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12 up board hindi,ninda ras ,hari shankar parasai,निन्दा रस  -हरिशंकर परसाई

September 7, 2022
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निन्दा रस  -हरिशंकर परसाई

निन्दा रस  -हरिशंकर परसाई

निर्देशः ;पद्धगद्य भाग में आपकों गद्य पाठों में से कोई दो गद्यांश दिये जाएगे, आपको अपनी सुविधा के अनुसार एक ही गद्यांश चुनना है, गद्यांश में दो-दो अंक के पाँच प्रश्न होगे, इनमें से एक प्रश्न में पाठ एवं लेखक का नाम पूछा जाएगा, एक प्रश्न में रेखांकित पंक्ति की व्याख्या करना है, शेष तीन प्रश्न गद्यांश से संबंधित होगे।

संकेत-1 ‘क’ कई महीने बाद ………………………… आगे बढ़ाना चाहिए।

                ‘क’ कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफान की तरह कमरे में घुसे। ‘साइक्लोन’ की तरह मुझे अपनी भुजाओं में जकड़ा तो मुझे धृतराष्ट्र की भुजाओं में जकड़े भीम के पुतले की याद आ गयी। यह धृतराष्ट्र की ही जकड़ थी। अंधे धृतराष्ट्र ने टटोलते हुए पूछा,

                ‘‘कहाँ है भीम? आ बेटा, तुझे कलेजे से लगा लूं।’’

                और जब भीम का पुतला उनकी जकड़ में आ गया तो उन्होंने प्राणघाती स्नेह से उसे जकड़कर चूर कर डाला।

                ऐसे मौके पर हम अक्सर अपने पुतले को अंकवार में दे देते हैं, हम अलग खड़े देखते रहते हैं। ‘क’ से क्या मैं गले मिला? क्या मुझे उसने समेटकर कलेजे से लगा लिया? हरगिज नहीं। मैंने अपना पुतला ही उसे दिया। पुतला इसलिए उसकी भुजाओं में सौंप दिया कि मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूँ। पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क’ अपनी ससुराल आया है और ‘ग’ के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घंटे तुम्हारी निंदा करता रहा। इस सूचना के बाद जब आज संवेरे वह मेरे गले लगा तो मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप खिसका दिया। और निःस्नेह, कँटीली देह उसकी बाँहों में छोड़ दी। भावना के अगर काँटे होते तो उसे मालूम होता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपटाए है। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न-1     लेखक ने अपने मित्र ‘क’ के बारे क्या बतलाया ?

उत्तर     लेखक ने अपने मित्र ‘क’ के बारे क्या बतलाया कि झूठ बोलने में उसका कोई सानी नहीं। वह कल का आया हुआ है, किन्तु लेखक को बतलाता है कि वह आज सुबह ही आया। वह लेखक के सामने आत्मीयता पूर्ण व्यवहार का अभिनय करता जबकि ‘ग’ के सामने वह लेखक की खूब निन्दा करके आया है।

प्रश्न-2     लेखक ने अपने मित्र ‘क’ की तुलना किससे की और क्यों ?

उत्तर     लेखक ने अपने मित्र ‘क’ की तुलना धृतराष्ट्र से की क्योंकि वह धृतराष्ट्र की तरह ही वास्तविकता को छिपाकर अपना छद्म रूप ही प्रकट करता है।

प्रश्न-3     लेखक ने अपने मित्र से मिलने में क्या सावधानी बरती ?

उत्तर     लेखक ने भीम की तरह स्वयं को नहीं बल्कि अपने पुतले को ही आगे बढ़ाया।

प्रश्न-4     ‘छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए’, इस कथन से लेखक का क्या आशय है ?

उत्तर     उक्त कथन से लेखक का अभिप्राय है कि जो व्यक्ति जैसा होता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए।

प्रश्न-5     लेखक ने ‘क’ के लिए यह क्यों कहा कि वह अभिन्य में पूरा है ?

