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September 24, 2022
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एक लेख और,भगत सिंह एक पत्र

एक लेख और एक पत्र

पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उत्तर

प्रश्न 1.विद्यार्थियों को राजनीति में भाग क्यों लेना चाहिए?

उत्तर.भगत सिंह का मानना था कि जो आज विद्यार्थी है ,कल वें ही देश के कर्णधार बनेंगे .इसी वर्ग में से किसी को देश का नेतृत्व करने और किसी को सत्ता सञ्चालन का  दायित्व निभाना होगा .जो दायित्व कल उनके कन्धों पर आनेवाला उसकी तैयारी विद्यार्थी जीवन में ही कर लेनी चाहिए . विद्यार्थियों को चाहिए कि अपने विद्यार्थी जीवन में ही राजनीति में भाग लेकर राजनितिक समझ ,जानकारी और अनुभव को पुख्ता कर  लेना चाहिए .

प्रश्न 2. भगत सिंह की विद्यार्थियों से क्या अपेक्षाएँ हैं?

उत्तर. भगत सिंह का मानना था कि जो आज विद्यार्थी है ,कल वें ही देश के कर्णधार बनेंगे .इसी वर्ग में से किसी को देश का नेतृत्व करने और किसी को सत्ता सञ्चालन का  दायित्व निभाना होगा. भगत सिंह की विद्यार्थियों से अपेक्षा रखते थे कि विद्यार्थी राजनीति तथा देश की परिस्थितियों का जानकारी और अनुभव  प्राप्त करें और देश की विषम स्थितियों में  सुधार के उपाय सोचने की योग्यता विकसित करें। विद्यार्थी तन-मन-धन से देश  सेवा के लिए तत्पर हो  जाएँ और राष्ट्र के  प्राण न्योछावर करने के भी स्वयं को तैयार रखे .

प्रश्न 3.  भगत सिंह के अनुसार केवल कष्ट सहकर ही देश की सेवा की जा सकती है? उनके जीवन के आधार पर इसे प्रमाणित करें।

उत्तर. भगत सिंह के अनुसार केवल कष्ट सहकर ही देश की सेवा की जा सकती है,भगत सिंह का यह कथन उनके निजी जीवन से प्रमाणिक कथन है .राष्ट्र सेवा के लिए जो उन्होंने किया और जो अनुभव प्राप्त हुए उक्त कथन उसी अनुभव से जन्मा है . भगत सिंह देश को न सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करना चाहते थे बल्कि आजादी के बाद देश और समाज में व्याप्त व्यवस्था को भी सुधारना चाहते थे .उन्होंने दूसरों को या भाषण उपदेश की अपेक्षा स्वयं के जीवन को उदहारण के लिए प्रस्तुत किया .

12 वर्ष की कच्ची उम्र में ही  जालियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर देश को अंग्रेजों से भारत माता को मुक्त करने का संकल्प लिया , क्रांति की ज्वाला को हवा देने के लिए 1923 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ से जुड़े ,ताकि देश की जनता में राष्ट्रीयता का भाव जाग्रत हो  । भगत सिंह देश की जानता को समाजवादी  विचारधारा से अवगत कराना चाहते थे  .भगत सिंह समाज में व्याप्त असमानता , भेदभाव, अशिक्षा, अंधविश्वास, निर्धनता , अन्याय जैसी बुराइयों के विरुद्ध विचार बनाकर खड़े होते है . जिस भारत की और भारत की जनता के भविष्य का स्वप्न उन्होंने देखा ,उसे यथार्थ के धरातल पर उतरने के लिए  संघर्ष किया ,कष्ट सहन किये . भगत सिंह ने यह कष्ट इसलिए सहन किये क्योकि वें जानते थे कि मंच पर खड़े होकर भाषण देने से स्थितियां नहीं बदली जा सकती .क्रांति बलिदान मांगती है . देश की सेवा बिना कष्ट सहकर नहीं हो  सकती । इस उद्देश्य प्राप्ति के लिए ही उन्होंने  नौजवान सभा का गठन किया . असेम्बली में बम फेंकने का निर्णय इसी सोच का परिणाम था । भगत सिंह अपने इस निर्णय का का क्या हश्र होगा ,पहले से ज्ञात था .लेकिन यह भी जानते थे कि बिना जोखिम लिए या जीवन को कष्ट में डाले बिना किसी कार्य की शुरुआत नहीं हो सकती . कष्ट के संदर्भ में रूसी साहित्य का हवाला देते हुए कहा कि  विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती है। रूसी साहित्य के कष्टों और दुरूखमयी स्थितियों के कारण ही हम उन्हें पसंद करते हैं।

