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तिरिछ,उदय प्रकाश
तिरिछ (उदय प्रकाश )
प्रश्न 1।लेखक के पिता के चरित्र का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर-लेखक उदय प्रकाश के पिता अन्तर्मुखी है । मितभाषिता व गंभीरता जैसी विशेषता लेखक के पिता को एक रहस्य-पुरुष की छवि प्रदान करती है। उनकी संतानें उन्हें इसी रूप में देखती है। पिता शहर से आतंकित हैं। लेखक के पिता शहर जाने से कतराते हैं। अपनी सहजता, गंभीरता और गँवईपन के बावजूद बच्चों के लिए वे अभ्यारण्य हैं। आधुनिकता के उपकरण सहज जीवन बोध पर हावी हो गया हैं । अपने स्वभाव के कारण लेखक के पिता स्वयं ही लाचार और दयनीय बन जाते हैं।
आज की जटिल जीवन की स्थितियों में सहजता कितनी खतरनाक हो सकती है लेखक के पिता इससे अनभिज्ञ हैं। अस्तित्व की रक्षा के लिए दृढ़ता आवश्यक है। उन्हें जब धतूरे का काढ़ा दिया जाता है तो वे उसे सहज स्वीकार कर लेते हैं। । लेखक के पिता एक प्रतीकात्मक भूमिका अदा करते हैं।
वे कहानीकार के हाथ में एक औजार के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, जिसके माध्यम से वह न्याय व्यवस्था, प्रशासन व्यवस्था और आर्थिक व्यवस्था में व्यक्त अमानवीयता को उद्घाटित करता है। लेखक के पिता नयी परस्थितियों और जीवन-मूल्यों से परिचित नहीं लगते हैं। अतः वे इससे आक्रांत होते हैं। वे मितभाषी व गंभीर तो हैं पर दृढ़ नहीं हैं। उनके स्वभाव में आक्रामकता नहीं है। शहर में उनके साथ जो कुछ भी अमानवीय व्यवहार होता है इससे उनकी दयनीयता ही प्रकट होती है।
प्रश्न 2।तिरिछ क्या है? कहानी में यह किसका प्रतीक है?
उत्तर-तिरिछ एक जहरीला जीव है जिसके काटने से व्यक्ति का बचना मुश्किल हो जाता है,ऐसी मान्यता है । जैसे ही तिरिछ किसी व्यक्ति को काटता है, वैसे ही वहाँ से भागकर किसी जगह पेशाब करता है और उस पेशाब में लेट जाता है। अगर तिरिछ ऐसा कर दे तो व्यक्ति बच नहीं सकता। वहीं तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है जब उससे नजर टकरा जाए। कहानी में तिरिछ मृत्यु का प्रतीक है। जिस भीषण यथार्थ के शिकार बाबूजी बनते हैं, बेटे के सपने में तिरिछ बनकर प्रकट होता है।
प्रश्न 3।अगर तिरिछ को देखो तो उससे कभी आँख मत मिलाओ। आँख मिलते ही वह व्यक्ति की गंध पहचान लेता है और फिर पीछे लग जाता है। फिर तो व्यक्ति चाहे पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा ले, तिरिछ पीछे-पीछे आता है। क्या यहाँ तिरिछ केवल जानवर भर है? यदि नहीं, तो उससे आँख क्यों नहीं मिलानी चाहिए?
