वयमेव शिंजिनी का कसाव,
संस्रस्त करों से धनुष-बाण गिर जाते हैं।
भावार्थ : मेरे सामने बड़े-बड़े मस्त हाथी भी सिर झुकाकर रहते हैं। चीता, हाथी, सिंह और अन्य हिंसक पशु अपनी हिंसक प्रवृति त्यागकर पालतू हिरन की तरह अहिंसक बन जाते हैं। उर्वशी बताती है कि बड़े से बड़ा वीर भी मेरे भृकुटी-संचालन को देखकर हतप्रभ हो जाता है ,वह बोल तक नहीं पाता। उसके शिथिल हाथों से धनुष-बाण गिर जाते हैं और धनुष की डोर भी ढीली पड़ जाती है। उर्वशी के कथन का आशय है कि उसका सौन्दर्य सभी को सम्मोहित बना देता है ।




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