प्रश्न 4.भगत सिंह ने कैसी मृत्यु को सुन्दर कहा है? वे आत्महत्या को कायरता कहते हैं, इस संबंध में उनके विचारों को स्पष्ट करें।

उत्तर.सामान्य व्यवहार में मृत्यु को या  तो शोक का विषय माना जाता है या फिर भय का किन्तु भगत सिंह सार्थक उद्देश्य के लिए हुई मृत्यु को सुंदर मृत्यु मानते है .देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते हुए यदि अंग्रेजी  हुकूमत फांसी पर लटका दे तो ऐसी मृत्यु सामान्य मृत्यु से कहीं ज्यादा सुंदर होगी . भगत सिंह का मानना था कि  जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत भाग्य को पूर्णतया भूला देना  चाहिए। इसी दृढ़ इच्छा के साथ हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो जायेगा और उसके साथ ही जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाय। यह मृत्यु भगत सिंह के लिए सुन्दर होगी जिसमें हमारे देश का कल्याण होगा। हमारी मृत्यु व्यर्थ न हो ,किसी ध्येय अथवा उद्देश्य  के लिए  संघर्ष करते हुए मरना एक आदर्श मृत्यु है।

आत्महत्या को भगत सिंह कायरता कहते हैं। थोड़े से दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त देना कायरता  हैं। यह व्यर्थ की मृत्यु है  किन्तु किसी उद्देश्य अथवा आदर्श की स्थापना के लिए जीने वाला  व्यर्थ में मरना कदापि सहन नहीं करेगा . अमूल्य जीवन को थोड़ी सी कठिनाइयों के कारण समाप्त करने से अच्छा है  अपने जीवन का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करें ।  मानवता की सेवा करें ।उद्देश्य के लिए  संघर्ष करते हुए  मरना एक आदर्श मृत्यु है। प्रयत्नशील होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं है ।

 प्रश्न 5. भगत सिंह रूसी साहित्य को इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं? वे एक क्रान्तिकारी से क्या अपेक्षाएँ रखते हैं?

उत्तर. भारतीय साहित्य और रूसी साहित्य में मूलभूत अंतर यह है कि  भारतीय साहित्य  मूल्यपरक  तो है किन्तु यथाढ़ का अभाव है जबकि रूसी साहित्य के प्रत्येक स्थान पर  वास्तविकता मिलती है रूसी साहित्य में  कष्टों और दुखमयी स्थितियाँ हैं जिनके कारण दुःख और  कष्ट सहने का प्रेरणा मिलती है। यह  दुख, कष्ट आतंरिक रूप से विचारों को और अधि दृढ बनाती है   जीव संघर्ष की प्रेरणा बनती हैं। रूसी  साहित्य इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योकि रूसी साहित्य  नये समाज निर्माण की प्रक्रिया को बाल देता हैं।

सरदार भगत सिंह क्रांतिकारियों से रूसी साहित्य को पढ़ने की अपेक्षा करते हैं .उस साहित्य को पढ़कर कष्ट सहन की भावना  अनुभव करें,विचार करें । क्रान्तिकारियों को  कष्टों को सहन करने के लिए सदैव तैयार  रहना चाहिए। कठोर से कठोर  सजा हँसते- हँसते बर्दाश्त करना आदत में शामिल हो जाना  चाहिए।

प्रश्न 6. ‘उन्हें चाहिए कि वे उन विधियों का उल्लंघन करें परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता।’ भगत सिंह के इस कथन का आशय बताएँ। इससे उनके चिन्तन का कौनसा  पक्ष उभरता है?