उत्तर-इस पाठ में वर्णित “तिरिछ” संभवतः एक विषैला जन्तु नहीं, अपितु मानव की हिंसात्मक पाशविक प्रवृत्तियाँ प्रतीत होती हैं। यद्यपि तिरिछ एक खतरनाक विषैला जानवर होता है जिसके काटने से मनुष्य की प्रायः मृत्यु हो जाती है। किन्तु मानव की हिंसक तथा दानवी गतिविधियाँ उससे अधिक, अत्यन्त घातक तथा मर्मान्तक (असह्य) पीड़ादायी होती हैं। उससे मनुष्य घुल-घुलकर मौत के मुँह में चला जाता है। कहानीकार ने तिरिछ प्रवृति वालों से आँख नहीं मिलाने का परामर्श दिया है क्योकि तिरिछ प्रवृति वाले मनुष्य भी संपर्क में आने पर आक्रमण कर देते है ।
यहाँ पर कहानीकार दुर्जन एवं तिरिछ के समान खतरनाक व्यक्तियों से आँखें नहीं मिलाने के लिए कहता है। इसका निहितार्थ यह है कि हमें ऐसे व्यक्तियों से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिए , उनसे दूर ही रहना चाहिए। अवांछनीय व्यक्तियों की ना मित्रता अच्छी होती है और ना शत्रुता। उनसे आँखें नहीं मिलाना ही श्रेयस्कर है ।
प्रश्न 4।“तिरिछ’ लेखक के सपने में आया था और वह इतनी परिचित आँखों से देखता था कि लेखक अपने आपको रोक नहीं पाता था। यहाँ परिचित आँखों से क्या आशय है?
उत्तर-“तिरिछ लेखक के सपने में आता था”-सपना मनुष्य नींद में देखता है, स्वप्न में कल्पनाएँ भी आती हैं,और भाव भी आते हैं। कुछ सपने जीवन में घटित घटनाओं से जुड़े होते हैं तो कुछ कल्पना से ,जिनका कोई आधार नहीं होता हैं। लेखक ने तिरिछ की प्रवृति वालें लोगों की ओर संकेत किया है । वह उसे परिचित-सा प्रतीत होता है । लेखक का स्वयं को नहीं रोक पाना मानवीय दृष्टि से स्वाभाविक है। लेखक को उसकी हिंसक प्रवृत्ति और वास्तविकता का बोध नहीं है।लेखक इस तथ्य का बोध करना चाहता है कि जो हमें परिचित से जान पड़ते है ,उन पर सहजता से विश्वास भी कर लेते है लेकिन व्यवहारिक जीवन में देखा जाता है कि जिसे परिचित जानकर विश्वास किया जाता ,उसी से हानि भी उठानी पड़ती है ।
प्रश्न 5।व्याख्या करें रू
(क) वैसे, धीरे-धीरे मैंने अनुभवों से यह जान लिया था कि आवाज ही ऐसे मौके पर मेरा सबसे बड़ा अस्त्र है।
(ख) जैसे जब मेरी फीस की बात आई थी, उस समय हमारे पास आखिरी गिलास भी गुम हो गया था और सब लोग लोटे में पानी पीते थे।
(ग) आश्चर्य था कि इतने लम्बे अर्से से उसके अड्डे को इतनी अच्छी तरह से जानने के बावजूद कभी दिन में आकर मैंने उसे मारने की कोई कोशिश नहीं की थी।
(घ) मुझे यह सोचकर एक अजीब-सी राहत मिलती है और मेरी फंसती हुई साँसें फिर से ठीक हो जाती हैं कि इस समय पिताजी को कोई दर्द महसूस नहीं होता रहा होगा।
उत्तर-
(क) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-2 के तिरिछ शीर्षक कहानी से ली गई है। इसके लेखक उदय प्रकाश हैं। इन पंक्तियों में विद्वान लेखक ने अपने मन की व्यथा व्यक्त की है।
