चार्ली चैपलिन यानी हम सब लेखक विष्णु खरे
सन 1989 में चार्ली चैप्लिन की जन्म शताब्दी जन्म मनाई गई क्योकि 16 अप्रैल 1889 में ही चार्ली चैप्लिन का जन्म हुआ था।
यदि यह वर्ष चार्ली चैप्लिन की जन्म शताब्दी का ना होता तो भी , यह चैप्लिन के जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष होता क्योंकि इसी वर्ष उनकी पहली फिल्म “मेकिंग ए लिविंग” के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं अर्थात 75 वर्षों से चार्ली चैप्लिन की कला दुनिया की पांच पीढ़ियों का बच्चों को हंसा रहा हैं। जो उसे जीवन पर्यन्त याद रखेंगे। चार्ली की फिल्में आज भी उतना ही मनोरंजन करती है,जितना कि 75 पहले किया करती थी। चार्ली और चार्लीकी फिल्में आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं ,जितनी उस समय लोकप्रिय हुआ करती थी ।
समय , भूगोल , संस्कृति की सीमाओं से खिलवाड़ करता हुआ चार्ली भारत तक पंहुचा. आज भारत के लाखों बच्चों को हंसा रहा है .
चार्ली की फिल्में किसी एक देश विशेष का नहीं वरन अखिल विश्व की विभिन्न संस्कृतियों के लोगों का मनोरंजन करती हैं।
पश्चिमी देशों में जैसे-जैसे टेलीविजन और वीडियो का प्रसार हो रहा है। एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग नए सिरे से चार्ली को “घड़ी सुधारते” या “जूता खाने की कोशिश” करते हुए देख रहा है।
चार्ली की फिल्में भावनाओं पर टिकी थी न कि बुद्धि पर । उनकी फिल्मों में भाषा का प्रयोग बहुत कम हुआ है । चार्ली को मुख भंगिमाओं से ही अपनी भावनाओं को प्रकट करने का महारथ हासिल था । चार्ली का ह्रदय मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण था जो उनकी फिल्मों में स्पष्ट दिखाई देती हैं।
प्रत्येक वर्ग का दर्शक चार्ली की फिल्मों का आनंद लेता है , फिर चाहे वो पागलखने का मरीज हो या महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन। चार्ली ने अपनी फिल्मों के माध्यम से फिल्म कला को लोकतान्त्रिक बनाया और वर्ग ,वर्ण व्यवस्था को भी तोडा।
चार्ली का जीवन बचपन से ही संघर्षमय रहा ।उनकी मां परित्यक्ता थी और स्टेज के दूसरे दर्जे की अभिनेत्री थी, जो बाद में मानसिक रूप से रोगी हो गई थी।
भयानक गरीबी ,मानसिक रूप से विक्षिप्त माँ और छोटे भाई-बहिनों की ज़िम्मेदारी का निर्वहन करना सहज नहीं था किन्तु चार्ली परिस्थितियों से कभी हारा नहीं ।
चार्ली की नानी जिप्सी थी मगर उनके पिता यहूदी वंशी थे। इसी कारण चार्ली का चरित्र बहारी व घुमन्तु रहा ।
चार्ली चैप्लिन ने अपने फ़िल्मी करियर में कभी भी मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय जीवन मूल्यों को नहीं अपनाया।
चार्ली ने फिल्मों में अपनी छवि को खानाबदोश और आवारा रूप में प्रस्तुत किया। इसी छवि के कारण चार्ली समाज के हर वर्ग में लोकप्रिय हुए।
चार्ली की फिल्मों के बारे में लिखना या उनकी समीक्षा करना नए लेखकों के लिए सहज नहीं है .लेखक का मानना है कि चार्ली और उनकी फिल्म कला के बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि कुछ और लिखा जाना शेष नहीं रहा ,यही कारण है कि नए लेखकों के लिए चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा हैं।
प्रचलित मान्यता के अनुसार सिद्धातों से कला का जन्म होता है ,ऐसा माना जाता रहा है किन्तु चार्ली ने इस मिथक को तोडा और यह प्रमाणित किया कि सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते बल्कि कला से सिद्धांत बनते हैं ।
चार्ली चैप्लिन ने अपनी फिल्मों में आम आदमी के जीवन की त्रासदी को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया । यही कारण है कि आम आदमी को चार्ली की फिल्मों की घटनाएं अपने आसपास की घटित घटनाओं के जैसी लगती हैं और चार्ली का चरित्र दर्शकों को जाना पहचाना सा लगता है ।मनुष्य किसी भी देश या संस्कृति का हो ,मानवीय संवेदना सभी की सामान होती है ,यही कारण है कि चार्ली का चरित्र और उनकी फिल्मों का कथानक किसी भी संस्कृति के दर्शक को विदेशी नहीं लगता .