उत्तर     ‘क’ ‘ग’ के यहाँ लेखक की निन्दा करके लौटा है, किन्तु लेखक के सामने उसने ऐसा अभिनय किया जैसे वह लेखक से घनिष्ट आत्मीयता रखता है। लेखक से मिलने का हर्ष प्रकट करने के लिए उसने आँसू तक बहा दिए, ठीक वैसे ही जैसे आत्मीयजन से मिलन होने पर आँसू निकल आते है।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-2 पर वह मेरा मित्र ………………………… वह बढ़ा लेता है।

                वह मेरा दोस्त अभिनय में पूरा है। उसके आँसू भर नहीं आये, बाकी मिलन के हर्षाेल्लास के सब चिन्ह प्रकट हुए। वह गहरी आत्मीयता की जकड़, नयनों से छलकता वह असीम स्नेह और वह स्नेहसिक्त वाणी। बोला

                ‘‘अभी सुबह की गाड़ी से उतरा और एकदम तुमसे मिलने चला आया, जैसे आत्मा का एक खंड दूसरे खंड से मिलने को आतुर रहता है।’’

                आते ही झूठ बोला कमबख्त। कल का आया है, यह मुझे मेरा मित्र बता गया था। इस झूठ में कोई प्रयोजन शायद उसका न रहा हो। कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं। वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते है। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ ही निकलता है। मेरे एक रिश्तेदार ऐसे हैं। वे अगर बम्बई जा रहे हैं और उनसे पूछें, तो वे कहेंगे, ‘‘कलकत्ता जा रहा हूँ।’’

                ठीक बात उनके मुँह से निकल ही नहीं सकती। ‘क’ भी बड़ा निर्दोष, सहज-स्वाभाविक मिथ्यावादी है।

                वह बैठा। कब आये? कैसे हो? – वगैरह के बाद उसने ‘ग’ की निन्दा आरम्भ कर दी। मनुष्य के लिए जो भी कर्म जघन्य हैं वे सब ‘ग’ पर आरोपित करके उसने ऐसे गाढ़े काले तारकोल से उसकी तस्वीर खींची कि मैं ये सोचकर काँप उठा कि ऐसी काली तस्वीर मेरी ‘ग’ के सामने इसने कल शाम को खींची होगी।

                सुबह की बातचीत में ‘ग’ प्रमुख विषय था। फिर तो जिस परिचित की बात निकल आती, उसी को चार-छः वाक्यों में धराशायी करके वह बढ़ लेता।

प्रश्न-1     आप कैसे कह सकते है कि लेखक का मित्र ‘क’ अभिनय में पूरा था ?

उत्तर     ‘क’ ‘ग’ के यहाँ लेखक की निन्दा करके लौटा है, किन्तु लेखक के सामने उसने ऐसा अभिनय किया जैसे वह लेखक से घनिष्ट आत्मीयता रखता है। लेखक से मिलने का हर्ष प्रकट करने के लिए उसने आँसू तक बहा दिए, ठीक वैसे ही जैसे आत्मीयजन से मिलन होने पर आँसू निकल आते है।

प्रश्न-2     किस आधार पर लेखक ने कुछ लोगों को निर्दोष मिथ्यावादी कहा ?

उत्तर     वे लोग जो निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ बोलते है अर्थात् आदतन या प्रड्डति के वशीभूत झूठ बोलते है, ऐसे लोगों को लेखक ने निर्दोष मिथ्यावादी कहा।

प्रश्न-3     लेखक अपने मित्र ‘क’ को कैसे पहचान पाया ?

उत्तर     ‘क’ ने आते ही ‘ग’ की निन्दा का अम्बार लगा दिया जबकि इसी ‘क’ ने ‘ग’ के सामने कल स्वयं लेखक की निन्दा की थी। इस तरह लेखक ने पहचान लिया कि वह यह व्यक्ति मुँह के सामने कुछ और है और पीठ के पीछे कुछ और।

प्रश्न-4     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-3 अद्भूत है मेरा मित्र ………………………… रखने की सलाह दी ?                   