कहानी में तिरिछ आतंक का पर्याय बनकर आया है। उसी के कारण लेखक के डरावने सपने आते हैं। यह आतंक शहरी आधुनिकता एवं जीवन दृष्टि का और सत्ता की निरंकुशता का। एक तरफ आतंक और यंत्रणा से उपजी बेचौनी है, तनाव और असहायता का भाव निहित है तो दूसरी ओर शहरी या कहें आधुनिक मनुष्य की संवेदनहीनता और अमानवीयता छिपी हुई है। यहीं मूल्यों का संक्रमण सर्वाधिक दृष्टिगोचर होता है। परंपरा ओर आधुनिकता अथवा पुराने और नए द्वन्द्व से जहाँ नवीन भावबोध का सृजन हुआ वहीं कुछ विकृतियों ने भी जन्म लिया।
संवेदना का क्षरण हुआ। इस क्षरण ने अजनबीपन, अकेलापन, घुटन और संत्रास जैसे भावबोध दिए। दूसरे भावबोध के कारण लेखक हमेशा डरा हुआ महसूस करता। उसे डरावने सपने आते। जब सपने में मृत्यु के करीब होता तो वह जोर-जोर से बोलने लगता और दूसरी आवाज के सहारे सपने से बाहर निकलता। इस पूरी दुनिया में उसकी आवाज ही अपनी थी जो उसे मृत्यु के मुँह में जाने स बचा लेती है।
(ख) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-2 के तिरिछ शीर्षक कहानी से ली गई है। इसके लेखक उदय प्रकाश हैं। इन पंक्तियों में विद्वान लेखक ने अपने मन की व्यथा व्यक्त की हे।
उपर्युक्त सन्दर्भ में लेखक के घर की और अपनी जीवन की बहुत-सी समस्याओं का अंत पिताजी ही करते थे। यह उद्धरण लेखक की आर्थिक समस्याओं को उठाता है। जैसा कि हमारे समाज में होता है कि घर की सारी समस्याओं का निपटारा घर के मुखिया पिताजी द्वारा ही होता हो गर्व की बात है। परला तरह पिता ने अपने दायित्व फीस मिलना पुत्र कलर की बदहाली है।
आर्थिक कमी को ही व्यजित करती है। साथ ही गिलास के गुम होने पर लोटे में पानी पीना आर्थिक तंगी का ही बयान करता है। एक रिटायर्ड हेडमास्टर की चुप्पी उसके घर की बदहाली का ही संकेत देती है परन्तु पुनः दो-तीन दिन के बाद फीस मिलना पुत्र के लिए गर्व की बात बन जाती है। आखिर किसी तरह पिता ने अपने दायित्व का निर्वाह किया। यह दायित्व का निर्वहन ही गर्व की बात है। परन्तु लेखक द्वारा कहा गया कथन मध्यवर्गीय ग्रामीण जीवन की आर्थिक बदहाली की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।
(ग) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक दिगंत भाग-2 के तिरिछ शीर्षक कहानी का एक अंश है। इस सारगर्भित कहानी के लेखक उदय प्रकाश हैं।
लेखक को सपने में तिरिछ आते रहने के कारण कहीं न कहीं उनमें भय घर कर गया था। इसी कारण इतने लम्बे अर्से से उसके अड्डे को इतनी अच्छी तरह जानने के बावजूद कभी दिन में आकर मारने की कोई कोशिश नहीं की। यह ‘आश्चर्य’ डर का प्रतिरूप था। हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जो हमारे मन में घर कर जाती हैं जिसके कारण हम हमेशा डरे से रहते हैं। यही डर हमें उससे अलगाती है। यही वजह थी कि सबकुछ जानने के बाद भी उसने मारने की कोशिश नहीं की। जब वही सपने उसे आने बंद हो गये तो उसने जाकर ‘तिरिछ’ को जलाया और अपने को विजित महसूस करने लगा।