बचपन की दो घटनाओं ने चार्ली के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला जिन्हें उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा हैं । एक बार जब चार्ली बीमार हुआ , तब उनकी मां ने उनको ईसा मसीह की कहानी सुनायी। जीसस के सूली पर चढ़ने का प्रसंग आते ही दोनों मां-पुत्र रोने लगे।
इसी प्रसंग से चार्ली में स्नेह और करुणा का भाव जागा था ।
चार्ली के जीवन पर प्रभाव डालनेवाली दूसरी घटना यह थी कि जिसमे चार्ली के घर के सामने कसाई की दूकान थी , कसाई के बाड़े से एक भेड़ भाग जाती है । भेड़ को पकड़ने के लिए कसाई उसके पीछे दौड़ता है और अंत: भेड़ को पकड़ लेता है।
इस क्रम में कई हास्यप्रद स्थितियां बनती है। कसाई भेड़ को लेकर लौटता है , चार्ली सोचता है कि कसाई घर में भेड के साथ क्या होगा। इसी भाव ने हास्य को करूणा में परिवर्तित कर दिया .
आगे चलाकर यही दो घटनायें चार्ली चैप्लिन की भावी फिल्मों का आधार बनी .
भारत के कला और सौंदर्यशास्त्रों में कई रसों का वर्णन मिलता है। किन्तु करुणा का हास्य में बदल जाना यह भारतीय परंपरा में कही नहीं मिलता है।रामायण और महाभारत में भी जो हास्य है , वह दूसरों पर हंसने का हास्य है स्वयं पर हँसने का नही।
संस्कृत नाटकों में बिदूषक हास्य तो उत्पन्न करता है किन्तु करुणा व हास्य का सामंजस्य नहीं दिखता .
चार्ली से गांधी और नेहरू भी प्रभावित थे और चार्ली का सानिध्य चाहते थे।
चार्ली ने अपनी फिल्मों में करुणा में हास्य और हास्य में करूणा का जो सामजस्य किया ,इसका सारा श्रेय चार्ली को जाता है .क्योकि इस तरह का प्रयास एवं प्रयोग पूर्व में किसी अन्य फिल्मकार ने नहीं किया .
चार्ली का मानना था कि हर आदमी न तो पूरी तरह नायक होता और न विदूषक . हर व्यक्ति कभी न कभी दूसरे को विदूषक समझता है औरउस पर हंसता है अर्थात अपने को नायक और दूसरे को विदूषक मानता है .
भारत में राज कपूर को चार्ली चैप्लिन का भारतीय अवतार माना जाता हैं । पूर्व भारतीय फिल्मों में करुणा और हास्य के सामंजस्य की परंपरा नहीं थी .भारतीय फिल्मों में करूणा और हास्य को एक साथ मिलाकर नहीं दिखाया गया था । चार्ली चैप्लिन से प्रभावित होकर भारत में इस परंपरा की शुरुआत राज कपूर ने अपनी फिल्म आवारा से की . इस फिल्म में राज कपूर ने स्वयं को चार्ली की तरह ही प्रस्तुत किया .
राज कपूर का यह एक साहसिक प्रयोग था ,जिसमें राज कपूर सफल भी हुए। उन्होंने चार्ली का भारतीयकरण किया ,जिसे लोगों ने बहुत अधिक पसंद भी किया । राज कपूरकी यह फिल्म बेहद सफल्र रही .
राज कपूर की सफलता के बाद दिलीप कुमार की फिल्म “गोपी , बाबुल , शबनम , कोहिनूर और लीडर” और देवानंद के “फंटूश , तीन देवियां , नौ दो ग्यारह ” आदि में इस परंपरा को आगे बढाया।
चार्ली का चिर युवा होना या बच्चों जैसा दिखना , उनकी एक विशेषता तो है ही, मगर उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते हैं।उनके आसपास जो भी चीजें , अड़ंगे , खलनायक , दुष्ट औरत आदि रहते हैं ,वें सब विदेशी लगते किन्तु चैप्लिन “हम” लगते हैं। चार्ली के सारे संकटों से यही लगता है कि यह “मैं” भी हो सकता हूं ।
भारतीय समाज में होली के अवसर पर ही लोग अपने आप पर हंसते हैं अन्यथा दूसरे को विदूषक समझकर उस पर हंसने की परंपरा थी .चार्ली की फिल्मों ने बतलाया कि हर मनुष्य मे खामियां या दोष होते है ,मनुष्य की यही खामियां अथवा दोष दूसरों को हंसने का कारण बनती है .यह आखिल मनुष्य समुदाय पर लागू होने वाला सत्य है .
चार्ली चैप्लिन “अंग्रेजों जैसे” व्यक्तियों पर हंसने का मौका देता हैं , इसीलिए उनका भारत में महत्व बढ़ जाता हैं। चार्ली स्वयं पर सबसे ज्यादा तब हंसते है जब वह स्वयं को आत्मविश्वास से लबरेज , सफलता , सभ्यता , संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति , दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली व श्रेष्ठ समझते है।
लेखक का मानना है कि हम भी अपने वास्तविक जीवन के अधिकांश हिस्सों में चार्ली जैसे ही होते हैं ,जिनके रोमांस हमेशा पंचर होते हैं। महानतम क्षणों में कोई हमें चिढ़ा कर या लात मार कर भाग सकता है। कभी-कभी हम लाचार स्थिति में भी जीत जाते हैं। मूलत: हम सब चार्ली ही हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते हैं। सत्ता , शक्ति , बुद्धिमत्ता , प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों पर जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा चार्ली चार्ली हो जाता है।



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