उत्तर. ‘उन्हें चाहिए कि वे उन विधियों का उल्लंघन करें परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता।’भगत सिंह के इस कथन का आशय है कि यदि देश या समाज में जुल्म हो ,मानव विरोधी अत्याचार हो ,शोषण हो ,अन्याय की व्यवस्था या स्थिति हो ,ऐसी व्यवस्था या स्थिति के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए .परिवर्तन के लिए संघर्ष किया जाना चाहिए ,लेकिन जो किया जाये वह दुर्भावनापूर्ण नहीं बल्कि औचित्यपूर्ण होना चाहिए ,ऐसा विरोध कदापि अनुचित नहीं कहा जा सकता है .

सरदार भगत सिंह क्रांतिकारियों से कहते हैं कि क्रांतिकारी शासक यदि शोषक हो, कानून व्यवस्था यदि गरीब विरोधी, मानवता विरोधी हो तो उन्हें चाहिए कि वे उसका पुरजोर विरोध करें, परन्तु इस बात का भी ख्याल करें कि आम जनता पर इसका कोई असर न हो, वह संघर्ष आवश्यक हो अनुचित नहीं। संघर्ष आवश्यकता के लिए हो तो उसे न्यायपूर्ण माना जाता है परन्तु सिर्फ बदले की भावना हो तो अन्यायपूर्ण।

भगत सिंह  इस सम्बन्ध में  रूस की जारशाही का उदहारण  देते हुए कहते हैं कि रूस में बंदीगृहों में बंदियों पर जुल्म हुआ और जेलों के प्रबंध में क्रान्ति लाए जाने का सबसे बड़ा कारण बना । विरोध हो निक्तु  तरीका उचित और  न्यायपूर्ण होना चाहिए। भगत सिंह की इस  सोच में  मानवतावादी और मानव जाति का कल्याण की  भावना निहित थी ।

प्रश्न 7.निम्नलिखित कथनों का अभिप्राय स्पष्ट करें

(क) मैं आपको बताना चाहता हूँ कि विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती हैं।

(ख) हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपम है।

(ग) मनुष्य को अपने विश्वासों पर दृढ़तापूर्वक अडिग रहने का प्रयत्न करना चाहिए।

उत्तर.

(क) भगत सिंह का मानना है कि विपत्तियाँ मनुष्य को पूर्ण बनाती हैं। अर्थात् मनुष्य सुख की स्थिति में तो बड़े ही आराम से रहता है। लेकिन जब उस पर कोई दुख आता है तो वह उसे दूर करने के प्रयास करता है जिससे उसका ज्ञान तथा कार्यक्षमता बढ़ती है और वह पूर्णतः पाता है।

(ख) भगत सिंह के अनुसार यदि मनुष्य यह सोचने लगे कि अगर मैं कोई कार्य नहीं करूंगा तो वह कार्य नहीं होगा तो यह पूर्णतः गलत है। वास्तव में मनुष्य विचार को जन्म देनेवाला नहीं होता, अपितु परिस्थितियाँ विशेष विचारों वाले व्यक्तियों को पैदा करती हैं। अर्थात् हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपज है।

(ग) भगत सिंह कहते हैं कि हमें एक बार किसी लक्ष्य या उद्देश्य का निर्धारण करने के बाद उस पर अडिग रहना चाहिए। हमें विश्वास रखना चाहिए कि हम अपने लक्ष्य को अवश्य प्राप्त कर लेंगे।

प्रश्न 8.‘जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए।’ आज जब देश आजाद है भगत सिंह के इस विचार का आप किस तरह मूल्यांकन करेंगे। अपना पक्ष प्रस्तुत करें।