(घ) प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक दिगंत भाग-2 के तिरिछ शीर्षक कहानी का एक अंश है। इस सारगर्भित कहानी के लेखक उदय प्रकाश हैं। इन पंक्तियों में लेखक अपने पिताजी के विषय में वर्णन कर रहा है। उसके पिताजी शहर में जाकर विभिन्न स्थानों पर वहाँ के लोगों (निवासियों) की हिंसक कारवाईयों के शिकार हो जाते हैं। उनको काफी चोटें आती हैं और वे मरनासन्न हो जाते हैं। उन स्थितियों में भी लेखक एक अजीब-सी राहत महसूस करता है तथा उसकी फंसती हुई सांसें सामान्य हो जाती हैं। वह ऐसा अनुभव करता है कि उसके पिताजी को अब कोई दर्द महसूस नहीं होता रहा होगा।
वह ऐसा इसलिए सोचता है कि अब उनके पिताजी को ऐसा विश्वास होने लगा होगा कि उनके साथ जो कुछ भी हुआ वह एक सपना था। उनकी नींद खुलते ही सब ठीक हो जाएगा। पुनः वह यह भी आशा व्यक्त करता है कि उसके पिताजी फर्श पर सोते हुए उसे और उसकी छोटी बहन को भी देख सकेंगे। लेखक की इस उक्ति में अजीब विरोधाभास है। लेखक के पिता बुरी तरह घायल हो गए हैं। उनकी स्थिति चिन्ताजनक हो गई है। फिर भी वह आशा करता है कि वे स्वस्थ हो जाएँगें, उन्हें कोई दर्द महसूस नहीं होगा और वे लेखक तथा उसकी छोटी बहन को फर्श पर लेटे हुए देखेंगे।
यहाँ भी लेखक के प्रतीकात्मक भाषा-शैली का प्रयोग किया है। संभवतः हिंसात्मक, भीड़ द्वारा उनके पिताजी की बेरहमी से पिटाई तथा उनका सख्त घायल होना, उनकी विपन्नता, प्रताड़ना तथा त्रासदपूर्ण स्थिति को इंगित करता है। प्रतीकात्मक भाषा द्वारा लेखक ने अपने विचारों को प्रकट किया है ऐसा अनुभव होता है। लेखक का इस क्रम में आगे चलकर यह कहना कि “और जैसे ही वे जागेंगे सब ठीक हो जाएगा या नीचे फर्श पर सोते हुए मैं और छोटी बहन दिख जाएंगे” लेखक के पिताजी एवं परिवार की सोचनीय आर्थिक दशा का सजीव वर्णन मालूम पड़ता है।।
प्रश्न 6।तिरिछ को जलाने गए लेखक को पूरा जंगल परिचित लगता है, क्यों?
उत्तर- तिरिछ को जलाने गए लेखक को पूरा जंगल परिचित इसलिए जान पड़ा क्योकि इस जगह को वह स्वप्न में कई बार देख चुका था ।सारी स्थितिया और वातावरण वैसा ही था जैसा उसने स्वप्न में देखा था । लेखक को उसी जगह मृत तिरिछ भी मिल जाता है। सपने में देखी स्थितियां और वातावरण लेखक को जंगल से परिचित कराता है। इसीलिए लेखक को जंगल परिचित लगता है।
प्रश्न 7।‘इस घटना का संबंध पिताजी से है। मेरे सपने से है और शहर से भी है। शहर के प्रति जो एक जन्मजात भय होता है, उससे भी है।’ यह भय क्यों है?
उत्तर-‘तिरिछ’ कहानी के लेखक के पिता को शहर से डर लगता है , यही कारण है कि वे शहर जाने से कतराते हैं । शहर की संवेदनशीलता उसके भय का कारण है। कहानी में जब लेखक के पिता डरते हुए शहर जाते हैं तो उनके साथ शहर के लोगों द्वारा किये गए अमानवीय व्यवहार से लगता है कि शहर में जैसे मानवीय संवेदना मर गई है। शहर का हर आदमी स्वार्थ में लिप्त है। शहर के लोग अराजक एवं हिंसक हो गए है। आत्मीयता अपाहिज होकर पड़ी हुई है ,इसलिए लेखक के पिता की सहायता के लिए कोई आगे नहीं आता ।आधुनिकता की यह विडम्बना शहर के भयावह रूप को रेखांकित करती है।इस प्रकार एक देहाती संवेदना का व्यक्ति शहरी वातावरण में खुद को अनजान,असहाय और अकेला महसूस करता है ।
प्रश्न 8।कहानी में वर्णित ‘शहर’ के चरित्र से आप कितना सहमत हैं?