                अद्भुत है मेरा यह मित्र। उसके पास दोषों का ‘केटलॉग’ हैै। मैंने सोचा कि जब वह हर परिचित की निंदा कर रहा है तो क्यों न मैं लगे हाथों विरोधियों की गत, इसके हाथों करा लूँ। मैं अपने विरोधियों का नाम लेता गया और वह उन्हें निंदा की तलवार से काटता चला। जैसे लकड़ी चीरने की आरा मशीन के नीचे मजदूर लकड़ी का लट्ठा खिसकाता जाता है और वह चीरता जाता है, वैसे ही मैंने विरोधियों के नाम एक-एक कर खिसकाए और वह उन्हें काटता गया। कैसा आनन्द था। दुश्मनों को रणक्षेत्र में एक के बाद एक काटकर गिरते हुए देखकर योद्धा को ऐसा ही सुख होता होगा।

                तो हम लोगों के मन में बड़ी शांति और तुष्टि थी।

                निंदा की ऐसी ही महिमा है। दो-चार निन्दकों को एक जगह बैठकर निंदा में निमग्न देखिए और तुलना कीजिए कि ईश्वर-भक्तों से जो रामधुन लगा रहे हैं। निन्दकों की सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में दुर्लभ है। इसीलिये संतों ने निन्दकों को ‘आँगन कुटी छवाय’ पास रखने की सलाह दी है।

प्रश्न-1     शत्रु की निन्दा सुनकर लेखक ने कैसा अनुभव किया ?

उत्तर     शत्रु की निन्दा सुनकर लेखक को ऐसा लगा जैसे दुश्मन को रण क्षेत्र में एक के बाद एक कटकर गिरते हुए देखकर यो(ा को सुख मिलता है।

प्रश्न-2     मित्र की किस प्रवृति से लेखक का अपने मित्र के प्रति मैल मिट गया ?

उत्तर     ‘क’ के मुख से अपने शत्रुओं की निन्दा सुनकर लेखक के मन में ‘क’ के प्रति जो मैल था वह मिट गया।

प्रश्न-3     लेखक और मित्र के मन में शांति और संतुष्टि क्यों थी ?

उत्तर     ‘क’ निन्दा करके सन्तुष्ट या और लेखक अपने विरोधियों की निन्दा सुनकर।

प्रश्न-4     कौनसा गुण भक्तों में भी दुर्लभ है ?

उत्तर     निन्दकों की सी एकाग्रता, परस्पर आत्मीयता, निमग्नता भक्तों में भी दुर्लभ है।

प्रश्न-5     सन्तों ने आगन कुटी छवाय की सलाह क्यों दी होगी ?

उत्तर     सन्तों ने निन्दकों को समीप रखने की सलाह इसलिए दी होगी निन्दकों से आलोचना सुनने के बाद मनुष्य को अपने दोषों का बोध होता है, जिससे हम अज्ञात थे, हमें निनदा सुनकर अपने दोषों को दूर करने का अवसर मिलता है।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-4 कुछ मिशनरी निन्दक ………………………… डाला जा सकता है।                                                 

                कुछ ‘मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घंटे वे निंदा कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितांत निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस आनन्द से लोग दुश्मन की। निंदा इनके लिए ‘टॉनिक’ होती है।

                टेªड यूनियन के इस जमाने में निन्दकों के संघ बन गए है। संघ के सदस्य जहाँ-तहां से खबरे लाते हैं और अपने संघ के प्रधान को सौंपते हैं। यह कच्चा माल हुआ। अब प्रधान उनका पक्का माल बनाएगा और सब सदस्यों को ‘बहुजन हिताय’ मुफ्त बांटने के लिए दे देगा। यह फुरसत का काम है, इसलिए जिनके पास कुछ और करने को नहीं होता, वे इसे बड़ी खूबी से करते हैं। एक दिन हमसे ऐसे एक संघ के अध्यक्ष ने कहा, ‘‘या आजकल लोग तुम्हारे बारे में बहुत बुरा-बुरा कहते हैं।’’ हमने कहा, ‘‘आपके बारे में मुझसे कोई भी बुरा नहीं कहता। लोग जानते हैं कि आपके कानों के घूरे में इस तहर का कचरा मजे में डाला जा सकता है।’’

प्रश्न-1     निन्दक, निन्दा कर्म किस भाव से करते ?

