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12 cbse hindi -pahalawan ki dholak-fanishwarnath renu-lesson summary-पहलवान की ढोलक – फणीश्वर नाथ रेणु-पाठ सार

August 15, 2023
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पहलवान की ढोलक – फणीश्वर नाथ रेणु

 लुट्टन  की छोटी उम्र में ही लुट्टन के  माता-पिता का हो चुका था। 

जब वह नौ  साल का था ,तब ही  उसकी शादी  हो चुकी  थी।

उसकी विधवा सास ने ही लुट्टन को पाल पोस कर बड़ा किया।

वह गाय चराता , खूब दूध-दही खाता और कसरत करता था।

गांव के कुछ लोग उसकी सास को परेशान करते हैं। इसीलिए उसने पहलवान बनकर  गांव के उन उन लोगों से बदला लेने का निश्चय कर लिया और कसरत करने  लगा।

उसने सास को परेशान करनेवाले कुछ लोगों को अच्छा -ख़ासा पीट दिया।

इस घटना के बाद से गांव भर में लुट्टन की पहचान पहलवान के रूप  में बन गई।

गांव के लोग उसे लुट्टन पहलवान कहकर पुकारने लगे।

लुट्टन भी अपने नाम के अनुरूप  अपने दोनों हाथों को  फैलाकर चलता और कहता -लुट्टन को होल इंडिया  जानता  है।

लुट्टन का गाँव श्याम नगर राज्य की सीमा में था .

श्याम सिंह , श्यामनगर के राजा  थे ,.

राजा श्याम सिंह को शिकार और कुश्ती का बड़ा शौक था। 

कुश्ती के शौक के कारण ही वह हर साल अपने राज्य में दंगल का आयोजन करवाते ,जिसमे देश के नामी -गिरामी पहलवान हिस्सा लेते थे।

इस साल भी उन्होंने दंगल का आयोजन किया। 

लुट्टन , श्याम नगर मेले में दंगल देखने गया।

इस बार मेले का आकर्षण था -पंजाब से आया बादल सिंह का चेला चाँद सिंह ,जिसने कई पहलवानो को हराकर शेर की बच्चे की उपाधि प्राप्त की थी। 

श्याम नगर के राजा चाँद सिंह को अपने यहां राज पहलवान रखने का मन बना चुके थे।

चाँद सिंह  अखाड़े में खड़ा होकर चुनौती दे रहा था। 

भीड़ में खड़ा लुट्टन बिना सोचे समझे अखाड़े में कूद गया  और उसने  चाँद सिंह को चुनौती दे डाली ।

जब लुट्टन सिंह , चाँद सिंह से भिड़ा तो चाँद सिंह लुट्टन को उठा-उठाकर  जमीन पर  पटकने लगा ।

राजा श्याम सिंह जो यह कुश्ती देख  रहे थे ,उन्होंने कुश्ती रूकवाकर  लुट्टन को अपने पास बुलाया और बहादुरी दिखलाने के लिए दस रूपये का ईनाम देकर कहा-जाओ,जाकर मेला देखो।

लुट्टन जिद पर अड़ गया कि वह मुकाबला करेगा  ,

राजा के समीप बैठे राज पुरोहित और मैनेजर भी समझाया किन्तु लुट्टन नहीं माना।

लुट्टन ने कहा कि यदि उसे मुकाबले की इज़ाज़त नहीं दी तो यही अपना सिर पत्थर पर पटक –पटक कर अपनी जान दे देंगा .

हारकर  राजा साहब ने कुश्ती लड़ने की अनुमति दे दी। 

ढोल बज रहे थे।

लुट्टन सिंह फिर से अखाड़े  में उतरा ,

 दुबारा दंगल शुरू हुआ।

भीड़ चाँद सिंह का समर्थन कर रही और लुट्टन का विरोध।

चाँद सिंह लुट्टन को पहले की तरह उठा-उठाकर  जमीन पर  पटकने लगा और फिर उसकी गरदन दबोच ली।

ढोलक बज रही थी। 

चाँद  सिंह का गुरु था किन्तु लुट्टन का कोई गुरु न था ,इसलिए लुट्टन ने मन ही मन ढोलक को अपना गुरु लिया .

 ढोलक से आ रही ध्वनि को गुरु का निर्देश मानते हुए लुट्टन ने वैसा ही किया,जैसा ढोलक की ध्वनि से संकेत मिला ।

इस बार लुट्टन सिंह ने सभी की उम्मीदों के विपरीत चांद सिंह को चित कर दिया।

भीड़ को लुट्टन की काबिलियत पर विश्वास न था .

लोग इसे कोई  दैविक चमत्कार मान रहे थे ,इसलिए उन्होंने लुट्टन की जय लगाने की बजाय माँ दुर्गा ,महावीर और राजा की जयकार कर रहे थे।

लुट्टन ने अखाड़े से निकलकर सबसे पहले ढोलक को प्रणाम किया।

लुट्टन राजा साहब के समीप आया ,राजा ने प्रसन्न होकर लुट्टन को गले लगा लिया

राजा साहब ने लुट्टन को  लुट्टन सिंह पहलवान कहकर सम्बोधित  किया ।

राजा साहब द्वारा लुट्टन के नाम के साथ सिंह शब्द का प्रयोग करने पर वहां उपस्थित  राज पुरोहित और मैनेजर ने विरोध किया  .

राजा साहब ने कहा ,लुट्टन ने क्षत्रिय का काम किया है और श्याम नगर की लाज रखी है .