उत्तर-कहानी में शहर का जो चित्र उपस्थित किया गया है वह वास्तविकता के बहुत अधिक निकट है । शहरी जीवन की विसंगतियां तथा विकृतियां इसी रूप में व्याप्त है जिस रूप में कहानी में शहर को प्रस्तुत किया गया है ।
लेखक के पिता जो गाँव में रहते थे तथा ग्रामीण परिवेश उनके व्यक्तिव की पहचान थी । शहर की आधुनिकता से बिलकुल अनभिज्ञ हैं। कभी –कभार ही शहर जाना होता था और कार्य होते ही उसी दिन गाँव लौट आते थे । एक बार वे कचहरी के काम से शहर आते हैं। उनके साथ कठिनाई यह थी कि शहर की सड़कों को वे भूल जाते थे। वे भटकते हुए कई स्थानों में चले जाते हैं। इसी क्रम में उनके प्रति लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। उनकी गवई वेष-भूषा और चाल-ढाल से शहर के उन इलाकों के लोग उनके प्रति गलत धारणा बना लेते हैं जिनकी परिणति एक त्रासदी में होता है। वे लोगों द्वारा किये गए अपमान, तिरस्कार तथा प्रताड़ना का शिकार होते है।
जब स्टेट बैंक की एक शाखा में जाते हैं तो वहाँ के कर्मचारी उन्हें शराबी, पागल और बाद में डकैत समझ बैठते हैं, तथा उनकी पिटाई कर देते हैं। उनके कागजात एवं रुपए-पैसे छीन लिए जाते हैं।लेखक के पिता किसी तरह वहाँ से निकलकर पुलिस थाना पहुँचेते है तो फटे कपड़ों के कारण दारोगा उन्हें पागल समझकर सिपाही द्वारा घसीटवाकर थाने से बाहर निकलवा देता है ।
वहाँ से वे जब इतवारी कॉलोनी आए,तब तक शरीर से धोती भी उतर चुकी होती थी , केवल अधो वस्त्र ही शेष रह गया था । इसके बाद नेशरनल रेस्टोरेन्ट में भी उन्हें पागल समझ लिया गया तथा पत्थर मार-मारकर मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया गया। अन्त में जान बचने के लिए दौड़ते हुए एक मोची की गुमटी में घुस गए। वह मोची उनके गाँव के पासवाले टोले का था, उसने उन्हें पहचान लिया। इसके कुछ देर ही उनकी मृत्यु हो जाती है।
इस प्रकार स्टेट बैंक, पुलिस थाना, इतवारी कॉलोनी तथा नेशनल रेस्टोरेन्ट इन सभी स्थानों पर लेखक के पिता को कहीं डकैत, कहीं अपराधी, कहीं शराबी, कहीं पागल समझकर निर्ममता से पीटा गया, जिसके कारण लेखक के पिता की मृत्यु हो जाती है लेखक के पिता के माध्यम से कहानीकार ने शहरी तथा देहाती जीवन के बीच भावना और संवेदनात्मक स्तर पर आये परिवर्तन का चित्र उपस्थित किया है ।लेखक के पिता की कारुणिक मौत शहर की आधुनिक संस्कृति से उपजी विकृति तथा द्वन्द्व का ज्वलन्त उदाहरण है । लेखक ने तिरिछ जैसे विषैले जन्तु को प्रतीकात्मक रूप से कहानी में प्रतिस्थापित किया है। कहानी में घटित घटना और लेखक के पिता के साथ हुआ व्यवहार शहरी चरित्र की वास्तविकता को उदघाटित करता है।
प्रश्न 9।लेखक के पिता के साथ एक दिक्कत यह भी थी कि गाँव या जंगल की पगडंडियाँ तो उन्हें याद रहती थीं, शहर की सड़कों को वे भूल जाते थे। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? आप क्या सोचते हैं? लिखें।