उत्तर     निन्दक, निन्दा कर्म सिर्फ आत्मिक आनन्द के लिए करते है, दूसरों की निन्दा अपने मुख से करके अथवा दूसरों के मुख से सुनकर सुखानुभूति होती है।

प्रश्न-2     निंदकों के लिए ‘निंदा’ किसके समान है ?

उत्तर     निंदकों के लिए ‘निंदा’ कर्म टॉनिक के समान है।

प्रश्न-3     अध्यक्ष ने कहा ”यार आजकल लोग तुम्हारे बारे में बहुत बुरा-बुरा कहते है“, इसके प्रत्युत्तर में लेखक ने क्या कहाँ ? इसका आशय भी बतलाइए।

उत्तर     लेखक ने प्रत्युत्तर में कहा, आपके बारे में मुझसे कोई भी बुरा नहीं कहता अर्थात् जैसे कचरा कूडे में डाला है, वैसे ही दूसरों की निन्दा वे ही ग्रहण करता है जो स्वयं निन्दक होते है।

प्रश्न-4     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-5 ईर्ष्या द्वेष से प्रेरित ………………………… उसका कष्ट दुगना हो जाएगा।                             

                ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है। लेकिन इसमें वो मजा नहीं जो मिशनरी भाव से निंदा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुखी होता है। ईर्ष्या-द्वेष से चौबीस घंटे जलता है और निंदा का जल छिडककर कुछ शांति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपन अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करने वाले को कोई दंड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दंड चाहिए। निरन्तर अच्छे काम करते जाने से उसका दंड भी सख्त होता जाता है। जैसे एक कवि ने एक अच्छी कविता लिखी, ईर्ष्याग्रस्त निन्दक को कष्ट होगा। अब अगर एक और अच्छी लिख दी तो उसका कष्ट दुगना हो जाएगा।

प्रश्न-1     लेखक ने दूसरों की निन्दा करने का क्या कारण बतलाया ?

उत्तर     ईर्ष्या द्वेष करना वाला निन्दक भी होता क्योंकि वह ईर्ष्या-द्वेष की आग में जल रहा होता किन्तु जब वह निन्दा करता है तो उसे ऐसी शांति अनुभव होती है जैसे किसी ठण्डा पानी छिड़क दिया हो।

प्रश्न-2     लेखक किस प्रकार के निन्दकों को दण्ड देने की जरूरत नहीं मानता ?

उत्तर     लेखक निन्दक को दण्ड देना इसलिए उचित नहीं मानता क्योंकि जब हम शांति से सो रहे होते है, वह ईर्ष्या की जलन से चैन से सो नहीं पाता।

प्रश्न-3     लेखक के अनुसार निन्दा का उद्गम कैसा होता है ?

उत्तर     लेखक के अनुसार निन्दा का उद्गम हीनता और कमजोरी से होता है।

प्रश्न-4     बड़ी लकीर को मिटाकर ही बड़ी लकीर बनती है, इस कथन से लेखक का क्या आशय है ?

उत्तर     कुछ लोगों की सोच होती है कि अपने को बड़ा या श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की अपेक्षा जो श्रेष्ठ व्यक्ति है, उसे निन्दा से छोटा बना दो, हम बड़े नजर आने लगेंगे।

प्रश्न-5     लेखक के अनुसार कौन किसकी निन्दा करता है और क्यों ?