उत्तर. .‘जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए।’भगत सिंह का उक्त कथन आज भी प्रासंगिक और प्रभावी है जितना उस समय जब वें आज़ादी के समय संघर्ष कर कर रहे थे .समय के अनुसार मनुष्य की  स्थिति –परिस्थिति में परिवर्तन होता रहता है किन्तु  कैसी भी स्थिति –परिस्थिति हो राष्ट्र  सर्वोपरि रहना चाहिए .राष्ट्र के विकास से ही नागरिक का विकास जुडा हुआ है .यदि राष्ट्र पर कोई आपदा आती है तो नागरिकों को भी उसका सामना करना पड़ेगा .राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि हर काल में ,हर युग में नागरिक अपने व्यक्तिगत हित से राष्ट्र हित को ऊपर रखें .

प्रश्न 9. भगत सिंह ने अपनी फाँसी के लिए किस समय की इच्छा व्यक्त की है? वे ऐसा समय क्यों चुनते हैं?

उत्तर. भगत सिंह ने अपनी फाँसी के लिए इच्छा व्यक्त करते हुए कहा है कि जब यह आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाए। वे ऐसा समय इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि यदि कोई सम्मानपूर्ण या उचित समझौता होना हो तो उन जैसे व्यक्तियों का मामला उसमें कोई रूकावट उत्पन्न करे।

प्रश्न 10. भगत सिंह के इस पत्र से उनकी गहन वैचारिकता, यथार्थवादी दृष्टि का परिचय मिलता है। पत्र के आधार पर इसकी पुष्टि करें।

उत्तर. पाठ्यपुस्तक में  भगत सिंह रचित एक लेख ,एक पत्र पाठ रूप में संकलित है .सम्पूर्ण पाठ में भगत सिंह ने  आत्महत्या, जेल जाना, कष्ट सहना, मृत्युदण्ड और रूसी साहित्य के बारे में अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है।भगत सिंह ने आत्महत्या को कायरता बतलाते हुए कहा है कि मृत्यु सार्थक उद्देश्य के लिए होनी चाहिए .क्रन्तिकारी के जेल जाने के सम्बन्ध में भगत सिंह एक क्रन्तिकारी के लिए जेल जाना किसी तीर्थ यात्रा से कम नहीं है .एक क्रन्तिकारी को जेल प्रवास के दौरान कई प्रकार की असह्य यातनाओं से गुजरना पड सकता है किन्तु क्रन्तिकारी को कष्ट सहन करने से भयभीत नहीं होना चाहिए .कष्ट सहना हमारे संकल्प को और अधिक दृढ बनाते है .

भगत सिंह का आत्महत्या के संबंध में विचार है कि केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त कर लेना मनुष्य की कायरता है। यह कायर व्यक्ति का काम है। एक क्षण में समस्त पुराने अर्जित मूल्य खो देना मूर्खता है अतरू व्यक्ति को संघर्ष करना चाहिए। दूसरा जेल जाना भगत सिंह व्यर्थ नहीं मानते क्योंकि रूस की जारशाही का तख्ता पलट बंदियों का बंदीगृह में कष्ट सहने का कारण बना। अतः यदि आन्दोलन को तीव्र करना है तो कष्ट सहन से नहीं डरना चाहिए।मृत्युदण्ड के बारे में भगत सिंह के विचार हैं कि यदि राष्ट्र सेवा के बदले मृत्यु दंड भी मिले तो ऐसी मृत्यु  से कुछ और सुंदरअवसर जीवन में  नहीं हो सकता .यह आदर्श मृत्यु है। श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट आदर्श के लिए मिली  फाँसी को  सुन्दर मृत्यु मानते हुए  क्रांतिकारी को हँसते- हँसते फाँसी का फंदा डाल लेना रूसी साहित्य में कष्ट सहन की जो भावना है ,वह हम भारतीयों में भी होनी चाहिए . पूरे पाठ में  भगत सिंह ने एक राष्ट्र वादी विचारक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया है ,पाठ में व्यक्त विचार भावी पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत है

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