उत्तर-लेखक के पिता के जीवन गाँव में ही व्यतीत हुआ था ।गाँव में रहते हुए देहाती परिवेश में रच-बस गए थे । शहर कभी-कभी किसी आवश्यक कार्य होने पर ही जाते थे तथा कार्य निपटा लेने के बाद उसी दिन शाम तक वापिस गाँव लौट आते थे। मानवीय स्वाभाव रहा है कि व्यक्ति जिस स्थान पर रहता है , उस स्थान से आत्मिक लगाव हो जाता हैं ।लेखक के पिता वर्षों से गाँव में रह रहे थे। गाँव और जंगल की पगडंडियाँ के चप्पे-चप्पे से परिचित थे । शहर से उनका संबंध ज्यादा न था, यदा-कदा आवश्यक कार्य से जाते थे तथा कार्य करके वापस लौट आते थे। शहरी जीवन से उनका न ज्यादा परिचय था और न लगाव था। यही कारण था कि उन्हें शहर की सड़कों और रास्तों की जानकारी नहीं थी तथा वे शहर जाने पर सड़क या रास्ता भूल जाते थे।मनुष्य का स्वभाव है कि जिससे उसका ज्यादा परिचय या लगाव न हो उसके बारे में मस्तिष्क में ज्यादा दिन तक जानकारी संचित नहीं रह पाती,मस्तिष्क से विस्मृत हो जाती है ।लेखक के पिता का शहर के प्रति मानसिकता का यही कारण था ।
प्रश्न 10।स्टेट बैंक के कैशियर अग्निहोत्री, नेपाली चौकीदार थापा, असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर मेहता, थाने के एस। एच। ओ। राघवेन्द्र प्रताप सिंह के चरित्र का परिचय अपने शब्दों में दीजिए।
उत्तर-
कैशियर अग्निहोत्री-कैशियर अग्निहोत्री, शहर के देशबन्धु मार्ग पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कैशियर है। शहरों में आए दिन बैंकों में लूट-डकैती की घटनाएं होती रहती है । इस प्रकार की घटनाओं के कारण संदिग्ध व्यक्ति में लुटेरा का रूप में नजर आता था। यही कारण था कि जब लेखक के पिता कैशियर अग्निहोत्री के पास पहुँचते हैं ,कैशियर आशंकित और भयभीत हो उठता है तथा डर कर घंटी बजा देता है।
नेपाली चौकीदार थापा- चौकीदार को यही समझाया जाता है कि संदिग्ध व्यक्ति पर नज़र रखना है ,शंका होने पर उसे पकड़ना उसका काम है । यह ठीक हा कि चौकीदार अपने काम के प्रति सजग है किन्तु बिना सच्चाई जाने किसी की पिटाई कर देना मानवीयता की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता ।
असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर मेहता – मेहता जो बैंक के ब्रांच मैनेजर थे। उन्होंने अवश्य थोड़ी नैतिकता दिखलाई ,जब लेखक के पिता को मारा-पीटा जा रहा था ,तब मेहता ने तलाशी लेकर बाहर निकाल देने को कहा।
थाने के एस। एच। ओ। राघवेन्द्र प्रताप सिंह – राघवेन्द्र प्रताप सिंह जो शहर के थाने में एस। एच। ओ। थे। उन्हें कड़वी चीज पसंद
नहीं थी । करेले की वजह से उनका मूड ऑफ हो जाता है। लेखक के पिता के साथ उनका व्यवहार गैरजिम्दाराना था । इससे कहा जा सकता है कि वह अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी के साथ नहीं निभाते हैं।
प्रश्न 11।लेखक के पिता अपना परिचय हमेशा, “राम स्वारथ प्रसाद ।।।। एक्स स्कूल हेडमास्टर ।।।।।।।।। एंड विलेज हेड ऑफ बकेली के रूप में देते थे, ऐसा क्यों? स्कूल और गाँव के बिना वे अपना परिचय क्यों नहीं देते?