उत्तर     लेखक के अनुसार हीनता से ग्रसित अकर्मण्य लोग ही अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति की निन्दा करता है। ईर्ष्या की आग को शांत करने के लिए ही वह निन्दा कर्म करता है।

प्रश्न-6     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-6 निन्दा का उद्गम ही हीनता ………………………… समझने की तुष्टि का अनुभव करते हैं।

                निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनके अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता हैं, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईर्ष्या-द्वेष और उनसे उत्पन्न निंदा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है, क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे बनाया महल और बिन बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से ईर्ष्या होती है। सुनते हैं और स्वयं को पूर्ण संत समझने की तुष्टि का अनुभव करते हैं।

प्रश्न-1     हीनता और कमजोरी से किसका उद्गम  होता है।

उत्तर     हीनता और कमजोरी से निन्दा का उद्गम होता है।

प्रश्न-2     मनुष्य दूसरों की निंदा क्यों करता है ?

उत्तर     वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है।

प्रश्न-3     लेखक के अनुसार निंदा की प्रवृति कैसे बढती है ?

उत्तर     ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता हैं, त्यों-त्यों निंदा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

प्रश्न-4     लेखक ने इंद्र के बारे में क्या कहा ?

उत्तर     इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है, क्योंकि वह निठल्ला है।

प्रश्न-5     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

संकेत-7 आप इनके पास बैठिये और ………………………… निंदा सबद रसाल कहा है।

                आप इनके पास बैठिये और सुन लिजिए, ‘‘बड़ा खराब जमाना आ गया। तुमने सुना? फलाँ और अमुक…….।’’ अपने चरित्र पर आँख डालकर देखने की उन्हें फुरसत नहीं होती। एक कहानी याद आ रही है। एक स्त्री किसी सहेली के पति की निन्दा अपने पति से कर रही है। वह बड़ा उचक्का, दगाबाज आदमी है। बेईमानी से पैसा कमाता है। कहती है कि मैं उस सहेली की जगह होती तो ऐसे पति को त्याग देती। तब उसका पति उसके सामने यह रहस्य खोलता है कि वह स्वयं बेईमानी से इतना पैसा कमाता है। सुनकर स्त्री स्तब्ध रह जाती है। क्या उसने पति को त्याग दिया? जी हाँ, वह दूसरे कमरे में चली गई।

                कभी-कभी ऐसा भी होता है हममें जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहं को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं।

                उसक मित्र की मुलाकात के करीब दस-बारह घंटे बाद यह सब मन में आ रहा है। अब कुछ तटस्थ हो गया हूँ। सुबह जब उसके साथ बैठा था तब मैं स्वयं निंदा के ‘काला सागर’ में डूबता-उतराता था, कल्लोल कर रहा था। बड़ा रस है न निन्दा में। सूरदास ने इसलिए ‘निन्दा सबद रसाल’ कहा है।

प्रश्न-1     लेखक ने कुछ निदंकों को निंदा का व्यापारी क्यों कहा है ?

उत्तर     क्योंकि निन्दा ही उसकी पूँजी होती है, निन्दा का ही व्यापार करते है, इसी प्रवृत्ति से वह पहचाने जाते है।

प्रश्न-2     कुछ लोग कौनसा कार्य कर सन्तुष्टि का अनुभव करते है ?

उत्तर     रस विभोर होकर निन्दक जिस तिस की सत्य कल्पित कलंक कथा सुनाकर स्वयं को सन्त समझने की तुष्टि का अनुभव करते है।

प्रश्न-3     कभी-कभी अच्छाई निंदा का कारण क्यों बन जाती है ?

उत्तर     कभी-कभी अच्छाई ही हमारी निंदा का कारण इसलिए बन जाती है क्योंकि हमारी अच्छाई की तुलना में दूसरा स्वयं को हीन समझने लगता, उस हीनता की पीड़ा को मिटाने के लिए वह अनावश्यक निन्दा करने लगता है।

प्रश्न-4     निन्दा को सबद रसाल क्यों कहा है ?

उत्तर     निन्दा को सबद रसाल इसलिए कहा गया कि निन्दा करने वाला दूसरों की निन्दा करके आनन्द की अनुभूति करता है और सुनने वाला विरोधी की निन्दा सुनकर आनन्दित अनुभव करता है।

प्रश्न-5     पाठ और पाठ के लेखक का नाम बतलाइए।

उत्तर     पाठ का नाम है – निन्दा रस और लेखक है – हरिशंकर परसाई।

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