 राजा साहब ने  लुट्टन को राज दरबार का पहलवान घोषित कर  दिया।

राज्याश्रय पाकर  लुट्टन को सभी सुविधाएं मिलने लगी ।

चांदसिंह को  पराजित  करने के बाद लुट्टन ने काले खाँ समेत कई नामी-गिरामी पहलवानों को हराया।

जो लोग लुट्टन की काबिलियत को दैवीय चमत्कार मान रहे थे ,उन  लोगों का भ्रम भी दूर  हो गया । 

काले खाँ को पराजित करने के बाद राजा साहब ने लुट्टन पर कुश्ती लड़ने की पाबन्दी लगा दी।

इसके बाद लुट्टन  राज दरबार का  एक दर्शनीय जीव बन कर रह गया ।

लुट्टन सिंह की जिंदगी अच्छी  गुजर रही थी।

इस बीच लुट्टन सिंह  अपने दोनों बेटों को भी पहलवानी के गुर सीखा दिए थे ।

इस तरह राज्याश्रय में रहते हुए  लुट्टन की ज़िन्दगी के पंद्रह साल गुजर गए।

इन पंद्रह सालों में उसकी पत्नी और सासू की मृत्यु हो चुकी थी।

 अचानक एक दिन राजा साहब  की मृत्यु हो गई।

राजा की मृत्यु के बाद राजकुमार  ने राज्य संभाला ।

राजकुमार को कुश्ती में  दिलचस्पी नहीं थी। राजकुमार को कुश्ती पर होने वाला खर्च  फिजूल जान पड़ा  इसीलिए उसने लुट्टन सिंह को राजदरबार से निकाल दिया।

लुट्टन सिंह अपने दोनों बेटों के साथ लेकर गांव वापस आ गया।

गाँव वालों ने लुट्टन के रहने के लिए गांव के एक छोर पर  एक छोटी सी झोपड़ी बना दी और उसके खाने-पीने का इंतजाम भी कर दिया।

बदले में वह गांव के नौजवानों को पहलवानी सिखाने लगा।

लेकिन यह व्यवस्था ज्यादा  दिन नही चल पाई ।

उसके दोनों  बेटे मजदूरी लगे,इसी से गुजर-बसर हो रहा था .

लुट्टन  शाम को ढोलक की थाप पर अपने दोनों बेटों को ही कुश्ती सिखाया करता था।

इस तरह दिन कट रहे थे।

जिस गाँव में  लुट्टन अपने दोनों बेटों के साथ  रहता था ,उस गांव में पहले तो अकाल पड़ा और फिर महामारी फैल गई ।

गांव के अधिकतर लोग मलेरिया और हैजे से पीड़ित होकर मर रहे थे ।

जाडे के दिन थे और रातें एकदम काली अंधेरी व डरावनी।

काली अंधेरी रात में कभी  भगवान को पुकारता हुआ कोई कमजोर स्वर सुनाई देता , तो कभी किसी बच्चे के द्वारा अपनी माँ को पुकारने की आवाज सुनाई देती थी।

चारों ओर सन्नाटा छाया रहता .

सियारों और उल्लूओं की आवाज ही इस सन्नाटे को तोडती जान पड़ती थी।

 कुत्तों में परिस्थिति को समझने की विशेष बुद्धि होती है ।  रात होते ही कुत्ते  रोने लगते थे कुत्तों के सामूहिक रूप से भौकने की आवाज़ सुनकर लोग,और आशंकित हो उठते थे ।

रात की इस खमोशी को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही तोड़ती थी ।

पहलवान की ढोलक संध्याकाल से लेकर प्रात:काल तक लगातार एक ही गति से बजती रहती थी और मौत को चुनौती देती रहती थी।

पललवान की ढोलक की आवाज निराश , हताश , कमजोर और अपनों को खो चुके लोगों के ह्रदय  में संजीवनी शक्ति भरने का काम करती थी, इसी उद्देश्य से  लुट्टन सिंह पहलवान शाम से सबेरे तक ढोलक  बजाया करता था ।

एक रात पहलवान के दोनों बेटे भी बीमारी की चपेट में आकर मरणासन्न स्थिति में पहुंच

गए ।

मरने से पहले उन्होनें लुट्टन  से ढोलक बजाने के लिए कहा ।

लुट्टन सिंह रात भर ढोलक बजाता है

 सुबह होने से पहले  ही लुट्टन  के बेटे प्राण चुके थे ।

 लुट्टन अपने दोनों बेटों  की लाशों को कंधे प ररखकर ले जाता है और  नदी में बहा देता हैं।

यह खबर सुनकर गांव के लोगों की  हिम्मत टूट जाती है ,

 लुट्टन सिंह  फिर से ढोलक बजाना शुरू करता है ,लुट्टन की ढोलक की आवाज़ सुनकर गाँव के  लोगों की  हिम्मत दुगनी हो जाती है  ।

लुट्टन  चार-पांच दिन तक रात को ढोलक बजाता रहा किन्तु एक रात  ढोलक की आवाज सुनाई नहीं दी।

 पहलवान के कुछ शिष्यों ने सुबह झोपड़ी में जाकर देखा तो झोपड़ी ने लुट्टन की लाश पड़ी थी।

एक शिष्य ने कहा कि “गुरुजी कहा करते थे कि जब मैं मर जाऊं तो मुझे पीठ के बल नहीं बल्कि पेट के बल चिता पर लिटाना और चिता जलाते वक्त ढोलक अवश्य बजाना”। 

वह आगे नहीं बोल पाया।

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