उत्तर-लेखक के पिता स्कूल हेड मास्टर के पद से रिटायर्ड हुए थे और अब गाँव के मुखिया है । हेड मास्टर और
गाँव का मुखिया होना उनकी पहचान है ।शहर के लोग गाँव के लोगों के प्रति अनपढ़ ,जाहिल और गंवार होने की मानसिकता रखते है और गाँव के लोगों के साथ उपेक्षित व्यवहार करते है ।लेखक के पिता जो यदा-कदा शहर जाते रहते थे ।उनके देहाती पहनावे के कारण उन्हें गाँव का अनपढ़ ,जाहिल और गंवार समझकर किसी ने उनके आत्मसम्मान के विरुद्ध व्यवहार किया होगा ।इस अनुभव के बाद लेखक के पिता जब भी शहर जाते है तो अपना परिचय हमेशा, “राम स्वारथ प्रसाद ।।।। एक्स स्कूल हेडमास्टर ।।।।।।।।। एंड विलेज हेड ऑफ बकेली के रूप में देते थे,इसके पीछे लेखक के पिता की सोच शहर के लोगों की इस मानसिकता को तोड़ना रहता होगा कि यह आवश्यक नहीं गाँव की सभी लोग अनपढ़ ,जाहिल और गंवार होते है ।गाँव में भी पढ़े-लिखे और समझदार लोग होते है ।अपने प्रभाव को बढ़ने के उद्देश्य से ही लेखक के पिता अपना परिचय हमेशा, “राम स्वारथ प्रसाद ।।।। एक्स स्कूल हेडमास्टर ।।।।।।।।। एंड विलेज हेड ऑफ बकेली के रूप में देते थे,
प्रश्न 12।हालाँकि थान कहता है कि अब तो यह तय हो गया कि तिरिछ के जहर से कोई नहीं बच सकता। ठीक चौबीस घंटे बाद उसने अपना करिश्मा दिखाया और पिताजी की मृत्यु हुई। इस अवतरण का अभिप्राय स्पष्ट करें।
उत्तर- – लेखक के मित्र थानू के पिता के साथ भी तिरिछ के कटाने की घटना हुई होगी । लेखक के मित्र थानू के पिता की मृत्यु कैसे हुई यह सच्चाई किसी को ज्ञात नहीं थी ।तब से यह विश्वास दृढ हो गया कि तिरिछ के काटने के बाद से कोई जीवित बच नहीं रह सकता। इस प्रकार की मान्यताएँ जड़ होकर परंपरा बन जाती हैं। मान्यता जब परम्परा बन जाती है ,विश्वास दृढ जाता है।इस प्रकार की मान्यताएं समाज को आगे बढ़ने के बजाय पीछे धकेल देती है । रुढ़िवादी परंपरा और मान्यता नए विचारों को पैर ज़माने नहीं देती ।परंपरा और आधुनिकतामें से टकराव होता है।
प्रचलित परंपरा और मान्यता के कारण ही लेखक के पिता को तिरिछ काटने के बाद धतूरा के काढ़ा पिलाया जाता है। तिरिछ के काटने का सच सामने आने से पहले ही लेखक के पिता की मृत्यु हो जाती है ।लेखक के पिता का कारण तिरिछ का काटना नहीं ,बल्कि शहर में लेखक के पिता के साथ जो कुछ घटित हुआ ,वह लेखक के पिता का वास्तविक कारण था ।यदि प्रचलित विश्वासों को न माना जाता और धतूरे का काढा न पिलाया होता तो शायद लेखक के पिता की जान भी बच जाती और तिरिछ के प्रति जो मान्यता और विश्वास चला आ रहा है ,वह भी टूट जाता ।
प्रश्न 13।लेखक को अब तिरिछ का सपना नहीं आता, क्यों?
उत्तर-लेखक ने तिरिछ के बारे में जैसा सुना था ,वैसी ही लेखक की मानसिकता बन गई थी ,लेखक को सपनेवाली बात सच लगती थी ।लेकिन जब लेखक के पिता की मृत्यु हुई और पिता की मृत्यु का सच सामने आया तो लेखक को यथार्थ का बोध हुआ ।
यथार्थ बोध के कारण ही लेखक को अब तिरिछ का सपना नहीं आता । लेखक को विश्वास हो जाता है कि सब सपना एक भ्रम है ,सत्य नहीं । आँख खोलते ही सब ठीक सब पूर्वत हो जाता है ।
जैसे ही लेखक का भ्रम टूटता है ,लेखक को अब डर नहीं लगता और न तिरिछ के सपने आते है ।







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